गांव की चाय दुकान से: UPSC तक, देशल दान चरण की अद्भुत सफलता गाथा

संवाद 24 डेस्क। भारत में हर वर्ष लाखों युवा संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की कठिन सिविल सेवा परीक्षा देते हैं, जिसमें केवल चुनिंदा ही सफल होते हैं। ऐसे कठिन परिदृश्य में भी कुछ उत्कृष्ट व्यक्तियों की कहानियाँ रहती हैं, जो अपनी दृढ़ता, समर्पण और आत्मबल के चलते न सिर्फ चुनौतियों का सामना करते हैं, बल्कि इतिहास रचते हैं। राजस्थान के सुमलाई गांव के निवासी और आईएएस अधिकारी देशल दान चरण उन्हीं प्रेरणादायक व्यक्तियों में से एक हैं।
उनका सफ़र साधारण परिवार से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) तक पहुंचने का है — एक ऐसा सफ़र जिसने समाज की सोच को चुनौती दी और यह सिद्ध किया कि ईमानदार मेहनत, लक्ष्य की स्पष्ट समझ और अविरत प्रयास से कोई भी कठिन लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

साधारण परिवार से प्रारंभ
देशल दान चरण का जन्म राजस्थान के जैसलमेर जिले के सुमलाई गांव में हुआ। उनके पिता कुशलदान चरण गाँव में एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते थे, जिससे दस सदस्यीय परिवार का गुजारा कठिनाई से होता था।
परिवार की आर्थिक स्थिति वैसी नहीं थी कि बच्चों की शिक्षा और भविष्य की योजना बड़े स्तर पर की जा सके। इसके बावजूद, उनके पिता ने अपने बच्चों को शिक्षा की शक्ति पर विश्वास रखा और उनकी पढ़ाई के लिए कई बार कर्ज़ लेकर उन्हें आगे बढ़ाया।
देशल दान के सात भाई-बहन थे, लेकिन पढ़ाई की दिशा में केवल वे दोनों ही आगे बढ़ सके। परिवार की कठिनाइयों और सीमित संसाधनों के बीच, शिक्षा के प्रति उनका सम्मान बहुत गहरा था। इसीलिए उनके पिता ने कठिन परिस्थितियों में भी खुशियाँ त्यागकर शिक्षा को प्राथमिकता दी।

बचपन के अनुभव और प्रारंभिक लक्ष्य
बचपन से ही देशल के मन में एक स्पष्ट लक्ष्य था — “कुछ बड़ा करना।” अपने बड़े भाई, जो भारतीय नौसेना में थे, की कहानियाँ और प्रेरणा ने देशल के मन में देश सेवा की भावना को प्रबल किया। उनके भाई अक्सर उनसे कहते थे कि वे बड़ा लक्ष्य अपनाएँ — चाहे वह रक्षा सेवा हो या प्रशासनिक सेवा।
लेकिन जब देशल दसवीं कक्षा में थे, उन्हें जीवन का सबसे बड़ा सदमा मिला — उनके बड़े भाई का आईएनएस सिंधुरक्षक पनडुब्बी दुर्घटना में निधन हो गया। ऐसे कठिन समय में भी देशल ने टूटने की बजाय अपने लक्ष्य को और भी दृढ़ किया।
यह घटना देशल के जीवन में एक निर्णायक मोड़ बन गई। उन्होंने तय किया कि वे अपने भाई की आशा और देश सेवा के उद्देश्य को पूरा करेंगे। यही निर्णय उनके संघर्ष और सफलता की नींव बना।

शिक्षा की दिशा में पहला कदम: IIT-JEE की सफलता
10वीं के बाद, देशल ने कक्षा 12वीं की पढ़ाई पूरी की और JEE (Joint Entrance Examination) की तैयारी के लिए वे कोटा चले गए। JEE परीक्षा को क्रैक करना ही आसान नहीं माना जाता है, लेकिन देशल ने सीमित संसाधनों और बिना किसी विशेष कोचिंग सहायता के यह उपलब्धि हासिल की।
JEE में सफलता मिलने के बाद उन्हें IIT जबलपुर में प्रवेश मिला, जहाँ से उन्होंने B.Tech (बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी) की डिग्री पूरी की। आइआईटी से दी गई शिक्षा और अनुशासन की वजह से देशल की सोच अधिक व्यापक बनी, और यह उनकी विश्लेषण क्षमता और आत्मविश्वास को निखारने में अत्यंत सहायक रहा।
यहां यह उल्लेखनीय है कि IIT में पढ़ाई के दौरान भी देशल ने हमेशा UPSC जैसे शीर्ष लक्ष्य को अपनी प्राथमिकता के रूप में रखा। यहाँ उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के साथ-साथ खुद की रणनीति और अध्ययन पद्धति को प्राथमिकता दी, ताकि UPSC जैसी कठिन परीक्षा की तैयारी आसानी से आगे की जा सके।

