समुद्र से ऊपर भू-राजनीति का नया खेल: ग्रीनलैंड पर अमेरिका-यूरोप टकराव!
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संवाद 24 नई दिल्ली। अमेरिका और यूरोप के बीच एक अनोखे भू-राजनीतिक तनाव ने आर्कटिक क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है। इस बार विवाद का केंद्र है ग्रीनलैंड वह विशाल, बर्फ से ढका हुआ द्वीप जिसे अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक” बताते हुए हर हाल में हासिल करने की इच्छा जताई है। ट्रंप ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि वह चाहेंगे कि ग्रीनलैंड अमेरिका के नियंत्रण में आए, चाहे वह सोच समझकर सौदेबाजी के जरिए हो या कठोर विकल्पों से। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अगर जरूरत पड़ी तो ताकत का उपयोग भी किया जा सकता है, ताकि रूस या चीन के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके। लेकिन यूरोपीय गठबंधन ने इस दावे को तुरंत चुनौती दी है। डेनमार्क, जो ग्रीनलैंड का संवैधानिक प्रभारी है, ने बार-बार कहा है कि यह द्वीप “बिकाऊ नहीं” है और इसकी संप्रभुता पर किसी भी प्रकार का समझौता अस्वीकार्य है।
यूरोप की तैयारियाँ: सैन्य अभ्यास से संकेत मजबूत एकता के
ट्रंप के बयान और अमेरिका की बढ़ती दावेदारी के जवाब में नाटो के कई यूरोपीय सदस्य देशों ने ग्रीनलैंड में Operation Arctic Endurance नामक सैन्य अभ्यास की तैयारी शुरू कर दी है। इस अभ्यास में डेनमार्क का नेतृत्व करते हुए फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, नॉर्वे और कई अन्य यूरोपीय सेनाएँ शामिल हो रही हैं। यह अभ्यास आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है, ताकि यह दिखाया जा सके कि यूरोप ग्रीनलैंड की रक्षा और संप्रभुता के लिए एकजुट है। फ्रांस ने न केवल सेनाओं को भेजा है, बल्कि उनके सैनिक कठोर मौसम में प्रशिक्षण भी कर रहे हैं। इस अभ्यास का लक्ष्य अमेरिका और यूरोप के बीच किसी भी सैन्य टकराव को रोकना और एक स्पष्ट संदेश देना है कि ग्रीनलैंड को किसी भी शक्ति द्वारा जबरन लिया नहीं जाएगा।
डेनमार्क-ग्रीनलैंड की कड़ी प्रतिक्रिया
डेनिश प्रधानमंत्री और ग्रीनलैंड के नेताओं ने संयुक्त रूप से जोर देकर कहा है कि उनके लोगों को यह निर्णय लेने का अधिकार है कि उनका भविष्य क्या होगा। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि ग्रीनलैंड अपनी संप्रभुता और आंतरिक निर्णयों में दृढ़ है और किसी भी बाहरी दखल को स्वीकार नहीं करेगा। ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्ज़फेल्ट ने कहा कि उनकी प्राथमिकता सुरक्षा सहयोग हो सकती है, लेकिन “स्वामित्व और नियंत्रण” उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
नाटो का सन्दर्भ
हालांकि यह विवाद नाटो के दायरे में है, यूरोपीय नेताओं का कहना है कि नाटो की भूमिका केवल अमेरिका-यूरोप के बीच संतुलन बनाना है, न कि किसी भी देश को समर्थन देना जो संप्रभुता को लम्भित करे। कई देशों का मानना है कि आर्कटिक की सुरक्षा साझा चिंता है और इसे किसी एक देश द्वारा कब्जा किए जाने नहीं दिया जाना चाहिए। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनलैंड के आसपास के समुद्री क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियाँ सीमित हैं, जिनके बारे में अमेरिका ने चिंता जताई है; ऐसे में दुश्मन की मौजूदगी को बढ़ा-चढ़ाकर बताना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
विश्व राजनीति पर असर
इस विवाद ने वैश्विक राजनीति के कई पहलुओं को उजागर किया है: अमेरिका की विदेश नीति में रणनीतिक भू-भाग पर नियंत्रण की पुरानी इच्छा, यूरोप की एकजुट प्रतिक्रिया और संप्रभुता का बचाव, नाटो का बदलता संतुलन और उसकी भूमिका, आर्कटिक क्षेत्र के बदलते भू-राजनीतिक महत्व। ये सब मिलकर ग्रीनलैंड को सिर्फ एक द्वीप नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति समीकरण का एक प्रमुख केंद्र बना रहे हैं।






