क्या आप जानते हैं? कभी पक्षियों और व्हेल की चर्बी से रोशन होती थीं रातें, फिर धरती की कोख से निकला ‘काला सोना’ जिसने बदल दी पूरी दुनिया

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संवाद 24 विशेष रिपोर्ट। आज पेट्रोल, डीजल और गैस के बिना आधुनिक जीवन की कल्पना करना कठिन है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब दुनिया की रातें अंधकार में डूबी रहती थीं। रोशनी के लिए प्रकृति के सीमित साधनों पर निर्भर रहना पड़ता था। आज हम कल्पना नहीं कर सकते कि मात्र डेढ़ सौ वर्ष पहले तक मनुष्य सूर्यास्त के बाद किस प्रकार घोर अंधेरे में जीता था? उस युग में न बिजली थी, न कोई बल्ब, न ट्यूबलाइट। रात के साथ जीवन भी जैसे थम जाता था। लोग अपने कामकाज सूर्य की रोशनी में ही निपटाते और अंधेरा होते ही बिस्तर पकड़ लेते थे। अमीरों के घरों में मोमबत्तियाँ और तेल के दीपक जलते थे, परंतु आम आदमी की पहुँच से यह भी बाहर था।

इस अंधकार को दूर करने की मनुष्य की यात्रा हजारों वर्ष पुरानी है। उसने पहले पत्थर की गुफाओं में आग जलाई, फिर पशु-चर्बी के दीपक बनाए, फिर वनस्पति तेलों की ओर बढ़ा और अंततः समुद्र की गहराइयों में रहने वाले विशालकाय व्हेल तक जा पहुँचा। यह केवल ईंधन की खोज नहीं थी, यह सभ्यता के विकास की एक अद्भुत गाथा है। और इस गाथा का सबसे रोमांचक मोड़ तब आया जब आज से करीब 175 वर्ष पहले अमेरिका की एक छोटी-सी नदी के किनारे धरती के गर्भ से ‘काला सोना’ यानी कच्चा तेल (Crude Oil) फूट पड़ा और दुनिया हमेशा के लिए बदल गई।

पक्षियों की चर्बी से जलते थे दीपक: प्राचीन मनुष्य का संघर्ष

जब हम प्रकाश के इतिहास को खंगालते हैं तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। हजारों वर्ष पहले आर्कटिक क्षेत्रों में रहने वाले मूल निवासी इनुइट और अन्य जनजातियाँ समुद्री पक्षियों की चर्बी से दीपक जलाते थे। इन्हें ‘स्टोन लैंप’ या ‘क्युलिक’ कहा जाता था। ये पत्थर की कटोरीनुमा बर्तन होते थे जिनमें जानवरों या पक्षियों की चर्बी भरी जाती थी और एक मोटी रूई की बाती जलाई जाती थी। यह लैंप न केवल रोशनी देता था बल्कि ठंडे ध्रुवीय क्षेत्र में गर्मी का भी काम करता था।

उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में ‘फुल्मार’ जैसे समुद्री पक्षियों की चर्बी और तेल का उपयोग व्यापक रूप से प्रकाश के लिए किया जाता था। स्कॉटलैंड के सेंट किल्डा द्वीपसमूह के निवासी ‘गैनेट’ नामक पक्षियों की चर्बी से दीपक जलाते थे। मछली का तेल भी इन्हीं कार्यों में आता था। सील और सी-लायन जैसे समुद्री जीवों की चर्बी का उपयोग भी होता था। भारत जैसे गर्म देशों में तिल, सरसों, नारियल और अरंडी के तेल से दीपक जलाए जाते थे। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने की यह प्रार्थना सदियों से मनुष्य की आत्मा में बसी रही।

