
नई दिल्ली। श्रीमद्भागवत महापुराण के जीवन-प्रवचन में आचार्य नारायण दास ने बताया कि “वसुदेव: सर्वम” का भाव सम्पूर्ण सृष्टि में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव कराना है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने भीतर और बाहर एक ही परम सत्ता को देखता है, वही सच्चे ज्ञान और भक्ति का अधिकारी बनता है।
आचार्य ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में भी यही उपदेश दिया कि “सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि”, अर्थात जो सबमें परमात्मा को और अपने भीतर सब जीवों को देखता है, वही वास्तविक ज्ञानी है।
उन्होंने बताया कि यह दृष्टिकोण जीवन में समरसता और प्रेम का भाव उत्पन्न करता है। धर्म, कर्म और आचरण की शुद्धता से ही व्यक्ति का मन निर्मल होता है और समाज में संतुलन स्थापित होता है।
आचार्य ने कहा कि आज के युग में जब भौतिकता बढ़ रही है, तब “वसुदेव: सर्वम” का संदेश मानवता को जोड़ने और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर करने का प्रेरक सूत्र है।






