संसद में अग्निपरीक्षा, स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ आज महाभियोग पर वोटिंग
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संवाद 24 नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में आज एक बार फिर इतिहास खुद को दोहरा रहा है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) आज निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत के साथ ही आज सदन की कार्यसूची में सबसे ऊपर इस प्रस्ताव पर चर्चा और वोटिंग का विषय रखा गया है। यह पहली बार नहीं है जब देश की सबसे बड़ी पंचायत के मुखिया को इस तरह की चुनौती का सामना करना पड़ रहा हो, लेकिन 2026 के राजनैतिक समीकरणों ने इस बार की जंग को बेहद दिलचस्प बना दिया है।
क्यों आया यह प्रस्ताव?
विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ के नेतृत्व में लाए गए इस प्रस्ताव का मुख्य आधार सदन के संचालन के दौरान ‘पक्षपात’ के आरोप हैं। विपक्षी नेताओं का दावा है कि महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा के दौरान उनकी माइक बंद कर दी जाती है या उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया जाता। विशेष रूप से पिछले सत्र में कई सांसदों के निलंबन और राहुल गांधी के भाषण के कुछ हिस्सों को सदन की कार्यवाही से हटाने को लेकर विपक्ष में भारी आक्रोश था। कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों ने आरोप लगाया है कि अध्यक्ष की निष्पक्षता अब संदेह के घेरे में है, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत उन्हें पद से हटाना अनिवार्य हो गया है।
संवैधानिक प्रक्रिया और नंबर गेम का गणित
नियमों के अनुसार, जब अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव पर बहस होती है, तो वे स्वयं सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते। आज ओम बिरला को एक सामान्य सांसद की तरह सदस्यों के बीच बैठना होगा। उनकी अनुपस्थिति में सदन का संचालन पीठासीन अधिकारियों के पैनल का कोई सदस्य करेगा। वोटिंग के दौरान, प्रस्ताव को पारित करने के लिए सदन के तत्कालीन सदस्यों के बहुमत (Effective Majority) की आवश्यकता होगी। वर्तमान आंकड़ों पर नजर डालें तो एनडीए (NDA) के पास संख्या बल का स्पष्ट लाभ है, लेकिन विपक्ष की रणनीति केवल जीत-हार तक सीमित नहीं है। वे इस वोटिंग के जरिए देशभर में यह संदेश देना चाहते हैं कि सरकार संवैधानिक संस्थाओं को अपनी मर्जी से चला रही है। दूसरी ओर, भाजपा ने अपने सभी सांसदों को सदन में रहने के लिए कड़ा ‘थ्री-लाइन व्हिप’ जारी किया है, ताकि किसी भी तरह की ‘क्रॉस-वोटिंग’ की गुंजाइश न रहे।
इतिहास के पन्नों में अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव
भारतीय संसदीय इतिहास गवाह है कि अध्यक्ष की कुर्सी पर सवाल उठाना कोई नई बात नहीं है। सबसे पहले 1954 में प्रथम लोकसभा अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया था। इसके बाद समय-समय पर अन्य अध्यक्षों को भी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा। हालांकि, इनमें से ज्यादातर प्रस्ताव गिर गए थे, लेकिन उन्होंने संसदीय मर्यादाओं और निष्पक्षता पर एक बड़ी बहस को जन्म दिया था। आज भी ओम बिरला के मामले में वही पुरानी बहस फिर से जीवित हो गई है।
सत्तापक्ष का रुख और भावी रणनीति
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने इस प्रस्ताव को ‘ओछी राजनीति’ करार दिया है। सत्तापक्ष के प्रवक्ताओं का कहना है कि ओम बिरला ने सदन को सबसे अधिक उत्पादक (Productive) बनाने का काम किया है और विपक्ष हार की हताशा में उन पर कीचड़ उछाल रहा है। सदन के भीतर आज तीखी बहस होने के आसार हैं, जहाँ दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें पेश करेंगे।