तेल लैंप का इतिहास लगभग 10,000 से 15,000 वर्ष पुराना है। पुरापाषाण काल में गुफाओं में पत्थर के उथले कुंडों में पशु-चर्बी जलाकर प्रकाश किया जाता था। मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं में मिट्टी के दीपकों का प्रमाण मिलता है जिनमें तिल और जैतून का तेल जलाया जाता था। रोमन साम्राज्य में जैतून का तेल व्यापक रूप से दीपकों में प्रयुक्त होता था। मध्यकाल तक यूरोप के अधिकांश लोग पशु-चर्बी से बनी मोमबत्तियों और तेल के दीपकों पर निर्भर थे।

व्हेल का तेल: समुद्र की गहराइयों से मिला उजाला

18वीं और 19वीं शताब्दी में व्हेल का तेल प्रकाश का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे वांछित स्रोत बन गया, खासकर अमेरिका और यूरोप में। व्हेल की चर्बी (ब्लबर) को उबालकर जो तेल निकाला जाता था, वह बहुत साफ और कम धुएँ के साथ जलता था। इसमें एक खास किस्म का तेल होता था स्पर्मेसेटी जो स्पर्म व्हेल (Sperm Whale) के सिर में पाया जाता था। इस तेल से बनी मोमबत्तियाँ और दीपक उस युग में सबसे उत्तम प्रकाश-साधन माने जाते थे।

1740 के दशक में लंदन के प्रसिद्ध वॉक्सहॉल गार्डन में पाँच हजार से अधिक स्ट्रीट लैंप व्हेल तेल से जलाए जाते थे। 1820 तक व्हेलिंग (व्हेल का शिकार) अमेरिका का एक प्रमुख उद्योग बन चुका था। न्यू बेडफोर्ड, मैसाचुसेट्स, इस उद्योग का केंद्र था और 1856 में अमेरिका का व्हेलिंग बेड़ा अपने उच्चतम बिंदु पर था 593 जहाजों में से 329 न्यू बेडफोर्ड के थे। 1845 के आसपास व्हेल तेल का उत्पादन अपने शिखर पर था करीब 1 करोड़ 80 लाख गैलन प्रतिवर्ष। हर्मन मेलविल का प्रसिद्ध उपन्यास ‘मोबी डिक’ (1851) इसी युग की कहानी कहता है जब व्हेलिंग अमेरिकी जीवन का अभिन्न अंग थी।

लेकिन यह उद्योग विनाशकारी भी था। अंधाधुंध शिकार से व्हेलों की संख्या तेजी से घटने लगी। उत्तरी अटलांटिक और प्रशांत महासागर में जहाँ पहले व्हेलें आसानी से मिलती थीं, वहाँ अब शिकारी जहाजों को लंबी और खतरनाक यात्राएँ करनी पड़ती थीं। इससे व्हेल तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं कभी-कभी 1.30 से 2.50 डॉलर प्रति गैलन तक (आज के लगभग 50-90 डॉलर के बराबर)। ऐसे में केवल अमीर लोग ही व्हेल तेल के दीपक जला सकते थे। आम आदमी चरबी (लार्ड) के दीपकों या कोयले के तेल (कोल ऑयल) पर निर्भर था।

भारत में प्रकाश की परंपरा: दीपक और उनका आध्यात्मिक महत्व

जहाँ पश्चिम में व्हेल और पक्षियों की चर्बी से रोशनी हो रही थी, वहीं भारत में प्रकाश की एक समृद्ध और आध्यात्मिक परंपरा विकसित हो रही थी। भारत में दीपक केवल रोशनी का साधन नहीं था, वह ज्ञान, चेतना और ईश्वरीय प्रकाश का प्रतीक था। रामायण और महाभारत में सोने और चाँदी के दीपकों का उल्लेख मिलता है। मंदिरों में पाँच बत्तियों वाले पंचमुखी दीपक और आरती के दीपकों की परंपरा अत्यंत प्राचीन है।

भारत में तिल के तेल, सरसों के तेल, नारियल के तेल और घी से दीपक जलाए जाते थे। श्रावण मास की अमावस्या को ‘दीप-पूजन’ का विशेष महत्व था। दीपावली का पर्व तो साक्षात् प्रकाश का महापर्व है जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का उद्घोष करता है। भारतीय दार्शनिक परंपरा में ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की उद्घोषणा सिर्फ बाहरी प्रकाश के लिए नहीं, आत्मा के अज्ञान को दूर करने की प्रार्थना है। इस प्रकार भारत में प्रकाश भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर मानव जीवन का अनिवार्य अंग था।