IAS की तैयारी: चुनौतियाँ और संघर्ष
इंजीनियरिंग के पश्चात देशल के पास उच्च वेतन वाली नौकरी के कई अवसर थे, परंतु उन्होंने अपने मूल लक्ष्य को निरंतर बनाए रखा — भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाना। इसलिए IIT से स्नातक होने के बाद वे UPSC की तैयारी के लिए दिल्ली चले आए।
दिल्ली में तैयारी करना आसान नहीं था। आर्थिक संसाधन सीमित थे और कोचिंग की सुविधा नहीं उपलब्ध थी, लेकिन देशल ने स्वयं अध्यन और समय-प्रबंधन की तकनीकों को अपनाया। उन्होंने स्वयं से अध्ययन किया और उपलब्ध सस्ते संसाधनों — NCERT पुस्तकों, सरकारी प्रकाशनों और बहु-स्तरीय अध्ययन सामग्री का उपयोग किया।
यह बात भी प्रेरणादायक है कि देशल ने UPSC की तैयारी बिना किसी महँगे कोचिंग संस्थान के की — यह दर्शाता है कि संसाधन सीमित होने पर भी कठिन परिश्रम और आत्म-विश्वास से लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।

पहले प्रयास में UPSC में 82वीं रैंक
जनता लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा को देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक माना जाता है, जिसमें लाखों अभ्यर्थी भाग लेते हैं। इसमें सफलता प्राप्त करने के लिए कई बार कई साल लगते हैं। परंतु देशल दान चरण ने यह परीक्षा अपने पहले ही प्रयास में सफलतापूर्वक क्रैक की और अखिल भारतीय स्तर पर 82वीं रैंक हासिल की।
24 वर्ष की आयु में IAS के लिए चुना जाना अत्यंत सम्मान की बात है, क्योंकि यह न केवल कठिन प्रतिस्पर्धा का परिणाम है, बल्कि यह देशल की कठोर मेहनत का प्रमाण भी है। उनके पास यह सफलता बिना कोचिंग, कठिन परिस्थिति और सीमित संसाधनों के उपलब्ध थी — यह इस बात का प्रतीक है कि इच्छाशक्ति, आत्म-नियन्त्रण और समर्पण किसी भी बाधा को पार कर सकते हैं।

भावनात्मक संघर्ष: विपरीत परिस्थितियों से सामना
देशल का सफ़र केवल शैक्षिक संघर्ष तक सीमित नहीं रहा। उनके जीवन में कई भावनात्मक चुनौतियाँ भी आईं। बड़े भाई का निधन, आर्थिक चुनौतियाँ, शिक्षा के लिए कर्ज़ लेना — ये सभी अनुभव उन्हें टूटने के बजाय और अधिक मजबूत बनाए।
उनकी कहानी यह दर्शाती है कि कठिनाइयों से भागने के बजाय उनका सामना करने से व्यक्ति की मानसिक दृढ़ता विकस्थित होती है। देशल ने अपनी भावनात्मक पीड़ा को दृढ़ प्रयास में बदला और इसे अपनी सफलता का आधार बनाया।

सामाजिक संदेश और प्रेरणा
देशल दान चरण की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है। यह अनेकों ऐसे युवा-आशावादियों के लिए एक मिसाल है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े लक्ष्य पाना चाहते हैं। इस कहानी से कई युवा यह सीख सकते हैं कि—
संघर्ष सफलता की नींव है।
कोचिंग महँगी न हो तो भी UPSC जैसे कठिन लक्ष्य तय किए जा सकते हैं।
विपरीत परिस्थितियों में आत्म-विश्वास और निरंतर प्रयास ही विजय का रास्ता हैं।
परिवार का विश्वास और समर्थन लक्ष्य को साकार करने में निर्णायक भूमिका निभाता है।
देशल की कहानी उन्हें प्रेरित करती है कि सपने बड़े रखें और उन्हें पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करने से पीछे न हटें।

देशल दान चरण की यह सफ़लता कहानी अनमोल है, क्योंकि यह सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि का प्रतीक नहीं है बल्कि यह हर संघर्षशील भारतीय युवा के लिए प्रेरणा-स्तम्भ है। उन्होंने न केवल अपने परिवार की आर्थिक चुनौतियों का सामना किया, बल्कि सर्वश्रेष्ठ भारतीय परीक्षा — UPSC — को अपने पहले प्रयास में क्रैक किया।
उनकी कथा यह संदेश देती है कि सफलता की राह में बाधाएँ आएँगी, पर धैर्य, समर्पण, आत्म-विश्वास और सही दिशा के साथ कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। देशल दान चरण की कहानी भविष्य के लाखों युवाओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी, जो यह बताएगी कि कठिन परिश्रम और दृढ़ निश्चय ही सफलता की कुंजी है।

Geeta Singh
Geeta Singh

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