क्यों गुदगुदी करने पर हम हंसते हैं? मस्तिष्क के रहस्यों से जुड़ी है यह अजीब लेकिन मज़ेदार प्रतिक्रिया
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संवाद 24 डेस्क। आपने खुद को या अपने दोस्तों को गुदगुदी होने पर हँसी से लोटते देखा तो यह बात शायद आपको अजीब लगे, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि असल में हमारे दिमाग में क्या होता है? गुदगुदी सिर्फ एक साधारण मज़ाक या खेल नहीं है, बल्कि यह हमारी जैविक, सामाजिक और मानसिक प्रणाली का एक जटिल हिस्सा है, जो हमारी विकास यात्रा का भी एक अहम संकेतक है।
गुदगुदी एक “जबरदस्ती की हँसी” है
हम अक्सर गुदगुदी होने पर जोर-जोर से हँसते हैं, लेकिन यह हँसी वास्तव में हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं होती। जब कोई व्यक्ति हमें गुदगुदी करता है, तो हमारा शरीर खुद-ब-खुद हँसी प्रतिक्रिया देता है और हम उसे रोक ही नहीं पाते। सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब हम खुद को गुदगुदी करने की कोशिश करते हैं, तो यह प्रतिक्रिया नहीं होती! यह विरोधाभास ही गुदगुदी के विज्ञान की सबसे दिलचस्प उड़ान है, हमारी हँसी तब भी फूट पड़ती है जब हमें यह बिल्कुल पसंद नहीं होता, लेकिन हम इसे नियंत्रित नहीं कर पाते।
दिमाग की एक अनोखी प्रतिक्रिया
वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारे दिमाग में एक विशेष तंत्र काम करता है जब हमें गुदगुदी होती है। हमारी दिमाग की कुछ हिस्से खासकर वह हिस्से जो स्पर्श, भावनाएँ और सामाजिक संकेतों को प्रोसेस करते हैं, सक्रिय हो जाते हैं। जब कोई हमें गुदगुदी करता है, तो हमारा हाइपोथैलेमस सक्रिय होता है, यह वही हिस्सा है जो “लड़ाई या उड़ान” (fight-or-flight) प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है। इसका मतलब है कि हमारी हँसी सिर्फ मनोरंजन की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह हमारे दिमाग की एक गहन जैविक गतिविधि है।
कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार, हँसी का यह जवाब शारीरिक खतरे का संकेत भी हो सकता है, जैसे चेतावनी सिस्टम, लेकिन यह तब सकारात्मक रूप में बदल जाता है जब दिमाग यह समझ ले कि खतरा असल में मौजूद नहीं है।
हँसी और विकासवाद: एक पुराना रिश्ता
गुदगुदी का विज्ञान केवल मनोवैज्ञानिक नहीं है, यह हमारी एकोलॉजिकल और सामाजिक विकास का भी हिस्सा है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि गुदगुदी का अनुभव सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है बल्कि माउस जैसे छोटे जानवरों में भी यह मौजूद है। जी हाँ प्लॉस वन जैसे शोध पत्रों में प्रकाशित अध्ययन बताते हैं कि जब छोटे चूहों को हल्का गुदगुदाया गया, तो वे खुशी से जुड़ी ध्वनियाँ निकालते हैं और बार-बार अपने शोधकर्ताओं के पास लौटते हैं, जैसे वह बातचीत का हिस्सा हो। इसका अर्थ यही है कि गुदगुदी का व्यवहार हमारे सामाजिक व्यवहार के सबसे शुरुआती चरणों में विकसित हुआ, शायद पृथ्वी पर लाखों साल पहले! यह व्यवहार केवल मज़ा का स्रोत नहीं रहा, बल्कि यह समूहिक आपसी जुड़ाव और विश्वास का एक तरीका भी रहा है।
गुदगुदी = सामाजिक बंधन का सायरन
गुदगुदी का अनुभव शायद जन्म से पहले या बहुत छोटे बच्चे के समय से विकसित होता है। शुरुआती मानव समय में, जब भाषा विकसित नहीं हुई थी, स्पर्श ही मुख्य संवाद का साधन था। माता-पिता अपने बच्चों के साथ खेल-खेल में गुदगुदी करते हैं, जिससे बच्चे सीखते हैं कि यह स्पर्श खतरे का संकेत नहीं है। इससे उनके अंदर सामाजिक जुड़ाव और भरोसा पैदा होता है। यह एक तरह का सामाजिक चिकनाई (social glue) की तरह काम करता है, जो समूह के लोगों के बीच आध्यात्मिक और भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करता है। जब हम किसी को गुदगुदी करते हैं, तब हम न केवल खेलते हैं, बल्कि आपसी विश्वास को भी परखते हैं।
उदाहरण के तौर पर, जब बच्चों के बीच गुदगुदी का खेल होता है, तो वे अलग-अलग सीमाएँ सीखते हैं, कब हँसी मज़ाक लक्ष्य बन जाता है और कब यह असहजता में बदल जाता है। यह संतुलन हमारे सामाजिक व्यवहार की शुरुआत है।
खुद को गुदगुदी क्यों नहीं कर सकते?
