कैंसर विज्ञान में महाक्रांति: ‘बेस एडिटिंग’ तकनीक ने लाइलाज बीमारी को हराया, भविष्य की चिकित्सा पद्धति में बड़े बदलाव के संकेत
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संवाद 24 डेस्क। कैंसर एक ऐसा शब्द जो दशकों से मानवता के लिए भय और लाचारी का पर्याय बना रहा है। विशेष रूप से ‘टी-सेल एक्यूट लिम्फ़ोब्लास्टिक ल्यूकेमिया’ (T-ALL) जैसे आक्रामक ब्लड कैंसर के मामलों में, जहाँ पारंपरिक कीमोथेरेपी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट विफल हो जाते हैं, वहां मृत्यु को नियति मान लिया जाता था। लेकिन हाल ही में चिकित्सा विज्ञान ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है जिसे ‘चमत्कार’ से कम नहीं कहा जा सकता। डॉक्टरों ने ‘बेस एडिटिंग’ (Base Editing) नामक एक नई जेनेटिक इंजीनियरिंग पद्धति के माध्यम से उन मरीजों में कैंसर को जड़ से खत्म कर दिया है, जिन्हें चिकित्सा की दृष्टि से ‘लाइलाज’ घोषित कर दिया गया था।
एलिसा की कहानी
इस अभूतपूर्व इलाज की पहली गवाह बनीं एलिसा। साल 2022 में बीबीसी द्वारा कवर की गई एलिसा की कहानी ने दुनिया का ध्यान खींचा था। एलिसा को टी-सेल ल्यूकेमिया था, जिस पर कोई भी दवा असर नहीं कर रही थी। वैज्ञानिकों ने उनके लिए विशेष रूप से ‘डिजाइनर इम्यून सेल्स’ तैयार किए। आज एलिसा न केवल कैंसर मुक्त हैं, बल्कि वह इस अनुभव से इतनी प्रेरित हैं कि उन्होंने स्वयं एक कैंसर साइंटिस्ट बनने का निर्णय लिया है। उनकी रिकवरी ने यह साबित कर दिया कि यदि हम शरीर की अपनी कोशिकाओं को सही ‘निर्देश’ (DNA Editing) दे सकें, तो शरीर खुद कैंसर को हरा सकता है।
क्या है ‘बेस एडिटिंग’ तकनीक? (तकनीकी विश्लेषण)
इस नई पद्धति को समझने के लिए हमें डीएनए (DNA) की संरचना को समझना होगा। डीएनए चार मुख्य आधारों (Bases) से बना होता है: एडेनिन (A), साइटोसिन (C), गुआनिन (G), और थाइमिन (T)। इन आधारों का क्रम ही हमारे जीवन का ‘ब्लूप्रिंट’ है।
पारंपरिक ‘CRISPR-Cas9’ तकनीक डीएनए की कतरन (कटिंग) करती है, जो कभी-कभी कोशिकाओं के लिए तनावपूर्ण हो सकती है। इसके विपरीत, बेस एडिटिंग डीएनए के धागों को काटती नहीं है, बल्कि एक आधार को दूसरे में बदल देती है (जैसे C को T में बदलना)। यह एक जेनेटिक ‘पेंसिल और इरेज़र’ की तरह काम करती है, जो डीएनए कोड में सूक्ष्म और सटीक बदलाव करती है।
इलाज की प्रक्रिया: कोशिकाओं को ‘सुपर सोल्जर’ बनाना
इस उपचार में मरीज या डोनर की सफेद रक्त कोशिकाओं (T-cells) को लिया जाता है। वैज्ञानिकों ने बेस एडिटिंग का उपयोग करके इन कोशिकाओं में तीन प्रमुख बदलाव किए:
पहचान क्षमता: कोशिकाओं को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर हमला करने के लिए प्रोग्राम किया गया।
आत्म-रक्षण: संवर्धित कोशिकाओं को एक-दूसरे पर हमला करने से रोका गया।
कीमो-प्रतिरोध: उन्हें इस तरह बदला गया कि कीमोथेरेपी के दौरान भी वे जीवित रहकर अपना काम कर सकें।
यह प्रक्रिया अनिवार्य रूप से मरीज के शरीर के भीतर एक ‘लक्षित दवा’ (Targeted Medicine) तैयार करती है, जो केवल कैंसर कोशिकाओं को चुन-चुन कर नष्ट करती है।
नैदानिक परीक्षण के उत्साहजनक परिणाम
हालिया रिपोर्टों के अनुसार, इस पद्धति का परीक्षण आठ बच्चों और दो वयस्कों पर किया गया, जो टी-सेल एक्यूट लिम्फ़ोब्लास्टिक ल्यूकेमिया से पीड़ित थे। ये वे मरीज थे जिनके पास जीवन के लिए कोई अन्य विकल्प शेष नहीं था। परीक्षण के परिणामों ने चिकित्सा जगत को चौंका दिया:
