भारतीय संस्कृति में सुहाग और आभूषण: दिव्यता, परंपरा और सामाजिक अर्थों का विस्तृत आयाम

संवाद 24 डेस्क। भारतीय संस्कृति में ‘सुहाग’ केवल वैवाहिक स्थिति का संकेत नहीं है, बल्कि यह स्त्री की सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक उत्तरदायित्व, आध्यात्मिक आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है। सुहाग की अवधारणा हजारों वर्षों से भारतीय जीवन-दर्शन का अभिन्न अंग रही है। विवाह को यहाँ केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और दो कुलों का मिलन माना गया है। इस पवित्र बंधन को स्थायित्व और शुभता प्रदान करने के लिए अनेक प्रतीक विकसित हुए, जिनमें आभूषणों की विशेष भूमिका रही है। मांग टीका से लेकर पायल और बिछिया तक, प्रत्येक आभूषण न केवल सौंदर्य का विस्तार है बल्कि उसके पीछे धार्मिक, आयुर्वेदिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ भी निहित हैं। भारतीय समाज में सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार उसकी पूर्णता का प्रतीक माना गया है, जिसमें आभूषण प्रमुख स्थान रखते हैं।

सुहाग की अवधारणा और उसका सांस्कृतिक आधार
‘सुहाग’ शब्द संस्कृत के ‘सौभाग्य’ से व्युत्पन्न माना जाता है, जिसका अर्थ है शुभता और समृद्धि। प्राचीन ग्रंथों, पुराणों और लोककथाओं में सुहागिन स्त्री को लक्ष्मी स्वरूपा कहा गया है। विवाह के बाद स्त्री को जो चिह्न और आभूषण धारण कराए जाते हैं, वे केवल परंपरा नहीं बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, जो वैवाहिक स्थिति को स्पष्ट करते हैं। ये प्रतीक पति की दीर्घायु, पारिवारिक समृद्धि और सामाजिक मर्यादा से जुड़े माने जाते हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक, भले ही आभूषणों की बनावट और नाम बदलते हों, परंतु उनका मूल भाव एक ही है—दांपत्य जीवन की पवित्रता और स्थायित्व।

मांग टीका: आज्ञा चक्र और आध्यात्मिक संतुलन
मांग टीका माथे के मध्य भाग में, बालों की मांग के पास धारण किया जाता है। यह स्थान ‘आज्ञा चक्र’ का क्षेत्र माना जाता है, जो मानसिक संतुलन और एकाग्रता से जुड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह चक्र विवेक और आत्मसंयम का केंद्र है। मांग टीका न केवल सौंदर्य को निखारता है, बल्कि यह स्त्री के विवाहित होने का संकेत भी देता है। प्राचीन काल में इसे सोने, चांदी और कीमती रत्नों से बनाया जाता था, जो परिवार की आर्थिक स्थिति को भी दर्शाता था। राजस्थानी ‘बोरला’, महाराष्ट्रीय ‘चंद्रकोर’ और दक्षिण भारतीय ‘नेट्टी चुट्टी’ इसके क्षेत्रीय रूप हैं।

नथ: सौंदर्य, स्वास्थ्य और सामाजिक पहचान
नथ या नाक की नथुनी भारतीय स्त्री के श्रृंगार का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। आयुर्वेदिक दृष्टि से नाक के बाएं भाग में छेदन को स्त्री-स्वास्थ्य से जोड़ा गया है, विशेषकर प्रसव पीड़ा को कम करने में इसकी भूमिका मानी जाती रही है। नथ का आकार और डिजाइन क्षेत्र के अनुसार बदलता है—उत्तर भारत में बड़ी गोल नथ, महाराष्ट्र में ‘नाथ’ और हिमालयी क्षेत्रों में विशिष्ट अलंकरण वाली नथें लोकप्रिय हैं। विवाह के अवसर पर नथ धारण करना विशेष महत्व रखता है और इसे सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।

झुमके: श्रवण और शृंगार का संतुलन
कानों में पहने जाने वाले झुमके भारतीय आभूषण परंपरा का अत्यंत प्राचीन अंग हैं। पुरातात्त्विक साक्ष्य बताते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता में भी कानों के आभूषण प्रचलित थे। झुमके केवल सजावटी वस्तु नहीं, बल्कि आयुर्वेद में कान के विशिष्ट बिंदुओं को सक्रिय करने वाले माने गए हैं। पारंपरिक डिजाइनों में ‘कुंडल’, ‘झुमकी’, ‘कर्णफूल’ और ‘चांदबाली’ प्रमुख हैं। विवाह के समय दुल्हन के झुमके उसके परिधान और अन्य आभूषणों के साथ सामंजस्य स्थापित करते हैं।

हार और मंगलसूत्र: वैवाहिक बंधन का दृश्यमान प्रतीक
गले में धारण किया जाने वाला हार और विशेष रूप से मंगलसूत्र, सुहाग का सबसे प्रमुख प्रतीक माना जाता है। ‘मंगल’ का अर्थ है शुभ और ‘सूत्र’ का अर्थ है धागा। काले मनकों और सोने से बना मंगलसूत्र बुरी नजर से रक्षा का प्रतीक भी माना जाता है। दक्षिण भारत में ‘थाली’ या ‘ताली’ इसी का रूप है, जबकि महाराष्ट्र में दो स्वर्ण वटों वाला मंगलसूत्र प्रचलित है। यह केवल एक आभूषण नहीं बल्कि दांपत्य की शपथ का प्रतीक है, जिसे विवाह संस्कार के दौरान वर वधू के गले में पहनाता है।