कोयला, कैम्फीन और नई रोशनी की तलाश: पेट्रोलियम से पहले का युग

19वीं शताब्दी के मध्य तक यूरोप और अमेरिका में प्रकाश के लिए कई विकल्प उपलब्ध थे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण था ‘कैम्फीन’  तारपीन और अल्कोहल के मिश्रण से बना एक ईंधन जो 1838 में न्यूयॉर्क के ऑगस्टस वेब ने पेटेंट कराया था। यह तेज रोशनी देता था, सुगंधित था और व्हेल तेल से सस्ता भी था करीब 50 सेंट प्रति गैलन। 1850-60 के दशक में यह अमेरिका में सबसे लोकप्रिय दीपक ईंधन था। इसके अलावा कोयले से बने ‘कोल ऑयल’ और ‘कोल गैस’ का भी प्रयोग होने लगा था।

ब्रिटेन में 19वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही कोयला गैस (Town Gas) से सड़कों और घरों को रोशन किया जाने लगा था। 1850 के दशक तक अमेरिका के बड़े शहरों में भी कोयला गैस के नेटवर्क बिछने लगे थे। कनाडाई वैज्ञानिक और भूगर्भशास्त्री अब्राहम गेस्नर ने 1854 में ‘केरोसीन’ नाम का एक ईंधन पेटेंट कराया जो कोयले से निकाला जाता था। यह बाद में पेट्रोलियम से बनने वाले मिट्टी के तेल का पूर्वज बना। इस प्रकार जब 1859 में पेट्रोलियम का युग आया, तब दुनिया पहले से ही बेहतर और सस्ती रोशनी की तलाश में थी।

27 अगस्त 1859: वह ऐतिहासिक दिन जब बदल गई दुनिया

अमेरिका के पेनसिल्वेनिया राज्य के टाइटसविल नामक एक छोटे से कस्बे के पास ‘ऑयल क्रीक’ नदी के किनारे एडविन एल. ड्रेक नामक एक पूर्व रेलवे कंडक्टर एक असंभव-सा काम करने में जुटे थे धरती के गर्भ में ड्रिल करके तेल निकालना। लोग उन्हें ‘ड्रेक की मूर्खता’ (Drake’s Folly) कहकर उनका मजाक उड़ाते थे। उनके नियोक्ता ने तो ड्रिलिंग बंद करने का पत्र भी भेज दिया था, परंतु वह पत्र ड्रेक तक पहुँचने से पहले ही इतिहास लिख दिया गया।

27 अगस्त 1859 को जब ड्रेक की टीम के सदस्य विलियम ‘अंकल बिली’ स्मिथ ने कुएँ में झाँककर देखा, तो जमीन से 5 इंच नीचे तक तेल भरा हुआ था। जमीन के मात्र 69.5 फुट (लगभग 21 मीटर) की गहराई पर ड्रिल करके उन्होंने पेट्रोलियम का पहला व्यावसायिक कुआँ खोद दिया था। यह प्रतिदिन 12 से 20 बैरल तेल देता था। उस दिन न केवल अमेरिका का, बल्कि पूरी दुनिया का इतिहास बदल गया। इस घटना को आधुनिक पेट्रोलियम उद्योग का जन्म माना जाता है और एडविन ड्रेक को ‘पेट्रोलियम उद्योग का जनक’ कहा जाता है।

