नाट्यशास्त्र से नवयुग तक: कैसे विकसित हुई भारतीय संस्कृति की शास्त्रीय नृत्य परंपरा?

संवाद 24 डेस्क। भारतीय कला और नृत्य संस्कृति के अभिन्न अंग हैं, जो न केवल मनोरंजन का माध्यम रहे हैं, बल्कि आध्यात्मिक अभिव्यक्ति, सामाजिक संवाद और सांस्कृतिक संरक्षण का भी सशक्त साधन रहे हैं। भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत में नृत्य एक जीवंत परंपरा के रूप में सदियों से विकसित होता रहा है। यह परंपरा प्राचीन ग्रंथों, मंदिर स्थापत्य, लोकजीवन और राजदरबारों से होते हुए आधुनिक मंच तक पहुँची है। भारतीय नृत्य की विशेषता यह है कि इसमें शरीर, मन और आत्मा का सामंजस्य दिखाई देता है। लय, ताल, भाव और अभिव्यक्ति के माध्यम से कलाकार न केवल कथा प्रस्तुत करता है, बल्कि दर्शकों को भावनात्मक रूप से भी जोड़ता है। इसी कारण भारतीय नृत्य को केवल प्रदर्शन कला नहीं, बल्कि ‘साधना’ के रूप में भी देखा जाता है।

भारतीय नृत्य की वैचारिक और शास्त्रीय नींव का उल्लेख प्राचीन ग्रंथ नाट्यशास्त्र में मिलता है, जिसे महर्षि भरतमुनि द्वारा रचित माना जाता है। यह ग्रंथ नाटक, संगीत और नृत्य के सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है। ‘रस’ और ‘भाव’ की अवधारणा इसी ग्रंथ से विकसित हुई, जो आज भी सभी शास्त्रीय नृत्य शैलियों की आत्मा मानी जाती है। नाट्यशास्त्र के अनुसार नृत्य तीन प्रमुख अंगों—नृत (शुद्ध नृत्य), नृत्य (भावयुक्त नृत्य) और नाट्य (नाटकीय प्रस्तुति)—में विभाजित है। इसके अतिरिक्त तांडव और लास्य की अवधारणाएँ भी भारतीय नृत्य दर्शन का महत्वपूर्ण आधार हैं। तांडव को ऊर्जा, शक्ति और वीरता का प्रतीक माना जाता है, जबकि लास्य को कोमलता, सौंदर्य और श्रृंगार से जोड़ा जाता है। इन दोनों के संतुलन से ही भारतीय नृत्य की पूर्णता मानी जाती है।

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा मान्यता प्राप्त आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ भारतीय परंपरा की विविधता को दर्शाती हैं। इनमें से प्रत्येक शैली का उद्भव अलग-अलग भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश में हुआ है। दक्षिण भारत का भरतनाट्यम तमिलनाडु के मंदिरों से जुड़ा हुआ है और इसकी विशेषता जटिल मुद्राएँ, स्पष्ट पदचालन और भावाभिव्यक्ति है।

उत्तर भारत की प्रमुख शैली कथक कथावाचन परंपरा से विकसित हुई, जिसमें घूमरदार चक्कर और तालबद्ध पद संचालन प्रमुख हैं। केरल की कथकली भव्य मेकअप और नाटकीय अभिनय के लिए जानी जाती है, जबकि मोहिनीअट्टम कोमल लय और स्त्री सौंदर्य की अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है।