बाजूबंद: शक्ति और सौंदर्य का संगम
बाजूबंद, जिसे भुजबंध भी कहा जाता है, बांह के ऊपरी हिस्से में धारण किया जाता है। प्राचीन भारतीय मूर्तिकला और चित्रकला में देवियों और रानियों को बाजूबंद पहने हुए दर्शाया गया है। यह शारीरिक सौंदर्य को उभारने के साथ-साथ वीरता और शक्ति का प्रतीक भी रहा है। राजस्थान और गुजरात में भारी और जटिल नक्काशी वाले बाजूबंद विशेष रूप से लोकप्रिय रहे हैं।

कंगन और चूड़ियाँ: शुभता और ऊर्जा का संचार
कलाई में पहने जाने वाले कंगन और चूड़ियाँ विवाहित स्त्री की पहचान का अहम हिस्सा हैं। कांच की चूड़ियाँ, विशेषकर लाल और हरे रंग की, उत्तर भारत में सुहाग का प्रतीक मानी जाती हैं। पंजाब में ‘चूड़ा’ विवाह के समय विशेष अनुष्ठान के साथ पहनाया जाता है। आयुर्वेदिक मान्यता के अनुसार, कलाई में धातु या कांच के आभूषण पहनने से रक्तसंचार संतुलित रहता है। चूड़ियों की खनक को घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है।

अंगूठी: प्रतिबद्धता और विश्वास का संकेत
अंगूठी का आदान-प्रदान प्राचीन काल से वैवाहिक वचनबद्धता का प्रतीक रहा है। अनामिका उंगली को हृदय से जुड़ा माना गया है, इसलिए इसी उंगली में अंगूठी पहनने की परंपरा विकसित हुई। भारतीय विवाह में सगाई के समय अंगूठी का विशेष महत्व है। यह प्रेम, विश्वास और प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

कमरबंद: संतुलन और सौंदर्य
कमरबंद या करधनी कमर पर धारण किया जाने वाला आभूषण है। यह विशेष रूप से दुल्हन के परिधान को आकर्षक बनाता है। प्राचीन ग्रंथों में इसे नारी की गरिमा और संतुलन का प्रतीक बताया गया है। दक्षिण भारत में सोने की करधनी का प्रचलन है, जबकि उत्तर भारत में चांदी और मोतियों से सजी करधनी लोकप्रिय रही है।

पायल और बिछिया: परंपरा और पृथ्वी से जुड़ाव
पैरों में पहनी जाने वाली पायल और बिछिया भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखती हैं। चांदी की पायल की मधुर ध्वनि को शुभ माना जाता है। बिछिया, विशेषकर विवाहित स्त्रियों द्वारा पहनी जाती है और इसे प्रजनन स्वास्थ्य से भी जोड़ा गया है। हिंदू परंपरा में सोना देवताओं का धातु माना गया है, इसलिए पैरों में प्रायः चांदी का प्रयोग होता है।

क्षेत्रीय विविधता और आधुनिक परिवर्तन
भारत की सांस्कृतिक विविधता के कारण सुहाग के आभूषणों में क्षेत्रीय भिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। बंगाल की ‘शंखा-पोला’, तमिलनाडु की ‘ताली’, राजस्थान का ‘बोरला’ और कश्मीर का ‘देझोर’ स्थानीय परंपराओं के उदाहरण हैं। आधुनिक समय में डिजाइन और सामग्री में बदलाव आया है, परंतु प्रतीकात्मक अर्थ आज भी प्रासंगिक हैं। हल्के और दैनिक उपयोग के अनुकूल आभूषणों ने पारंपरिक भारी गहनों का स्थान आंशिक रूप से ले लिया है।

सामाजिक और आर्थिक आयाम
आभूषण भारतीय परिवारों में आर्थिक सुरक्षा का भी माध्यम रहे हैं। सोना निवेश का पारंपरिक साधन माना जाता है। विवाह के अवसर पर दिया गया स्वर्ण आभूषण स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता और सुरक्षा से जुड़ा रहा है। ग्रामीण समाज में यह आवश्यकता पड़ने पर आर्थिक संकट से उबरने का साधन भी बनता है।

भारतीय संस्कृति में सुहाग और आभूषण केवल बाहरी सजावट नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक अर्थों से जुड़े प्रतीक हैं। मांग टीका से लेकर पायल तक प्रत्येक आभूषण स्त्री के जीवन में एक विशेष स्थान रखता है। ये आभूषण दांपत्य की स्थिरता, पारिवारिक समृद्धि और सामाजिक पहचान को सुदृढ़ करते हैं। आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद इन प्रतीकों की प्रासंगिकता बनी हुई है, क्योंकि वे भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़े हैं। सुहाग के ये दिव्य प्रतीक आज भी परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाते हुए भारतीय नारी के गौरव और सौभाग्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।

Geeta Singh
Geeta Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get regular updates on your mail from Samvad 24 News