यह सवाल आप में से शायद कई लोगों के मन में आता होगा — अगर गुदगुदी हमें इतना मज़ा देती है (या देती हुई लगती है), तो हम खुद को क्यों नहीं गुदगुदी कर सकते? दरअसल, जब हम खुद को गुदगुदी करते हैं, तो हमारा दिमाग पूरी तरीके से पता लगा लेता है कि यह स्पर्श हमारी ही गतिविधि का परिणाम है। यह पूर्वानुमानित होने वाला स्पर्श होता है, जिस में ‘अचानक होने वाली अनिश्चितता’ नहीं होती और इसी कारण से गुदगुदी प्रभाव नहीं होता। हमारा मस्तिष्क खुद की गतिविधियों के बारे में पहले से अनुमान लगा लेता है, इसलिए वह प्रतिक्रिया को कम कर देता है। यह वह कारण है कि हम खुद को हँसा नहीं पाते, लेकिन जब कोई दूसरा हमें गुदगुदी करता है तो हम बच नहीं पाते।
लड़कियां-लड़कों में भी फर्क क्यों?
वैज्ञानिक अध्ययनों का कहना है कि गुदगुदी की प्रतिक्रिया व्यक्ति-व्यक्ति अलग भी हो सकती है कुछ लोग अधिक गुदगुदी महसूस करते हैं, अन्य कम। इसके पीछे का कारण हमारे नर्वस सिस्टम की संवेदनशीलता, व्यक्तित्व, अनुभव और सामाजिक अनुभव तक विस्तारित होता है। कई शोध यह भी बताते हैं कि हँसी और गुदगुदी वाले स्पर्श की प्रतिक्रिया हमारे दिमाग में एक खास प्रकार के प्रतिक्रिया लूप को सक्रिय करती है, जिसमें भावनाएँ, यादें और सामाजिक संकेत सभी शामिल होते हैं।
हँसी सिर्फ मज़े की बात नहीं, स्वास्थ्य और दिमाग पर असर
गुदगुदी से पैदा होने वाली हँसी सिर्फ खेल-मज़ाक नहीं है। वैज्ञानिक अध्ययनों ने यह भी दिखाया है कि हँसी का स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव होता है, यह तनाव हार्मोन को कम करता है, मनोदशा को बेहतर बनाता है और सामाजिक संपर्क को मजबूत करता है।
यानी, जब आप गुदगुदी के कारण जोर-जोर से हँसते हैं, तो वास्तव में आपके शरीर में एक प्रकार की आत्मिक और जैविक राहत प्रतिक्रिया चल रही होती है जो सम्पूर्ण स्वास्थ्य और ऊर्जा-स्तर को बेहतर बनाती है।
क्या गुदगुदी का उद्देश evolution में है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि गुदगुदी का मुख्य उद्देश्य समाजिक बंधन और विश्वास की पुष्टि है, यह एक शुरुआती संप्रेषण का तरीका रहा है। उदाहरण के लिए बच्चों के समय में, गुदगुदी उन्हें सामाजिक संकेतों को समझने और नियंत्रित करने में मदद करती है। यह शरीर-भाषा और सामाजिक व्यवहार के सीखने का भी हिस्सा रही है।
अंततः हम कह सकते हैं कि गुदगुदी सिर्फ एक मज़ेदार खेल नहीं है, यह हमारे दिमाग, सामाजिक व्यवहार और विकासवादी इतिहास का एक जटिल और अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह हमें यह भी बताती है कि हँसी सिर्फ खुशी नहीं, बल्कि एक गहरा जैविक और सामाजिक संदेश भी है जो हमारे समूह व्यवहार और आपसी विश्वास को मजबूत करता है।