ड्रेक की सफलता ने एक जबरदस्त ‘ऑयल बूम’ को जन्म दिया। 1859 में जहाँ पेनसिल्वेनिया में केवल लगभग 2,000 बैरल तेल का उत्पादन हुआ था, वहीं 1865 तक यह बढ़कर 5 लाख बैरल प्रतिवर्ष हो गया। टाइटसविल की जनसंख्या 1859 में मात्र 250 थी जो 1865 तक बढ़कर 10,000 हो गई। पास का ‘पिटहोल सिटी’ तो एक वर्ष के भीतर ही 50 होटलों वाला शहर बन गया  और फिर कुछ वर्षों में भुतहा कस्बे में बदल गया। यह तेल की दुनिया का पहला ‘बूम एंड बस्ट’ चक्र था।

पेट्रोलियम के पहले भी था तेल का ज्ञान: प्राचीन सभ्यताओं का रहस्य

यह भ्रान्ति नहीं होनी चाहिए कि 1859 में ड्रेक ने पहली बार तेल की खोज की थी। पेट्रोलियम का ज्ञान हजारों वर्षों से मनुष्य को था। पश्चिमी पेनसिल्वेनिया के मूल निवासी सेनेका और अन्य इरोक्वॉय जनजातियाँ तेल क्रीक के पास जमीन की सतह पर आने वाले पेट्रोलियम रिसाव का उपयोग औषधि के रूप में करती थीं। 1656 में जेसुइट मिशनरियों ने क्यूबा (न्यूयॉर्क) में तेल के झरनों का उल्लेख किया था। 1748 में पीटर कालम ने ऑयल क्रीक के तेल स्रोतों का वर्णन किया था। 18वीं शताब्दी में सेनेका जनजाति के लोग नियाग्रा क्षेत्र में तेल बेचते थे।

मध्यपूर्व में बेबीलोनिया और अरब के लोग हजारों वर्षों से ‘बिटुमेन’ और ‘नेफ्था’ जो पेट्रोलियम के प्राकृतिक रूप हैं का उपयोग करते आ रहे थे। इसका उपयोग नाव की दरारें बंद करने, इमारतें बनाने, चिकित्सा और यहाँ तक कि युद्ध में आग लगाने के लिए होता था। अजरबैजान में बाकू के पास हजारों वर्षों से तेल का रिसाव होता था और पारसी धर्म में इसे ‘अनंत अग्नि’ मानकर पूजा जाता था। 9वीं शताब्दी के बगदाद के विद्वान अल-रज़ी (Rhazes) ने ‘नेफ्था’ से बने लैंप का वर्णन अपनी पुस्तक ‘किताब-अल-असरार’ में किया है।

पेट्रोलियम का उपयोग औषधि के रूप में तो 1814 में ओहायो और 1818 में केंटकी में होने का प्रमाण है। पिट्सबर्ग के सैमुअल किर ने 1847 के आसपास नमक के कुओं से निकले पेट्रोलियम को बोतलों में भरकर ‘सेनेका ऑयल’ के नाम से औषधि के रूप में बेचना शुरू किया। फिर उन्होंने इसे शुद्ध करके दीपक ईंधन के रूप में उपयोग करने का प्रयोग किया और एक बेहतर लैंप का भी आविष्कार किया। यह किर की केरोसीन शोधन प्रक्रिया थी जिसने ड्रेक को अधिक तेल खोदने के लिए प्रेरित किया।

केरोसीन का युग: पेट्रोलियम ने कैसे बदली रोशनी की तस्वीर

ड्रेक के कुएँ से पेट्रोलियम निकलते ही उसे शुद्ध करके केरोसीन (मिट्टी का तेल) बनाने का काम शुरू हुआ। पिट्सबर्ग में पहले से ही किर की शोधन प्रक्रिया मौजूद थी। येल विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान के प्रोफेसर बेंजामिन सिलिमान ने पेट्रोलियम के नमूनों का परीक्षण करके पुष्टि की थी कि इससे उत्तम केरोसीन बनाई जा सकती है जो दीपकों में जला सकते हैं। और वाकई केरोसीन ने सब कुछ बदल दिया। यह व्हेल तेल की तुलना में बहुत सस्ती थी, कम धुआँ देती थी और आसानी से उपलब्ध थी।

