ट्रंप का ईरान को अल्टीमेटम-डील करो या और भी विनाशकारी परिणाम भुगतना होगा
Share your love

संवाद 24 नई दिल्ली । संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को एक बार फिर बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर तेहरान जल्द से जल्द परमाणु समझौते के लिए बातचीत की मेज़ पर नहीं आता, तो उसे “और भी विनाशकारी” परिणाम का सामना करना पड़ेगा — एक ऐसी कार्रवाई जिसका असर जून 2025 में हुए हवाई हमलों से भी कहीं ज्यादा गंभीर होगा।
अमेरिकी “अर्माडा” की दिशा — क्या संकेत मिल रहे हैं?
ट्रंप ने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर लिखा कि एक बड़ी अमेरिकी नौसैनिक तिकड़ी — जिसमें हिंडलर विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन प्रमुख है — मध्य पूर्व की ओर तेजी से बढ़ रही है और वह ईरान के लिए “तैयार, तत्पर और सशक्त” है। उन्होंने कहा कि “समय घट रहा है” और अगर ईरान ने बातचीत नहीं की तो अगला हमले “पहले से कहीं अधिक भयानक” होगा। ट्रंप की भाषा यह दर्शाती है कि अमेरिका न सिर्फ कूटनीतिक दबाव बढ़ा रहा है बल्कि सैन्य विकल्प को भी पूर्ण रूप से तैयार रखता है। उन्होंने अपने संदेश में स्पष्ट कहा, “NO NUCLEAR WEAPONS — ऐसी डील जो सभी पक्षों के लिए लाभदायक हो।”
तेहरान की प्रतिक्रिया — खुला विरोध या बातचीत की इच्छा?
ईरान ने ट्रंप के बयान का तुरंत जवाब देते हुए कहा है कि यदि उस पर दबाव और धमकियों के साथ बातचीत की कोशिश की गई, तो वह इस तरह की “डिप्लोमेसी” को स्वीकार नहीं करेगा। ईरानी विदेश विभाग के अधिकारियों ने कहा है कि अगर संघर्ष थोपने की कोशिश की गई, तो तेहरान “अब तक से कहीं अधिक तीव्र” तरीके से खुद का बचाव करेगा। ईरान का कहना है कि वह किसी भी हमले को अपने विरुद्ध “पूर्ण युद्ध” के रूप में माना जाएगा और इसके कड़े परिणाम होंगे — भले ही वह हमला छोटा या बड़ा क्यों न हो।
पिछले हमले और वर्तमान तनाव — क्या सब कुछ शांत है?
यह तनाव अचानक नहीं आया है। जून 2025 में अमेरिका और इज़राइल ने ईरानी परमाणु सुविधाओं पर उन्नत हवाई हमले किए थे, जिसे “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” कहा गया। ट्रंप ने अब उसे उदाहरण के रूप में पेश किया है और कहा कि अगर बातचीत नहीं सफल हुई तो अगला हमला इससे भी भयंकर होगा। साथ ही, अमेरिका ने 2018 में संयुक्त परमाणु समझौते (JCPOA) से हटकर ईरान पर ‘मैक्सिमम प्रेशर’ यानी उच्चतम दबाव नीति को फिर से लागू कर रखा है, जिससे आर्थिक प्रतिबंधों को और कड़ा किया गया है।
क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव
मध्य पूर्व में अमेरिकी नौसेना बलों की तैनाती ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है। यूएई और अन्य खाड़ी देश सीधे किसी सैन्य हमले का समर्थन नहीं कर रहे हैं, जबकि इज़राइल और कुछ अन्य गठबंधन देश कूटनीतिक हल को तरजीह दे रहे हैं। इधर, ईरान में पिछले महीनों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं, जिनमें कई लोग मारे गए या घायल हुए हैं। अमेरिका ने इस पर ईरान सरकार की कड़ी आलोचना भी की है, जिससे दोनों देशों के बीच तल्खी और बढ़ी है।
राजनीति या वास्तविक युद्ध?
कुछ अमेरिकी सांसदों और रक्षा विशेषज्ञों ने ट्रंप के कड़े रुख पर सवाल भी उठाए हैं। उन्होंने कहा कि युद्ध के बिना एक विस्तृत रणनीति या योजना तैयार करना आवश्यक है, क्योंकि सैन्य टकराव के परिणामों का सीधा प्रभाव सिर्फ अमेरिका और ईरान पर ही नहीं बल्कि पूरे विश्व पर पड़ सकता है। जहाँ ट्रंप बार-बार बातचीत के लिए कहा है, वहीं ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह केवल समान स्तर पर, बिना धमकियों के बातचीत को ही स्वीकार करेगा। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इसी आधार पर ही द्विपक्षीय वार्ता या समझौता संभव हो सकता है।






