दावोस में बदला सुर: ट्रंप-जेलेंस्की मुलाकात के बाद युद्ध रोकने की गूंज

संवाद 24 नई दिल्ली। दुनिया के सबसे प्रभावशाली मंचों में शामिल वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठकों के दौरान दावोस से एक बड़ा कूटनीतिक संकेत सामने आया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की की मुलाकात के बाद रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल देखी जा रही है। इस मुलाकात के बाद ट्रंप का यह कहना कि “यह युद्ध अब रुकना चाहिए”, वैश्विक कूटनीति में संभावित बदलाव की ओर इशारा करता है।

दावोस में बंद कमरे की बातचीत
सूत्रों के अनुसार, यह बातचीत औपचारिक मंच से हटकर हुई, लेकिन इसके मायने बेहद गहरे हैं। यूक्रेन युद्ध को लेकर अब तक सख्त रुख अपनाने वाले ट्रंप के सुर में आया यह बदलाव अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चौंकाने वाला है। माना जा रहा है कि बातचीत के दौरान मानवीय संकट, आर्थिक नुकसान और वैश्विक अस्थिरता जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा हुई।

युद्ध से थकी दुनिया
लगभग दो वर्षों से चल रहे इस युद्ध ने न सिर्फ यूक्रेन और रूस को बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। ऊर्जा संकट, खाद्य आपूर्ति में बाधा और बढ़ती महंगाई ने कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डाला है। ऐसे में किसी बड़े वैश्विक नेता की ओर से युद्ध रोकने की अपील को महज बयानबाज़ी के तौर पर नहीं देखा जा रहा।

ट्रंप के बयान के मायने
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि वे आगामी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में एक मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। यदि वे सत्ता में लौटते हैं, तो अमेरिकी विदेश नीति की दिशा बदल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान रूस-यूक्रेन संघर्ष को बातचीत के रास्ते हल करने की संभावनाओं को मजबूत करता है।

जेलेंस्की की रणनीति
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की लगातार अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं। दावोस जैसे मंच पर ट्रंप से मुलाकात उनके लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जेलेंस्की यह संदेश देने में सफल रहे कि युद्ध सिर्फ यूक्रेन का नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता का सवाल बन चुका है।

रूस पर बढ़ता दबाव
इस मुलाकात के बाद रूस पर कूटनीतिक दबाव बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। यदि अमेरिका के भीतर से ही युद्धविराम की आवाज़ तेज होती है, तो अंतरराष्ट्रीय समीकरण बदल सकते हैं। हालांकि, रूस की ओर से अभी इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

क्या वाकई रुकेगा युद्ध?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह बयान किसी ठोस पहल में बदलेगा या फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक संदेश बनकर रह जाएगा। इतिहास गवाह है कि युद्ध समाप्त करने के लिए सिर्फ बयान नहीं, बल्कि ठोस कूटनीतिक कदमों की जरूरत होती है। फिर भी, दावोस से उठी यह आवाज़ उम्मीद की एक नई किरण जरूर दिखाती है।
अब दुनिया की नजर इस पर टिकी है कि इस मुलाकात के बाद अमेरिका, यूरोप और अन्य शक्तिशाली देश क्या कदम उठाते हैं। यदि बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो यह युद्धविराम की दिशा में पहला बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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