तीस्ता नदी परियोजना पर मचा भू-राजनीतिक घमासान, भारत की बढ़ी चिंता
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संवाद 24 नई दिल्ली। बांग्लादेश में प्रस्तावित तीस्ता नदी परियोजना अब केवल एक जल प्रबंधन योजना नहीं रह गई है, बल्कि यह भारत, बांग्लादेश और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गई है। चीन की सक्रिय भूमिका और परियोजना का भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ के बेहद करीब होना, इस पूरे मामले को संवेदनशील बना रहा है।
तीस्ता नदी परियोजना क्या है और क्यों है अहम
तीस्ता नदी बांग्लादेश के उत्तरी हिस्से और भारत के पश्चिम बंगाल के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। बांग्लादेश लंबे समय से नदी के जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और कृषि विकास के लिए एक व्यापक मास्टर प्लान की मांग करता रहा है। अब इस योजना में चीन की तकनीकी और आर्थिक भागीदारी प्रस्तावित की गई है, जिससे परियोजना को नए संसाधन मिलने की संभावना बनी है।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार का चीन की ओर झुकाव
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने तीस्ता नदी के संरक्षण और विकास के लिए चीन को साझेदार बनने का न्योता दिया है। उनका मानना है कि चीन के पास बड़े नदी प्रबंधन और बुनियादी ढांचे का व्यापक अनुभव है, जिसका लाभ बांग्लादेश को मिल सकता है। इसी क्रम में चीनी राजनयिकों को परियोजना क्षेत्र का दौरा भी कराया गया।
चिकन नेक कॉरिडोर के पास परियोजना से भारत की चिंता
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि तीस्ता नदी परियोजना स्थल सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद नजदीक स्थित है। यह संकीर्ण भूभाग भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्य भूमि से जोड़ता है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में चीन की मौजूदगी भारत की रणनीतिक सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकती है।
स्थानीय स्तर पर विरोध और राजनीतिक हलचल
बांग्लादेश में इस परियोजना को लेकर विरोध के स्वर भी उठने लगे हैं। कई छात्र संगठनों और स्थानीय लोगों ने आशंका जताई है कि विदेशी भागीदारी से राष्ट्रीय हित प्रभावित हो सकते हैं। उनका कहना है कि जल बंटवारे, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय आबादी के अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
चीन की बढ़ती मौजूदगी और क्षेत्रीय प्रभाव
चीन पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण एशिया में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के जरिए अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। तीस्ता नदी परियोजना को भी इसी रणनीति के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि यह कदम चीन को भारत के बेहद नजदीक एक और रणनीतिक बढ़त दिला सकता है।
भारत-बांग्लादेश के पुराने जल विवाद की पृष्ठभूमि
भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी के जल बंटवारे को लेकर वर्षों से बातचीत चल रही है, लेकिन अब तक कोई स्थायी समझौता नहीं हो पाया है। बांग्लादेश को उम्मीद थी कि भारत के साथ सहमति बनेगी, लेकिन लंबित समाधान के कारण अब वह वैकल्पिक साझेदारों की ओर देख रहा है।
चीन यात्रा और कूटनीतिक संदेश
मोहम्मद यूनुस की हालिया चीन यात्रा को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। इस दौरान आर्थिक सहयोग, तकनीकी मदद और दीर्घकालिक नदी प्रबंधन योजनाओं पर चर्चा हुई। इससे यह संकेत मिला कि बांग्लादेश अब अपनी विदेश नीति को बहु-दिशात्मक बनाने की कोशिश कर रहा है।
दक्षिण एशिया में बदलती रणनीतिक तस्वीर
विशेषज्ञों का मानना है कि तीस्ता नदी परियोजना केवल जल संसाधन से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति का प्रतीक बन चुकी है। भारत, चीन और बांग्लादेश के रिश्तों पर इसका असर आने वाले समय में और गहराता दिख सकता है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि भारत इस स्थिति पर क्या कूटनीतिक कदम उठाता है और बांग्लादेश किस संतुलन के साथ अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय संबंधों को आगे बढ़ाता है। तीस्ता नदी परियोजना आने वाले समय में पूरे क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित करने वाली साबित हो सकती है।






