इस्लामिक NATO’ की आहट! भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौती
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संवाद 24 दिल्ली। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच बढ़ती सैन्य-रणनीतिक नजदीकियां अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस को जन्म दे रही हैं। इन तीनों देशों के बीच बनते सहयोग को रणनीतिक विशेषज्ञ अनौपचारिक रूप से ‘इस्लामिक NATO’ का नाम दे रहे हैं। यह गठबंधन न सिर्फ क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है, बल्कि भारत सहित कई देशों की सुरक्षा चिंताओं को भी बढ़ा रहा है।
सऊदी-पाकिस्तान रक्षा समझौता बना आधार
पिछले कुछ समय में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग तेजी से मजबूत हुआ है। दोनों देशों ने सामरिक सहयोग, सैन्य प्रशिक्षण और सुरक्षा समन्वय को लेकर समझौते किए हैं। माना जा रहा है कि इस सहयोग के तहत किसी एक देश पर खतरा आने की स्थिति में साझा प्रतिक्रिया की रणनीति तैयार की जा रही है, जो NATO जैसी अवधारणा से मेल खाती है।
तुर्की की एंट्री ने बदली तस्वीर
तुर्की की इस संभावित गठबंधन में दिलचस्पी ने पूरे समीकरण को और जटिल बना दिया है। तुर्की आधुनिक सैन्य तकनीक, ड्रोन निर्माण और युद्ध रणनीति में खास अनुभव रखता है। यदि तुर्की औपचारिक रूप से इस फ्रेमवर्क में शामिल होता है, तो यह गठजोड़ केवल राजनीतिक नहीं बल्कि वास्तविक सैन्य शक्ति के रूप में उभर सकता है।
तीन ताकतें, एक रणनीति
विश्लेषकों के अनुसार, इस संभावित गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत इसका संतुलित ढांचा है। सऊदी अरब की विशाल आर्थिक क्षमता, पाकिस्तान की परमाणु और मिसाइल शक्ति, और तुर्की की आधुनिक सैन्य विशेषज्ञता मिलकर एक प्रभावशाली सुरक्षा ब्लॉक का निर्माण कर सकती है। यही कारण है कि इसे हल्के में नहीं लिया जा रहा।
भारत की बढ़ती चिंता
नई दिल्ली में इस घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से देखा जा रहा है। भारत के लिए यह गठबंधन रणनीतिक और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर चुनौती बन सकता है। खासतौर पर पाकिस्तान की भूमिका और उसके परमाणु हथियारों का संदर्भ भारत की सुरक्षा चिंताओं को और गहरा करता है।भारत अब अपने रक्षा ढांचे को और मजबूत करने, अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को संतुलित करने और कूटनीतिक सक्रियता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह गठबंधन यदि औपचारिक रूप लेता है, तो एशिया और मध्य-पूर्व की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।






