संस्कारों की कसौटी पर आज का समाज: बुजुर्गों की भूमिका और हमारी जिम्मेदारी
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संवाद 24 डेस्क। भारतीय संस्कृति की आत्मा में जिन मूल्यों की सबसे गहरी छाप दिखाई देती है, उनमें बड़े-बुजुर्गों का सम्मान और उनकी सेवा सर्वोपरि है। यह केवल एक सामाजिक औपचारिकता नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जीवन-पद्धति, संस्कार और सोच का अभिन्न हिस्सा है।
भारतीय समाज में बुजुर्गों को अनुभव, ज्ञान और नैतिक मार्गदर्शन का स्रोत माना गया है। यही कारण है कि परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में उनकी भूमिका को सदैव केंद्रीय स्थान दिया गया। आधुनिकता और वैश्वीकरण के इस दौर में, जब जीवनशैली और पारिवारिक ढांचे तेजी से बदल रहे हैं, तब भी बुजुर्गों के सम्मान की अवधारणा भारतीय पहचान को मजबूती से थामे हुए है।
भारतीय परंपरा में परिवार को समाज की सबसे छोटी लेकिन सबसे मजबूत इकाई माना गया है। संयुक्त परिवार प्रणाली, जो कभी भारत की पहचान थी, बुजुर्गों के सम्मान और सेवा की सबसे जीवंत मिसाल है। इस व्यवस्था में दादा-दादी, नाना-नानी केवल परिवार के सदस्य नहीं होते थे, बल्कि वे बच्चों के प्रथम शिक्षक, नैतिक संरक्षक और संस्कारों के संवाहक होते थे। उनके अनुभव से परिवार के निर्णय तय होते थे और उनके आशीर्वाद को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी माना जाता था। यह परंपरा केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को भी मजबूत करती थी।
धार्मिक और दार्शनिक दृष्टि से भी भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों का सम्मान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। वेदों, उपनिषदों, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में माता-पिता और गुरु को ईश्वर के समान माना गया है। “मातृदेवो भवः, पितृदेवो भवः, आचार्यदेवो भवः” जैसे सूत्र केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा तय करते हैं। इन शिक्षाओं का मूल भाव यह है कि जिसने हमें जीवन दिया, ज्ञान दिया और मार्ग दिखाया, उसकी सेवा और सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। बुजुर्गों की सेवा को धर्म और पुण्य से जोड़कर देखा गया, जिससे यह मूल्य समाज में गहराई से स्थापित हो सका।
बुजुर्गों का सम्मान केवल आदर-भाव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यवहारिक जीवन में उनकी देखभाल, सुरक्षा और भावनात्मक सहयोग के रूप में भी प्रकट हुआ। पारंपरिक भारतीय समाज में वृद्धावस्था को बोझ नहीं, बल्कि जीवन का सम्मानित चरण माना गया। इस अवस्था में व्यक्ति अनुभव और विवेक से परिपूर्ण होता है, इसलिए उसकी बातों को महत्व दिया जाता है। परिवार में निर्णय लेते समय बुजुर्गों की राय को प्राथमिकता देना, उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखना और उन्हें सुरक्षित व सम्मानजनक जीवन देना सामाजिक दायित्व माना गया।
समय के साथ भारत में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन हुए हैं। शहरीकरण, औद्योगीकरण और रोजगार के लिए पलायन ने संयुक्त परिवारों को धीरे-धीरे एकल परिवारों में बदल दिया है। इसके परिणामस्वरूप बुजुर्गों की स्थिति में भी बदलाव देखने को मिला है। कई बार वे अकेलेपन, उपेक्षा और असुरक्षा का अनुभव करते हैं। हालांकि यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है, लेकिन इसके बावजूद भारतीय समाज में बुजुर्गों के सम्मान की भावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज भी अधिकांश परिवार अपने सामर्थ्य के अनुसार माता-पिता और वरिष्ठजनों की सेवा को अपना कर्तव्य मानते हैं।
