प्रयागराज की होली: बैलगाड़ी की बरात से ‘दमकल युद्ध’ तक, 1930 से सजी परंपराओं की रंगीन विरासत
Share your love

संवाद 24 प्रयागराज। संगम नगरी प्रयागराज की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक गरिमा और ऐतिहासिक परंपराओं का जीवंत उदाहरण है। शहर के लोकनाथ, दारागंज, जानसेनगंज, कीडगंज और कटरा जैसे इलाकों में होली का स्वरूप वर्षों से विशिष्ट रहा है, जो आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
कटरा क्षेत्र में वर्ष 1930 के आसपास बैलगाड़ी पर होली की बरात निकालने की परंपरा शुरू हुई थी। उस समय अंग्रेजी शासन के दौर में हिंदू त्योहारों पर पाबंदियों का माहौल था। ऐसे में स्थानीय नागरिकों ने बैलगाड़ियों पर बड़े ड्रम रखकर रंग घोलते हुए होली बरात निकाली। घोड़े पर दूल्हे की प्रतीकात्मक सवारी और पीतल की पिचकारियों से रंगों की बौछार इस आयोजन की विशेष पहचान रही। 1970 तक यह परंपरा अपने मूल स्वरूप में चलती रही।
पुराने शहर के लोकनाथ इलाके में बीते दो दशकों से ‘कपड़ा फाड़ होली’ चर्चा का विषय बनी हुई है। यहां रंग खेलने के दौरान एक-दूसरे के कुर्ते या शर्ट फाड़कर उन्हें बिजली के तारों या खंभों पर टांगने की परंपरा विकसित हुई है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह आपसी भाईचारे और उत्साह का प्रतीक माना जाता है।
1960 के दशक में लोकनाथ चौराहे पर होली का अलग ही रंग देखने को मिलता था। टेसू के फूलों से प्राकृतिक रंग तैयार किए जाते थे। ढोलक-मजीरे की थाप पर होली गीत गाए जाते और लोग एक-दूसरे के घर जाकर गुलाल लगाकर आशीर्वाद लेते थे। रासायनिक रंगों का प्रचलन नहीं था और पर्व पूरी सादगी व आत्मीयता से मनाया जाता था।
प्रयागराज की होली साहित्यिक परंपराओं से भी जुड़ी रही है। प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा के आवास पर फाल्गुन माह में कवि सम्मेलन और काव्यपाठ आयोजित होते थे। उस दौर में सुमित्रानंदन पंत और फिराक गोरखपुरी जैसे साहित्यकारों की उपस्थिति से आयोजन का महत्व और बढ़ जाता था। गीत, गजल और काव्य पाठ के बीच रंगों की होली प्रेम और संस्कार का संदेश देती थी।
दारागंज क्षेत्र में ‘दमकल युद्ध’ की अनूठी परंपरा रही है। पुराने समय में आग बुझाने वाली दमकल को बैलगाड़ी से लाकर उसमें रंग भर दिया जाता था और फिर रंगों की बौछार की जाती थी। यह आयोजन वर्षों तक लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहा और आज भी इसकी चर्चा होली के अवसर पर होती है।
स्थानीय ज्योतिषाचार्यों के अनुसार होलिका दहन की रात्रि में इष्टदेव की पूजा और मंत्रजाप को शुभ माना जाता है। पूर्णिमा के दिन गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कर पूजन करने की परंपरा भी शहर में प्रचलित है।
प्रयागराज की होली समय के साथ स्वरूप बदलती रही है, लेकिन इसकी मूल भावना—भाईचारा, संस्कृति और उत्सवधर्मिता—आज भी कायम है। बैलगाड़ी की बरात हो या दमकल युद्ध, लोकनाथ की कपड़ा फाड़ होली हो या साहित्यकारों की रंगभरी गोष्ठियां—संगम नगरी की होली अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।






