बीएमसी चुनाव से पहले बदले सियासी संकेत, शरद पवार एनडीए समीकरण पर बढ़ी अटकलें
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संवाद 24 मुंबई। महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों के मतदान से पहले ही सियासत तेज हो गई है। गठबंधन टूटने-जुड़ने के संकेत साफ नजर आने लगे हैं और नतीजों के बाद बड़े राजनीतिक फेरबदल की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा। इन चुनावों का असर सिर्फ राज्य की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि केंद्र की सत्ता समीकरणों पर भी पड़ेगा।
राज्य की 29 महानगरपालिकाओं के लिए 15 जनवरी को मतदान प्रस्तावित है। चुनावी मैदान में सत्तारूढ़ महायुति के घटक दल—भाजपा, शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी—कई शहरों में एक-दूसरे के खिलाफ हैं। इसके बावजूद एनडीए के टूटने के संकेत फिलहाल कमजोर नजर आते हैं। इसके उलट विपक्षी महाविकास आघाड़ी और I.N.D.I.A. ब्लॉक बिखराव की स्थिति में दिख रहा है।
बीएमसी चुनाव का महत्व सबसे ज्यादा माना जा रहा है। करीब 75 हजार करोड़ रुपये के बजट वाली मुंबई महानगरपालिका पर पिछले 25 वर्षों से ठाकरे परिवार का दबदबा रहा है। इस बार हालात बदले हुए हैं। अगर बीएमसी हाथ से निकलती है तो ठाकरे परिवार की राजनीतिक ताकत को बड़ा झटका लग सकता है। इसी चुनौती को देखते हुए उद्धव ठाकरे ने लंबे समय बाद राज ठाकरे के साथ राजनीतिक तालमेल बनाया है।
हालांकि यह समीकरण सभी विपक्षी दलों को रास नहीं आ रहा। कांग्रेस के लिए राज ठाकरे के साथ खुला गठबंधन असहज माना जा रहा है, क्योंकि उनके हिंदी और उत्तर भारतीय विरोधी बयानों को लेकर पार्टी पहले ही असमंजस में है। समाजवादी पार्टी के अलग होने के बाद विपक्षी खेमे की एकजुटता और कमजोर हुई है।
इधर, सबसे अहम संकेत राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में दिख रहे हैं। पुणे और पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका में शरद पवार और अजित पवार गुटों का भाजपा के खिलाफ एक साथ आना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। माना जा रहा है कि चुनाव नतीजों के बाद दोनों गुटों के बीच सुलह और संभावित विलय की राह खुल सकती है।
यदि ऐसा होता है तो इसका असर सीधे केंद्र और राज्य की सत्ता राजनीति पर पड़ेगा। शरद पवार और सुप्रिया सुले की वापसी मजबूत स्थिति में होती है तो एनडीए के साथ नए समीकरणों की अटकलें भी तेज हो सकती हैं। बीएमसी चुनाव के नतीजे तय करेंगे कि महाराष्ट्र की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी और क्या शरद पवार भविष्य में एनडीए के और करीब आते हैं या नहीं।






