लखनऊ में सामाजिक सद्भाव बैठक: हिंदू समाज को संगठित और सशक्त होने का आह्वान

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संवाद 24 लखनऊ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने लखनऊ के निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक को संबोधित करते हुए हिंदू समाज को संगठित और सशक्त बनने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हिंदुओं को किसी से खतरा नहीं है, लेकिन सतर्क और सावधान रहना जरूरी है।

डॉ. भागवत ने हिंदू समाज की घटती जनसंख्या पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने लालच और जबरदस्ती से हो रहे मतांतरण पर रोक लगाने की बात कही तथा घर वापसी (घर वापसी) के प्रयासों को तेज करने की अपील की। उन्होंने कहा कि जो लोग हिंदू धर्म में लौटें, उनकी देखभाल और सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा। बढ़ती घुसपैठ को लेकर उन्होंने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि घुसपैठियों को डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट करना होगा तथा उन्हें रोजगार नहीं देना चाहिए।

सरसंघचालक ने हिंदू परिवारों में कम से कम तीन बच्चों की सलाह दी। वैज्ञानिक तथ्यों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जिस समाज में औसतन तीन से कम बच्चे होते हैं, वह भविष्य में समाप्त हो जाता है। नव दंपतियों को यह बात समझानी चाहिए कि विवाह का मुख्य उद्देश्य सृष्टि की निरंतरता है, न कि केवल वासना पूर्ति। इसी से कर्तव्यबोध जागृत होता है।

डॉ. भागवत ने सामाजिक सद्भाव की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सद्भाव की कमी से भेदभाव बढ़ता है। हम सभी एक देश और एक मातृभूमि के पुत्र हैं तथा मनुष्य होने के नाते एक हैं। समय के साथ भेदभाव की आदत पड़ गई है, जिसे दूर करना होगा। सनातन विचारधारा सद्भाव की विचारधारा है। विरोधियों को मिटाने की बजाय एक ही सत्य सर्वत्र है, इस दर्शन को अपनाकर भेदभाव समाप्त किया जा सकता है।

उन्होंने परिवार के आधार को मातृशक्ति बताया। परंपरा में पुरुष कमाई करते थे, लेकिन खर्च का निर्णय महिलाएं लेती थीं। विवाह के बाद महिला दूसरे घर को अपना बना लेती है। महिलाओं को अबला नहीं, बल्कि असुर मर्दिनी मानना चाहिए। उन्हें आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। पश्चिम में महिलाओं को पत्नी के रूप में देखा जाता है, जबकि भारतीय संस्कृति में उन्हें माता का दर्जा है। उनका सौंदर्य नहीं, वात्सल्य महत्वपूर्ण है

यूजीसी गाइडलाइंस जैसे कानूनों पर सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि सभी को कानून मानना चाहिए। यदि कानून गलत है, तो उसे बदलने के उपाय भी हैं। जातियां झगड़े का कारण नहीं बननी चाहिए। समाज में अपनेपन का भाव होना चाहिए। नीचे गिरे लोगों को झुककर ऊपर उठाना होगा। संघर्ष से नहीं, समन्वय से दुनिया आगे बढ़ती है।
डॉ. भागवत ने कहा कि निकट भविष्य में भारत विश्व को मार्गदर्शन देगा। विश्व की कई समस्याओं का समाधान भारत के पास है।

उन्होंने बस्ती स्तर पर सामाजिक सद्भाव बैठकों को नियमित करने का आह्वान किया। आपस में मिलने से गलतफहमियां दूर होंगी तथा रूढ़ियों से मुक्ति पर चर्चा होनी चाहिए। दुर्बल की सहायता करनी चाहिए। विदेशी शक्तियों (जैसे अमेरिका और चीन) द्वारा सद्भावना के विरुद्ध योजनाओं पर सावधान रहने की चेतावनी दी तथा एक-दूसरे के प्रति अविश्वास समाप्त करने और दुख-दर्द में शामिल होने की बात कही।

बैठक में सिक्ख, बौद्ध, जैन समाज के साथ रामकृष्ण मिशन, इस्कॉन, जय गुरुदेव, शिव शांति आश्रम, आर्ट ऑफ लिविंग, संत निरंकारी आश्रम, संत कृपाल आश्रम, कबीर मिशन, गोरक्षा पीठ, आर्य समाज, संत रविदास पीठ, दिव्यानंद आश्रम, ब्रह्म विद्या निकेतन सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

यह बैठक आरएसएस के शताब्दी वर्ष के क्रम में आयोजित की गई, जिसमें सामाजिक एकता और सद्भाव को मजबूत करने पर विशेष जोर रहा।

Shivpratap Singh
Shivpratap Singh

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