मायावती का 2027 का बड़ा रणनीतिक मोड़: अकेले चुनाव या गठबंधन की नई शर्त
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संवाद 24 लखनऊ। उत्तरी भारत की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने आगामी 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर अपने पार्टी के चुनावी पटल का बड़ा संकेत दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि बसपा इस बार अकेले चुनाव लड़ेगी, लेकिन भविष्य में गठबंधन की संभावना भी एक शर्त पर खुली रखी है — खासकर तब, जब किसी सहयोगी दल से वोट ट्रांसफर हो सके।
जन्मदिन पर बड़ा ऐलान
अपने 70वें जन्मदिन पर मायावती ने लखनऊ में प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि बसपा 2027 के विधानसभा चुनावों में किसी के साथ गठबंधन नहीं करेगी, और सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पार्टी को पूर्ण बहुमत से सत्ता में लौटना चाहिए और वो इसके लिए नेतृत्व से लेकर कार्यकर्ता तक पूरी तरह समर्पित हैं।
गठबंधन की शर्त: वोट ट्रांसफर
मायावती ने स्पष्ट किया कि हाल के अनुभवों ने उन्हें यह सिखाया है कि गठबंधन में बसपा के वोट अक्सर सहयोगी दलों को ट्रांसफर हो जाते हैं, लेकिन उनके लिए वापस वोट नहीं आता। इसलिए उन्होंने कहा कि जब तक कोई दल यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि उसके वोट बसपा में स्थानांतरित होंगे, तब तक गठबंधन की सोच लागू नहीं होगी।
पुरानी साझेदारियों से सीख
ऐतिहासिक तौर पर देखा जाये तो बसपा ने पहले भी चुनावों में गठबंधन का सफ़ल परिणाम नहीं देखा है। पार्टी प्रमुख ने बताया कि ऐसे कई बार हुए हैं जब सहयोगी दलों को बेहतर परिणाम मिले लेकिन बसपा को अपेक्षित फायदा नहीं मिला। यही कारण है कि इस बार उनकी रणनीति स्वतंत्र चुनाव लड़ना है।
व्यापक चुनावी संदेश
मायावती ने न केवल दलित वोटबैंक पर ध्यान केंद्रित किया, बल्कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और किसान समुदायों को भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि बसपा सरकारों ने हमेशा सभी समुदायों को सम्मान, समान अवसर और सुरक्षा दी है। उन्होंने अन्य पार्टियों पर भी निशाना साधा कि वे केवल जातीय राजनीति कर रहे हैं।
विपक्षियों पर आरोप
उन्होंने भाजपा, कांग्रेस और सपा पर आरोप लगाया कि उनके शासन में समाज के पिछड़े और दलित वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। मायावती ने कहा कि बसपा के शासनकाल में ईमानदार विकास और सामाजिक न्याय के कई कदम उठाये गए थे, जबकि विरोधी पार्टियाँ केवल वादे करती रहीं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बसपा की यह नई रणनीति उत्तर प्रदेश की सत्ता की दौड़ को और भी तीव्र और रोचक बना सकती है। बसपा का फोकस अब सिर्फ पारंपरिक मतदाता ही नहीं, बल्कि उन वर्गों पर भी है जो पिछले चुनावों में अन्य दलों की ओर मुड़े थे। अगर बसपा को सभी वर्गों का समर्थन मिला, तो 2027 की राजनीति में ‘हाथी’ फिर से प्रमुख भूमिका निभा सकता है।






