श्मशान में होली पर आपत्ति: काशी विद्वत परिषद ने परंपरा पर जताया विरोध
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संवाद 24 वाराणसी। काशी में श्मशान घाटों पर खेले जाने वाली ‘मसाने की होली’ को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। काशी विद्वत परिषद ने महाश्मशान मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर इस परंपरा के आयोजन का विरोध करते हुए इसे शास्त्रसम्मत न मानने का दावा किया है। परिषद का कहना है कि श्मशान घाटों की अपनी पवित्रता और मर्यादा है, जहां उत्सव मनाना धार्मिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है।
मसाने की होली, जिसे भस्म होली भी कहा जाता है, रंगभरी एकादशी के अगले दिन खेली जाती है। यह आयोजन मुख्य रूप से मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर होता है। इस दौरान साधु-संत और श्रद्धालु जलती चिताओं की राख और गुलाल से होली खेलते हैं। इसे जीवन-मृत्यु के चक्र और भगवान शिव के वैराग्य से जोड़कर देखा जाता है। समर्थकों के अनुसार, राख का प्रयोग सांसारिक मोह से मुक्ति और मृत्यु की अनिवार्यता का प्रतीक है।
परिषद के सदस्य विनय पांडेय ने कहा कि महाश्मशान में इस प्रकार का आयोजन प्राचीन शास्त्रीय परंपराओं का हिस्सा नहीं है। उनका दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में इसे परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि शास्त्रों में श्मशान की मर्यादा का विशेष उल्लेख है। उन्होंने कहा कि श्मशान स्थल उत्सव और जश्न का स्थान नहीं हो सकता।
सनातन रक्षक दल के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा ने आरोप लगाया कि वर्ष 2014 के आसपास साधुओं को ठंडाई परोसने के बहाने यह आयोजन शुरू हुआ और बाद में इसे सदियों पुरानी परंपरा के रूप में प्रचारित किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि मसाने की होली के नाम पर कुछ लोग नशा और अव्यवस्था फैलाते हैं, जिससे काशी की छवि प्रभावित होती है। उन्होंने प्रशासन से इस आयोजन पर रोक लगाने की मांग की है।
वहीं, आयोजन से जुड़े गुलशन कपूर ने परिषद और अन्य संगठनों के आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि स्थानीय परंपराओं और धार्मिक ग्रंथों में भस्म से होली खेलने का उल्लेख मिलता है। उन्होंने दावा किया कि मुगल काल में यह परंपरा कमजोर पड़ी थी, जिसे बाद में पुनर्जीवित किया गया। कपूर ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग निजी स्वार्थों के चलते इस आयोजन का विरोध कर रहे हैं।
धार्मिक नगरी काशी में मसाने की होली को लेकर यह विवाद अब सामाजिक और धार्मिक विमर्श का विषय बन गया है। एक ओर जहां इसे शिवभक्ति और वैराग्य की प्रतीक परंपरा बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर श्मशान की मर्यादा और शास्त्रीय आधार पर सवाल उठाए जा रहे हैं। फिलहाल प्रशासन की ओर से किसी औपचारिक निर्णय की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन आगामी होली से पहले इस मुद्दे पर स्पष्टता की संभावना जताई जा रही है।