1862-64 के दौरान अमेरिकी गृहयुद्ध के वित्तपोषण के लिए अमेरिकी सरकार ने ‘कैम्फीन’ (जिसमें 75% अल्कोहल था) पर भारी कर लगा दिया 2 डॉलर प्रति गैलन। इससे कैम्फीन उद्योग का विनाश हो गया और केरोसीन को बाजार पर एकाधिकार मिल गया। 1870 तक केरोसीन दुनिया का सबसे प्रमुख दीपक ईंधन बन चुका था और व्हेलिंग उद्योग पतन की ओर था। इसी दशक में जॉन डी. रॉकफेलर ने ‘स्टैंडर्ड ऑयल’ की स्थापना करके पेट्रोलियम उद्योग को संगठित किया। रॉकफेलर का ‘स्टैंडर्ड ऑयल’ जल्द ही दुनिया का सबसे बड़ा कॉर्पोरेट साम्राज्य बन गया।

पेट्रोलियम और व्हेल: एक जटिल रिश्ता

यह आमतौर पर कहा जाता है कि पेट्रोलियम ने व्हेलों को विनाश से बचाया। परंतु इतिहास इससे कहीं अधिक जटिल है। सच यह है कि 1859 से पहले ही व्हेल तेल का बाज़ार सिकुड़ने लगा था कोयला गैस, लार्ड ऑयल और कैम्फीन जैसे सस्ते विकल्पों की वजह से। व्हेल तेल केवल अमीरों की विलासिता बन गया था। ड्रेक के कुएँ के बाद पेट्रोलियम-आधारित केरोसीन ने व्हेल तेल को बाज़ार से बाहर कर दिया यह सच है।

लेकिन विडंबना यह है कि 20वीं शताब्दी में जब स्टीम इंजन से चलने वाले बड़े जहाज बने, तो व्हेलिंग उद्योग और तेज हो गया। 1960 के दशक में व्हेलों का शिकार अपने सर्वोच्च स्तर पर था जो 19वीं शताब्दी की तुलना में कई गुना अधिक था। 1986 में अंतरराष्ट्रीय व्हेलिंग आयोग (IWC) ने व्यावसायिक व्हेल शिकार पर प्रतिबंध लगाया। इस प्रकार व्हेलों को अंततः न पेट्रोलियम ने बचाया, न बाजार ने बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून और पर्यावरण चेतना ने।

भारत में पेट्रोलियम की खोज और उसका महत्व

भारत में पेट्रोलियम की खोज का इतिहास भी रोचक है। 1866 में असम के माकुम क्षेत्र में पेट्रोलियम के रिसाव का पता चला था। 1889 में असम ऑयल कंपनी ने डिगबोई में पहला व्यावसायिक तेल कुआँ खोदा जो एशिया का पहला तेल कुआँ था और आज भी उत्पादन में है। स्वतंत्रता के बाद 1956 में ‘तेल और प्राकृतिक गैस आयोग’ (ONGC) की स्थापना हुई। 1974 में मुंबई हाई ऑफशोर क्षेत्र में तेल की खोज ने भारत के ऊर्जा परिदृश्य को बदल दिया।

आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है। रूस-यूक्रेन युद्ध और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत की ऊर्जा नीति वैश्विक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य के तहत देश अपने घरेलू तेल उत्पादन को बढ़ाने के साथ-साथ सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर भी तेजी से बढ़ रहा है।

एडिसन का बल्ब और पेट्रोलियम का नया अध्याय

1882 में थॉमस एडिसन ने न्यूयॉर्क में पहली सार्वजनिक बिजली वितरण प्रणाली शुरू की और दुनिया फिर बदलने लगी। बिजली के बल्ब ने केरोसीन लैंप की जगह लेनी शुरू की। ऐसे में पेट्रोलियम उद्योग का भविष्य खतरे में पड़ता दिख रहा था। परंतु 20वीं शताब्दी ने एक नई क्रांति लाई ऑटोमोबाइल की। कार्ल बेंज (1885) और हेनरी फोर्ड (1908) की कारों ने पेट्रोलियम की माँग को आसमान पर पहुँचा दिया। डीजल इंजन, हवाई जहाज, रेलवे इंजन, उद्योग सब पेट्रोलियम पर निर्भर होते गए।

