मध्य-पूर्व संकट की आंच भारत तक: अमेरिकी हमले की आशंका के बीच ईरानी विदेश मंत्री का दौरा रद्द, चाबहार एजेंडा अधर में
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संवाद 24 नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच भारत-ईरान कूटनीति को झटका लगा है। अब्बास अराग्ची, जो 15–16 जनवरी को भारत दौरे पर आने वाले थे, उन्होंने अपनी यात्रा रद्द कर दी है। यह फैसला ईरान में तेज होते आंतरिक विरोध प्रदर्शनों और संभावित अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आशंका के मद्देनज़र लिया गया है।
ईरान ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उस पर हमला हुआ तो वह इजराइल और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाएगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों को समर्थन देने के संकेत दिए हैं और “विकल्प खुले होने” की बात कही है। इन संकेतों ने पूरे क्षेत्र में संघर्ष की आशंका को और गहरा कर दिया है।
भारत अलर्ट मोड पर
सूत्रों के अनुसार, नई दिल्ली हालात पर करीबी नजर बनाए हुए है। यदि संघर्ष शुरू होता है तो ईरान में मौजूद भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालने की आपात योजना पहले से तैयार रखी गई है। इससे पहले भी क्षेत्रीय तनाव के दौरान भारत को अपने नागरिकों का रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना पड़ा था।
चाबहार बना कूटनीतिक चिंता का केंद्र
अराग्ची की भारत यात्रा का सबसे अहम एजेंडा चाबहार बंदरगाह था। यह वही परियोजना है जिसे भारत रणनीतिक रूप से मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का प्रवेश द्वार मानता है।
चाबहार बंदरगाह का संचालन 2024 से India Ports Global Limited कर रही है और यह समझौता 10 वर्षों के लिए है। हालांकि, इस परियोजना को लेकर भारत को अमेरिका से मिली प्रतिबंध छूट अप्रैल में समाप्त होने वाली है, जिस पर इस यात्रा के दौरान अहम बातचीत होनी थी।
शीर्ष बैठकों पर लगा विराम
इस दौरे में अराग्ची की मुलाकात विदेश मंत्री एस जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल से प्रस्तावित थी। इन बैठकों में क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सहयोग और चाबहार के भविष्य पर चर्चा होनी थी, जो अब अनिश्चितकाल के लिए टल गई है।
रणनीतिक दांव पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान पर बाहरी सैन्य हमला होता है, तो उसका सीधा असर भारत की पश्चिम एशिया नीति और चाबहार परियोजना पर पड़ेगा। चाबहार न सिर्फ अफगानिस्तान, बल्कि मध्य एशिया और रूस से जुड़े व्यापारिक गलियारों के लिए भी भारत की रणनीतिक कड़ी है।
फिलहाल, अराग्ची का दौरा रद्द होना सिर्फ एक कूटनीतिक घटना नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि मध्य-पूर्व में हालात तेजी से टकराव की ओर बढ़ रहे हैं, और उसका असर भारत की विदेश नीति और रणनीतिक परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है।