सफलता दर: लगभग 64% मरीजों में बीमारी के लक्षणों में भारी कमी (Remission) देखी गई।
दीर्घकालिक प्रभाव: कई मरीज अब पूरी तरह से कैंसर मुक्त हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं।
सुरक्षा: यद्यपि इसके कुछ दुष्प्रभाव (जैसे संक्रमण का खतरा) देखे गए, लेकिन वे कैंसर की तुलना में प्रबंधनीय थे।
कैंसर की रोकथाम और उपचार की नई दिशा
इस तकनीक की सफलता केवल ल्यूकेमिया तक सीमित नहीं रहने वाली है। यह भविष्य की चिकित्सा पद्धति के लिए एक ‘प्रोटोकॉल’ तैयार कर रही है।
- वैयक्तिकृत चिकित्सा (Personalized Medicine) का युग
अभी तक कैंसर का इलाज ‘एक ही दवा सबके लिए’ (One size fits all) के सिद्धांत पर आधारित था। बेस एडिटिंग के बाद, हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ हर मरीज के जेनेटिक प्रोफाइल के अनुसार उसका इलाज तैयार किया जाएगा। इससे इलाज की सफलता दर 90% से ऊपर जाने की संभावना है। - अन्य जटिल बीमारियों का समाधान
यह तकनीक केवल ब्लड कैंसर ही नहीं, बल्कि सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया और कुछ प्रकार के वंशानुगत हृदय रोगों के इलाज की भी क्षमता रखती है। भविष्य में, हम जन्म से पहले ही भ्रूण के डीएनए में बदलाव करके कैंसर पैदा करने वाले जीन को ‘स्विच ऑफ’ करने में सक्षम हो सकते हैं। - ‘ऑफ-द-शेल्फ’ उपचार की संभावना
वर्तमान में यह प्रक्रिया बहुत महंगी और समय लेने वाली है क्योंकि यह व्यक्तिगत स्तर पर की जाती है। हालांकि, वैज्ञानिक अब ऐसी ‘यूनिवर्सल टी-सेल्स’ बनाने पर काम कर रहे हैं जिन्हें बेस एडिटिंग के जरिए पहले से तैयार रखा जा सके। इससे भविष्य में कैंसर का इलाज किसी एंटीबायोटिक की तरह ‘ऑफ-द-शेल्फ’ उपलब्ध हो सकेगा, जिससे लागत में भारी कमी आएगी। - ट्यूमर और सॉलिड कैंसर पर प्रहार
अभी यह तकनीक तरल कैंसर (Blood Cancer) पर अधिक प्रभावी है। भविष्य का विश्लेषण बताता है कि बेस एडिटिंग का उपयोग फेफड़ों, प्रोस्टेट और स्तन कैंसर जैसे ठोस ट्यूमर (Solid Tumors) के विरुद्ध इम्यून सिस्टम को प्रशिक्षित करने के लिए किया जाएगा। यह कैंसर के मेटास्टेसिस (फैलने) की प्रक्रिया को रोकने में गेम-चेंजर साबित होगा। - रोकथाम: आनुवंशिक स्क्रीनिंग और संपादन
भविष्य में, कैंसर होने का इंतज़ार करने के बजाय, उच्च जोखिम वाले परिवारों में जेनेटिक स्क्रीनिंग की जाएगी। यदि किसी व्यक्ति में कैंसर पैदा करने वाला ‘म्यूटेशन’ पाया जाता है, तो बेस एडिटिंग के जरिए उसे कैंसर विकसित होने से पहले ही ठीक किया जा सकेगा। यह चिकित्सा विज्ञान की वास्तविक ‘रोकथाम’ (Prevention) होगी।
चुनौतियां और नैतिक दृष्टिकोण
इतनी बड़ी सफलता के बावजूद, राह आसान नहीं है। ‘डिजाइनर बेबी’ बनाने या मानव डीएनए के साथ छेड़छाड़ करने के नैतिक सवाल हमेशा बने रहेंगे। इसके अतिरिक्त, इस तकनीक की उच्च लागत इसे केवल अमीर देशों या संपन्न परिवारों तक सीमित कर सकती है। संवाद 24 का मानना है कि सरकारों और वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों को मिलकर काम करना होगा ताकि यह तकनीक मानवता के हर तबके तक पहुँच सके।
असाध्य अब साध्य है
कैंसर के खिलाफ युद्ध में बेस एडिटिंग एक ‘ब्रह्मास्त्र’ की तरह उभरी है। एलिसा का ठीक होना इस बात का प्रमाण है कि विज्ञान अब उस स्तर पर पहुँच गया है जहाँ हम जीवन के कोड को फिर से लिख सकते हैं। यद्यपि अभी यह प्रारंभिक चरण में है, लेकिन यह स्पष्ट है कि आने वाले दशकों में ‘कैंसर’ शब्द का खौफ कम होगा और यह एक पूर्णतः उपचार योग्य बीमारी बन जाएगी।






