पड़ोसी मुल्क में अल्पसंख्यकों पर प्रहार: क्या ‘बहानेबाजी’ कर रही है बांग्लादेश की अंतरिम सरकार? भारत ने कड़े लहजे में जताई चिंता!

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​संवाद 24 नई दिल्ली। पड़ोसी देश बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदू समुदाय के खिलाफ हो रही हिंसा और अत्याचार की घटनाओं ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल तेज कर दी है। भारत सरकार ने इस गंभीर मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी है। राज्यसभा में एक लिखित जवाब के दौरान विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि भारत इन घटनाओं पर न केवल कड़ी नजर रख रहा है, बल्कि वह इस मामले में किसी भी तरह की ‘बहानेबाजी’ बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं है।

​हमलों की भयावहता और भारत का स्टैंड
विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने संसद को सूचित किया कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के घरों, व्यवसायों और पूजा स्थलों को निशाना बनाए जाने की खबरें लगातार मिल रही हैं। भारत ने राजनीतिक और राजनयिक, दोनों स्तरों पर ढाका के अधिकारियों के सामने यह मुद्दा बार-बार उठाया है। भारत का कहना है कि यह बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह अपने सभी नागरिकों, विशेषकर अल्पसंख्यकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे।

​’निजी दुश्मनी’ का नाम देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश?
भारत ने बांग्लादेश सरकार के उस रवैये पर भी गहरी नाराजगी जताई है, जिसमें इन सांप्रदायिक हमलों को ‘निजी रंजिश’ या ‘राजनीतिक मतभेद’ बताकर खारिज करने की कोशिश की जाती है। भारत का मानना है कि इस तरह की दलीलें न केवल अपराधियों का मनोबल बढ़ाती हैं, बल्कि अल्पसंख्यकों के मन में डर और असुरक्षा की भावना को और गहरा करती हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी स्पष्ट किया कि इन घटनाओं को ‘अतिशयोक्ति’ कहकर टाला नहीं जा सकता।

​क्या कहते हैं जमीनी आंकड़े?
बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद (BHBCUC) की रिपोर्ट के अनुसार, हाल के महीनों में हिंसा की घटनाओं में भारी वृद्धि हुई है। रिपोर्टों में दीपू चंद्र दास की हत्या और खोकन चंद्र दास को जिंदा जलाए जाने जैसी रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाओं का जिक्र है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को आगाह किया है कि वह मानवाधिकारों की रक्षा करने में विफल रही है। आगामी 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनावों से पहले इस तरह का माहौल लोकतंत्र और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है।

​कूटनीतिक दबाव और भविष्य की राह
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह उम्मीद करता है कि मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार इन घटनाओं की गहन जांच करेगी और हत्या, आगजनी और हिंसा के सभी दोषियों को बिना किसी बहाने के न्याय के कटघरे में लाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी पूर्व में बांग्लादेशी नेतृत्व के साथ बातचीत में इन चिंताओं को प्रमुखता से रखा है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा केवल एक आंतरिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की स्थिरता और मानवाधिकारों के संरक्षण से जुड़ा एक बड़ा प्रश्न बन गया है। अब देखना यह है कि क्या ढाका भारत की इन कड़े शब्दों वाली चेतावनियों पर कोई ठोस कार्रवाई करता है या फिर ‘बहानेबाजी’ का दौर यूं ही जारी रहता है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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