पूर्वी भारत में ओडिसी की मूर्तिशिल्प जैसी मुद्राएँ और त्रिभंगी मुद्रा विशेष पहचान रखती है। आंध्र प्रदेश की कुचिपुड़ी में नृत्य और संवाद का सुंदर संयोजन दिखाई देता है। मणिपुर का मणिपुरी वैष्णव भक्ति परंपरा से प्रभावित है और इसमें कोमल गतियाँ प्रमुख हैं। वहीं असम का सत्रिया मठों की परंपरा से विकसित हुआ है। इन सभी शैलियों में भिन्नता होते हुए भी नाट्यशास्त्र के सिद्धांतों का मूल स्वरूप समान रूप से विद्यमान है।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य केवल तकनीकी कौशल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं, धार्मिक आख्यानों और दार्शनिक विचारों की प्रस्तुति का माध्यम भी है। रामायण, महाभारत और पुराणों की कथाएँ मंच पर जीवंत हो उठती हैं। कलाकार ‘अभिनय’ के चार प्रकार—आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक—के माध्यम से कथा को सजीव बनाता है। हस्तमुद्राएँ, नेत्राभिनय और मुखाभिनय दर्शकों तक सूक्ष्म भावनाएँ पहुँचाने का कार्य करते हैं। यही कारण है कि भारतीय नृत्य में दर्शक और कलाकार के बीच एक आध्यात्मिक संवाद स्थापित हो जाता है।

लोक नृत्य भारत की सामाजिक और क्षेत्रीय विविधता का प्रतिबिंब हैं। ये नृत्य किसी विशेष अवसर, पर्व या सामाजिक आयोजन से जुड़े होते हैं। गुजरात का गरबा नवरात्रि के दौरान देवी उपासना से संबंधित है और सामूहिक उत्साह का प्रतीक है। पंजाब का भांगड़ा फसल कटाई के आनंद को व्यक्त करता है। राजस्थान का घूमर पारंपरिक वेशभूषा और लयात्मक चक्कर के लिए प्रसिद्ध है। असम का बिहू वसंत ऋतु के स्वागत का प्रतीक है। इन लोक नृत्यों में शास्त्रीय अनुशासन की कठोरता कम, लेकिन ऊर्जा और सामूहिकता अधिक दिखाई देती है।

भारतीय नृत्य का ऐतिहासिक विकास मंदिरों और राजदरबारों से जुड़ा रहा है। प्राचीन काल में देवदासी परंपरा के माध्यम से नृत्य मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा था। मध्यकाल में मुगल दरबारों में कथक जैसी शैलियों को संरक्षण मिला।

औपनिवेशिक काल में कुछ शास्त्रीय नृत्यों को सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा, किंतु स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सांस्कृतिक पुनर्जागरण ने इन्हें पुनः प्रतिष्ठा दिलाई। आधुनिक युग में नृत्य संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक अकादमियों ने इन शैलियों को संरक्षित और प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारतीय सिनेमा और मीडिया ने भी नृत्य को वैश्विक पहचान दिलाई है। फिल्मों में शास्त्रीय और लोक तत्वों का मिश्रण नई शैली का निर्माण करता है, जिसे व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंच मिलती है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से देश की सांस्कृतिक समृद्धि को प्रदर्शित करते हैं। विभिन्न सांस्कृतिक उत्सवों और आदान-प्रदान कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय नृत्य विश्व समुदाय के बीच संवाद का माध्यम बना है।

आज के डिजिटल युग में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने नृत्य को नई दिशा दी है। युवा पीढ़ी पारंपरिक शैलियों को आधुनिक प्रस्तुति के साथ जोड़ रही है। नृत्य विद्यालयों और वर्कशॉप के माध्यम से प्रशिक्षण की पहुंच व्यापक हुई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि परंपरा और नवाचार के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, ताकि मूल स्वरूप की गरिमा अक्षुण्ण रहे।

भारतीय नृत्य न केवल सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, बल्कि राष्ट्रीय एकता का भी संदेश देता है। विविध भाषाओं, वेशभूषाओं और परंपराओं के बावजूद नृत्य की लय पूरे देश को एक सूत्र में बांधती है। यह कला रूप पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होकर भारतीय सभ्यता की निरंतरता को बनाए रखता है। आज आवश्यकता है कि इस समृद्ध धरोहर को संरक्षित करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को इससे जोड़ने के प्रयास निरंतर जारी रहें। भारतीय नृत्य की यह परंपरा समय के साथ विकसित होती रही है और भविष्य में भी अपनी जीवंतता और सांस्कृतिक महत्ता के साथ आगे बढ़ती रहेगी।

Geeta Singh
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