आधुनिक भारत में बुजुर्गों की भूमिका को नए संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। आज के वरिष्ठ नागरिक केवल आश्रित नहीं, बल्कि समाज के सक्रिय और उपयोगी सदस्य हैं। वे अपने अनुभव के माध्यम से युवाओं का मार्गदर्शन कर सकते हैं, सामाजिक कार्यों में योगदान दे सकते हैं और सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ा सकते हैं। अनेक बुजुर्ग आज शिक्षा, सामाजिक सेवा और परामर्श जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। यह दर्शाता है कि सम्मान और सेवा का अर्थ केवल देखभाल तक सीमित नहीं, बल्कि उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान और अवसर देना भी है।
सरकार और समाज दोनों स्तरों पर बुजुर्गों के कल्याण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। वृद्धावस्था पेंशन, स्वास्थ्य सेवाएं, वरिष्ठ नागरिक केंद्र और कानूनी संरक्षण जैसे कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं। इन पहलों का उद्देश्य बुजुर्गों को सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन प्रदान करना है। हालांकि नीतियों के साथ-साथ सामाजिक संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक है। जब तक परिवार और समाज स्तर पर बुजुर्गों के प्रति सम्मान की भावना मजबूत नहीं होगी, तब तक केवल योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी।
बुजुर्गों के सम्मान का सीधा संबंध युवाओं के संस्कारों से भी है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। यदि वे अपने माता-पिता को दादा-दादी या नाना-नानी का आदर करते हुए देखते हैं, तो वही व्यवहार वे भविष्य में अपनाएंगे। इस प्रकार बुजुर्गों का सम्मान पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होने वाला मूल्य है। शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक संस्थाओं की भी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों और युवाओं में इस संवेदनशीलता को विकसित करें।
मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। समाचार माध्यम, टीवी, फिल्में और डिजिटल प्लेटफॉर्म यदि बुजुर्गों के सकारात्मक चित्रण को बढ़ावा दें, तो समाज में उनके प्रति दृष्टिकोण और अधिक संवेदनशील बन सकता है। बुजुर्गों को केवल समस्या या बोझ के रूप में दिखाने के बजाय, उनके अनुभव, योगदान और गरिमा को उजागर करना समय की मांग है। इससे समाज में सम्मान और सहानुभूति की भावना मजबूत होगी।
भारतीय संस्कृति में सेवा को सर्वोच्च मूल्य माना गया है। बुजुर्गों की सेवा केवल दायित्व नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष और सामाजिक संतुलन का स्रोत है। जब युवा पीढ़ी अपने वरिष्ठजनों की देखभाल करती है, तो न केवल परिवार मजबूत होता है, बल्कि समाज में आपसी विश्वास और सहयोग की भावना भी बढ़ती है। यह संस्कृति हमें सिखाती है कि विकास केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों के संरक्षण से भी मापा जाता है।
आज के बदलते समय में यह आवश्यक है कि हम आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाए रखें। तकनीकी प्रगति और व्यस्त जीवनशैली के बावजूद बुजुर्गों के लिए समय निकालना, उनकी बात सुनना और उन्हें सम्मान देना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। यह केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की नींव भी है। जिस समाज में बुजुर्ग सुरक्षित और सम्मानित होते हैं, वह समाज नैतिक रूप से अधिक मजबूत और स्थिर होता है।
अंततः कहा जा सकता है कि बड़े बुजुर्गों का सम्मान और सेवा भारतीय संस्कृति का केवल एक पहलू नहीं, बल्कि उसका आधारस्तंभ है। यह मूल्य हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और मानवीयता की याद दिलाता है। बदलते सामाजिक ढांचे के बावजूद यदि हम इस परंपरा को जीवित रख पाते हैं, तो भारतीय समाज न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रहेगा, बल्कि भावनात्मक और नैतिक रूप से भी।






