हादसा होते ही खुद दौड़ेगी मदद! यूपी में गूगल की ELS तकनीक का आगाज, बदल जाएगी आपातकालीन सेवाओं की तस्वीर
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संवाद 24 डेस्क। भारत में आपातकालीन सेवाओं (Emergency Services) को और अधिक चुस्त, दुरुस्त और समयबद्ध बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाया गया है। वैश्विक तकनीकी दिग्गज गूगल (Google) ने भारत में अपनी बहुप्रतीक्षित Android Emergency Location Service (ELS) को आधिकारिक तौर पर सक्रिय कर दिया है। इस सेवा की शुरुआत उत्तर प्रदेश से की गई है, जो न केवल देश का सबसे बड़ा राज्य है, बल्कि जनसंख्या के लिहाज से आपातकालीन प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती भी पेश करता है। यह सेवा दुर्घटना या संकट के समय किसी व्यक्ति की सटीक लोकेशन को स्वचालित रूप से संबंधित अधिकारियों तक पहुँचाने का कार्य करेगी।
आपातकालीन प्रतिक्रिया में ‘गोल्डन आवर’ का महत्व
किसी भी आपात स्थिति, चाहे वह सड़क दुर्घटना हो, मेडिकल इमरजेंसी हो या कोई प्राकृतिक आपदा, उसमें शुरुआती कुछ मिनट या एक घंटा (Golden Hour) सबसे महत्वपूर्ण होता है। भारत में अक्सर यह देखा गया है कि कॉल करने वाला व्यक्ति घबराहट में या भौगोलिक जानकारी की कमी के कारण अपनी सही लोकेशन नहीं बता पाता। गूगल की ELS तकनीक इसी समस्या का समाधान है। जब कोई उपयोगकर्ता अपने एंड्रॉइड स्मार्टफोन से आपातकालीन नंबर (जैसे 112) पर कॉल या मैसेज करता है, तो यह तकनीक मोबाइल के सेंसर, वाई-फाई, मोबाइल नेटवर्क और जीपीएस का उपयोग करके उच्च-सटीकता वाली लोकेशन डेटा सीधे कंट्रोल रूम को भेज देती है।
उत्तर प्रदेश: तकनीकी सुधार का केंद्र
उत्तर प्रदेश को इस सेवा के लिए पहले पायदान पर चुनना एक रणनीतिक निर्णय है। उत्तर प्रदेश पुलिस की ‘UP112’ सेवा पहले से ही देश की सबसे उन्नत आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणालियों में से एक मानी जाती है। गूगल की इस नई तकनीक को यूपी के इमरजेंसी डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ एकीकृत किया गया है। अब यूपी के किसी भी कोने से 112 पर कॉल करने वाले एंड्रॉइड यूजर की लोकेशन तुरंत सिस्टम पर फ्लैश होगी। इससे पुलिस, एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड की टीमों को घटना स्थल तक पहुँचने में लगने वाले समय में भारी कमी आएगी।
ELS तकनीक कैसे करती है काम?
गूगल की यह सेवा किसी अलग ऐप पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह एंड्रॉइड ऑपरेटिंग सिस्टम का एक इनबिल्ट फीचर है। इसकी कार्यप्रणाली को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
- स्वचालित ट्रिगर: जैसे ही कोई यूजर इमरजेंसी नंबर डायल करता है, ELS बैकग्राउंड में एक्टिव हो जाता है।
- डेटा सटीकता: यह केवल सेल टॉवर की लोकेशन (जो कई किलोमीटर के दायरे में हो सकती है) पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि डिवाइस के जीपीएस और आस-पास के वाई-फाई सिग्नल का उपयोग करके चंद मीटर के दायरे की सटीक लोकेशन बताता है।
- गोपनीयता और सुरक्षा: गूगल ने यह स्पष्ट किया है कि यह लोकेशन डेटा केवल आपातकालीन सेवा प्रदाताओं (जैसे यूपी पुलिस) को भेजा जाता है। इसे गूगल के सर्वर पर स्टोर नहीं किया जाता और न ही इसका उपयोग किसी अन्य व्यावसायिक उद्देश्य के लिए किया जा सकता है।
- भारत के लिए इस सेवा की आवश्यकता क्यों?
भारत में सड़क दुर्घटनाओं और अन्य आपात स्थितियों में मृत्यु दर का एक बड़ा कारण सहायता पहुँचने में होने वाली देरी है। कई मामलों में कॉल करने वाला व्यक्ति ऐसी स्थिति में नहीं होता कि वह गली का नाम या लैंडमार्क बता सके। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों या राजमार्गों (Highways) पर, जहाँ पहचान के चिन्ह कम होते हैं, वहां यह तकनीक जीवन रक्षक साबित होगी। गूगल के इस कदम से भारत की डिजिटल इंडिया और सुरक्षा नीति को एक नई मजबूती मिलेगी।
चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं का विश्लेषण
हालांकि यह शुरुआत उत्तर प्रदेश से हुई है, लेकिन लक्ष्य इसे अखिल भारतीय स्तर पर लागू करना है। इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्यों के पास आधुनिक ‘पब्लिक सेफ्टी आंसरिंग पॉइंट्स’ (PSAPs) का होना आवश्यक है। उत्तर प्रदेश ने अपनी डिजिटल तैयारी पूरी कर ली थी, इसलिए उसे प्राथमिकता मिली। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह तकनीक न केवल पुलिस सहायता, बल्कि आपदा प्रबंधन और महिला सुरक्षा के क्षेत्र में भी मील का पत्थर साबित होगी।
तकनीक से सुरक्षित होता समाज
गूगल और भारत सरकार के इस सहयोग को ‘टेक्नोलॉजी फॉर सोशल गुड’ के एक उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। आपातकालीन सेवाओं में एक-एक सेकंड की कीमत होती है, और ELS तकनीक उन्हीं कीमती पलों को बचाने का काम करेगी। उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ यह सफर जल्द ही पूरे भारत को एक सुरक्षित डिजिटल छत्रछाया में ले आएगा। संक्षेप में, अब मदद आपसे सिर्फ एक कॉल नहीं, बल्कि सटीक लोकेशन की दूरी पर भी उपलब्ध होगी।