आज दुनिया में प्रतिदिन लगभग 10 करोड़ बैरल कच्चे तेल की खपत होती है। पेट्रोकेमिकल उद्योग से प्लास्टिक, सिंथेटिक कपड़े, फार्मास्यूटिकल्स, खाद और अनगिनत उत्पाद बनते हैं। यानी जो ‘काला सोना’ डेढ़ सौ साल पहले पेनसिल्वेनिया की धरती से फूटा था, उसने न केवल रोशनी दी बल्कि आधुनिक सभ्यता की नींव ही बदल दी। 1865 में न्यूयॉर्क के एक रसायनशास्त्री रॉबर्ट चेसेब्रो ने तेल कुओं से निकलने वाले एक मोमी पदार्थ से ‘पेट्रोलियम जेली’ बनाई जिसे आज हम ‘वैसलीन’ के नाम से जानते हैं। इस तरह पेट्रोलियम ने मानव जीवन के हर पहलू को छू लिया।

‘काले सोने’ का भविष्य: पेट्रोलियम से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर

आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तो एक नई ऊर्जा क्रांति का समय आ गया है। जैसे कभी व्हेल तेल की जगह पेट्रोलियम ने ली थी, वैसे ही अब पेट्रोलियम की जगह नवीकरणीय ऊर्जा लेने को तैयार है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हाइड्रोजन ईंधन, इलेक्ट्रिक वाहन ये सब मिलकर एक नई ऊर्जा सभ्यता की नींव रख रहे हैं। परंतु जिस तरह व्हेलों का शिकार पेट्रोलियम के आने के बाद भी दशकों तक जारी रहा, उसी तरह पेट्रोलियम का युग भी एकदम से खत्म नहीं होगा।

जलवायु विज्ञानियों का मानना है कि पेट्रोलियम के जलने से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड वैश्विक तापमान वृद्धि का सबसे बड़ा कारण है। पेरिस जलवायु समझौते (2015) के तहत दुनिया के देश 2050 तक ‘नेट जीरो’ कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखते हैं। भारत ने 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य निर्धारित किया है। ये संकल्प बताते हैं कि मानव सभ्यता एक बार फिर ऊर्जा के एक नए युग की दहलीज पर खड़ी है ठीक वैसे ही जैसे 1859 में एडविन ड्रेक के कुएँ से पेट्रोलियम फूटा था और दुनिया बदल गई थी।

निष्कर्ष: प्रकाश की अनंत यात्रा

पक्षियों की चर्बी से लेकर व्हेल के तेल तक, कोयले की गैस से लेकर पेट्रोलियम तक और अब सौर ऊर्जा तक मनुष्य की प्रकाश की यह यात्रा वास्तव में उसकी बुद्धि, जिज्ञासा और अनुकूलन की क्षमता का प्रमाण है। एडविन ड्रेक ने जो सपना देखा था वह आज एक ऐसे उद्योग का आधार बन चुका है जिसकी वैश्विक बाजार में कीमत सौ खरब डॉलर से अधिक है। लेकिन इस यात्रा ने पृथ्वी को भी गहरे जख्म दिए हैं विलुप्त होती प्रजातियाँ, प्रदूषित महासागर, गर्म होता वातावरण।

इसीलिए आज जब हम इस इतिहास को देखते हैं, तो सीख मिलती है कि विकास के हर नए युग में हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाना होगा। जो गलतियाँ व्हेलों के साथ हुईं, जो पर्यावरणीय क्षति पेट्रोलियम युग में हुई उसे दोहराया नहीं जाना चाहिए। धरती की कोख से निकला ‘काला सोना’ मनुष्य के लिए वरदान भी था और चेतावनी भी। यह चेतावनी आज भी गूँज रही है प्रकृति के साथ नहीं, बल्कि प्रकृति के भीतर रहकर ही टिकाऊ विकास संभव है।

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