इसरो बनाम SpaceX असली ‘पैसा वसूल’ कौन? अंतरिक्ष बाजार के इस युद्ध में कौन करेगा राज?
Share your love

संवाद 24 डेस्क। दुनिया का स्पेस सेक्टर आज विज्ञान की सीमाओं से आगे बढ़कर एक विशाल वैश्विक बाज़ार बन चुका है। कभी सिर्फ शोध तक सीमित रहने वाला अंतरिक्ष कार्यक्रम अब वाणिज्यिक निवेश, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। इसी तेजी से बदलते परिदृश्य में ISRO और SpaceX दो सबसे बड़े खिलाड़ी बनकर खड़े हैं, जिनकी तुलना यह सवाल खड़ा करती है कि असली “पैसा वसूल” लॉन्चिंग एजेंसी कौन?
LVM3 ने दुनिया को चौंका दिया
24 दिसंबर 2025 की सुबह श्रीहरिकोटा से इसरो का ‘एलवीएम-3’ (LVM3) रॉकेट जब उड़ान भरा, तो यह सिर्फ एक वैज्ञानिक घटना नहीं रही। भारी श्रेणी के 6100 किलो वजनी उपग्रह को स्पेस में पहुंचाकर इसने दिखाया कि भारत अब सिर्फ छोटे उपग्रहों का नहीं, बल्कि बड़े कॉमर्शियल मिशनों का भी भरोसेमंद विकल्प बन चुका है।
कम लागत, बड़ा धमाका: ISRO की “फ्रूगल इंजीनियरिंग” का करिश्मा
LVM3 महंगा नहीं, बल्कि दुनिया की तुलना में बेहद किफायती लॉन्चिंग विकल्प है। ISRO की कम खर्च में अधिक तकनीक देने वाली नीति ने इसे उन देशों के लिए पहली पसंद बना दिया है, जिनके पास सीमित बजट होते हुए भी वे अंतरिक्ष बाज़ार में भागीदार बनना चाहते हैं। भारत का यह मॉडल दुनिया में अनोखा है।
SpaceX का मास्टरस्ट्रोक: रीयूजेबल रॉकेट ने खेल बदल दिया
दूसरी तरफ SpaceX ने Falcon 9 रॉकेट के माध्यम से लॉन्चिंग सिस्टम को नया रूप दिया है। रॉकेट को वापस लाकर दोबारा उपयोग करने की क्षमता ने लागत घटाई, कार्यक्षमता बढ़ाई और बाजार में अद्वितीय प्रतिस्पर्धा पैदा की। यही तकनीक SpaceX को कम कीमत में ज्यादा क्षमता देती है।
पेलोड का पावर गेम: किसके रॉकेट में है ज़्यादा ताकत?
SpaceX के Falcon 9 में कई उपग्रह एक साथ ले जाने की क्षमता है, जो प्रति सैटेलाइट लागत कम करती है। इससे यह बड़े मिशनों, निजी कंपनियों और बड़े सैटेलाइट नेटवर्क प्रोजेक्ट्स के लिए पसंदीदा हो गया है। ISRO की लॉन्च क्षमता तेज़ी से बढ़ रही है, लेकिन SpaceX का स्केल अभी भी आगे है।
400 करोड़ बनाम 550 करोड़: कौन सस्ता, कौन फायदेमंद?
ISRO LVM3 की कीमत लगभग 450 करोड़ रुपये बैठती है, जबकि SpaceX Falcon 9 लगभग 550 करोड़ रुपये के आसपास आता है। पहली नज़र में ISRO सस्ता लगता है, लेकिन SpaceX प्रति किलो लागत में आगे निकल जाता है। यानी नाममात्र लागत में ISRO सस्ता, लेकिन तकनीकी दक्षता में SpaceX किफायती दिखाई देता है।
तकनीक बनाम भरोसा: ग्राहक किस आधार पर फैसला लेते हैं?
जहां SpaceX तकनीक और बड़े पेलोड के आधार पर आकर्षित करता है, वहीं ISRO विश्वसनीयता, सुरक्षा और स्थिरता के कारण अधिक भरोसेमंद माना जाता है। वैज्ञानिक जोखिम कम और सफलता दर ज्यादा होने के कारण कई देशों को ISRO पर अधिक विश्वास है।
विकासशील देशों के लिए जीवनरेखा: ISRO क्यों है पहली पसंद?
उभरते देशों को सिर्फ लॉन्चिंग नहीं, बल्कि तकनीक, प्रशिक्षण और वैचारिक सहायता भी चाहिए। ISRO न सिर्फ सेवा देता है, बल्कि देशों को स्पेस प्रोग्राम शुरू करने में सहयोगी भूमिका निभाता है। यह उसे तकनीकी संस्था से ज्यादा “स्पेस पार्टनर” बनाता है।
SpaceX का गेम प्लान: मंगल, स्टारशिप और बिजनेस साम्राज्य
SpaceX सिर्फ रॉकेट कंपनी नहीं, बल्कि भविष्य की स्पेस अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में काम कर रहा है। स्टारलिंक से लेकर स्टारशिप तक, उसकी रणनीति स्पष्ट है—हर ग्रह तक इंसान और कारोबार पहुंचाना। यह व्यावसायिक दृष्टि उसे अलग पहचान देती है।
दो दिग्गज, दो रास्ते: जीत किसी एक की नहीं, भविष्य दोनों का
ISRO सरकारी वैज्ञानिक शक्ति और वैश्विक सहयोग का प्रतीक है, जबकि SpaceX निजी निवेश और व्यावसायिक क्रांति का चेहरा है। एक सुरक्षित मॉडल पेश करता है, दूसरा भविष्य बदलने की कोशिश। प्रतिस्पर्धा है, लेकिन दुश्मनी नहीं—क्योंकि दोनों की दिशा अलग है।
“पैसा वसूल” कौन? जवाब हर ग्राहक के लिए अलग!
कम बजट वाले देशों के लिए ISRO सबसे लाभदायक है। बड़े पेलोड और रीयूज-आधारित मिशनों के लिए SpaceX कारगर है। दोनों की भूमिका अलग-अलग बाजारों में मजबूत है और यही स्पेस मार्केट को दो ध्रुवों पर नहीं, बल्कि दोहरे विकास की ओर ले जा रहा है।
प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि स्पेस क्रांति की साझेदारी
इसरो और SpaceX की तुलना जीत-हार की नहीं, बल्कि योगदान की है। ISRO भरोसा और किफायत देता है, SpaceX तकनीकी प्रयोग और भविष्य की अर्थव्यवस्था। वैश्विक स्पेस इंडस्ट्री का असली लाभ इसी से होगा कि दोनों मिलकर दुनिया को नई संभावनाओं की ओर बढ़ाएं।






