स्मृति मंदिर में अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति: इज़राइल के महावाणिज्यदूत याविन रेवाच का नागपुर दौरा, विचार-परंपरा और संगठनात्मक यात्रा पर विस्तृत संवाद
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संवाद 24 नागपुर। नागपुर के रेशीमबाग स्थित स्मृति मंदिर परिसर में 29 दिसंबर 2025 की सायंकालीन घड़ियाँ कुछ विशेष बन गईं। इस अवसर पर इज़राइल के महावाणिज्यदूत याविन रेवाच ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की स्मृति में निर्मित इस ऐतिहासिक परिसर में पहुंचकर न केवल श्रद्धांजलि अर्पित की, बल्कि संगठन के इतिहास, विचारधारा, कार्यप्रणाली और उसकी राष्ट्रव्यापी सामाजिक उपस्थिति के विविध आयामों को भी नज़दीक से समझा। यह दौरा केवल एक शिष्टाचार भेंट भर नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक–वैचारिक संवाद, अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और सामाजिक संरचना की परतों को समझने का एक अवसर भी बन गया।
स्मृति मंदिर का महत्व और इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि
स्मृति मंदिर, नागपुर का वह स्थान है जहाँ डॉ. हेडगेवार जी का जीवन, विचार और उनकी संगठनात्मक दृष्टि का सार समाहित है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्भव, उसके विस्तार और उसकी पद्धति को समझने के लिए यहाँ आना केवल औपचारिक यात्रा नहीं माना जाता, बल्कि यह उन विचारों की जड़ों से परिचय कराता है जो सामाजिक संरचना को भीतर से मज़बूत करने का दावा करती हैं। महावाणिज्यदूत रेवाच को बताया गया कि संघ का आरंभ किसी राजनीतिक आंदोलन के रूप में नहीं हुआ, बल्कि समाज में चरित्र, अनुशासन, नैतिकता और संगठन आधारित समरसता की भावना विकसित करने के उद्देश्य से हुआ था। यह दृष्टि किसी सत्ता केंद्रित न होकर समाज केंद्रित थी, जिसका प्रभाव आज भी स्वयंसेवकों की कार्यपद्धति में देखा जा सकता है।

श्रद्धासुमन और प्रतीकात्मक महत्व
कार्यक्रम की शुरुआत श्रद्धांजलि के साथ हुई। रेवाच ने स्मृति मंदिर में पुष्पांजलि अर्पित की और कुछ क्षण मौन खड़े होकर उस ऐतिहासिक स्थल के महत्व को आत्मसात किया। उपस्थित कार्यकर्ताओं ने उन्हें मंदिर के स्थापत्य, निर्माण काल और इसके सांस्कृतिक सन्देश को विस्तार से समझाया। इस प्रक्रिया के दौरान महावाणिज्यदूत ने यह टिप्पणी भी की कि किसी भी देश या समाज की शक्ति केवल उसकी कूटनीति, सैन्य क्षमता या आर्थिक सामर्थ्य में नहीं होती, बल्कि उसके सांस्कृतिक चरित्र, आंतरिक अनुशासन और सामाजिक एकजुटता में निहित होती है। यही कारण है कि उन्होंने संघ के मूल विचारों और उसकी प्रगति को समझने में वास्तविक रुचि दिखाई।
डॉ. हेडगेवार के जीवन और कार्य पर संवाद
डॉ. हेडगेवार के जीवन से जुड़े प्रसंगों, संगठन की स्थापना यात्रा, और उस युग के सामाजिक–राजनीतिक संदर्भों पर एक विस्तृत चर्चा हुई। उन्हें बताया गया कि हेडगेवार जी ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई, परंतु उन्होंने यह महसूस किया कि केवल सत्ता परिवर्तन से समाज की कमियों का समाधान नहीं निकलेगा। इसलिए उन्होंने राष्ट्र जीवन के अंदरूनी ढांचे को मज़बूत करने का मार्ग चुना, जो आज भी शाखाओं, सेवा कार्यों, सामाजिक संपर्क और चरित्र निर्माण के रूप में दिखाई देता है।
संवाद के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि संघ की पद्धति पश्चिमी राजनीतिक ढाँचों से भिन्न है; यह एक सामाजिक सांस्कृतिक संगठन है जिसका उद्देश्य राष्ट्र की नींव को भीतर से दृढ़ बनाना है, न कि सत्ता केंद्रित संघर्ष खड़ा करना। यह विचार रेवाच के लिए विशेष जिज्ञासा का विषय बना।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टि और सांस्कृतिक संवाद
महावाणिज्यदूत ने स्वीकार किया कि वैश्विक परिदृश्य में आज उन देशों की स्थिति अधिक स्थायी और प्रभावशाली है जिनके भीतर सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और वैचारिक स्पष्टता मजबूत होती है। इज़राइल और भारत के बीच संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक पृष्ठभूमि भी रखते हैं। उन्होंने इस संदर्भ में भारत–इज़राइल संबंधों के बढ़ते सहयोग, तकनीकी साझेदारी, कौशल विकास, सुरक्षा तंत्र, कृषि नवाचार और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों का उल्लेख किया। यह भी चर्चा हुई कि विश्व में बदलते परिदृश्य में मूल्य आधारित सामाजिक संगठन, ज़मीन से जुड़े सेवा तंत्र और सांस्कृतिक पहचान किसी भी राष्ट्र को आंतरिक शक्ति प्रदान करते हैं और भारत इस दिशा में एक अनूठा उदाहरण है।
उपस्थित पदाधिकारी, स्वागत और सहभागिता
इस अवसर पर नागपुर महानगर संघचालक राजेश जी लोया, वरिष्ठ प्रचारक विकास जी तेलंग सहित अनेक पदाधिकारी और कार्यकर्ता उपस्थित रहे। उन्होंने महावाणिज्यदूत का पारंपरिक ढंग से स्वागत किया और उन्हें संघ के विविध सेवा प्रकल्पों, सामाजिक सहभागिता योजनाओं तथा राष्ट्रव्यापी विस्तार का विवरण प्रस्तुत किया। यह भी बताया गया कि संघ किसी जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर काम नहीं करता, बल्कि व्यक्ति को समाज और राष्ट्र से जोड़ने का प्रयास करता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, आपदा राहत, आदिवासी विकास और युवाओं के चरित्र निर्माण जैसे क्षेत्रों में होने वाले कार्यों का संक्षिप्त परिचय दिया गया।
रेवाच की प्रतिक्रिया और अवलोकन
पूरे भ्रमण और संवाद के बाद रेवाच ने यह कहा कि ऐसी यात्राएँ केवल कूटनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा भर नहीं होतीं, बल्कि इन्हें वह भारत की आत्मा को समझने के प्रयास के रूप में देखते हैं। उन्होंने यह स्वीकार किया कि आज विश्व में भारत का stature इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि यहाँ की लोकतांत्रिक संरचना के बीच सांस्कृतिक निरंतरता और सामाजिक संगठन की जड़ें जीवित हैं। उन्होंने यह भी माना कि भारत और इज़राइल दोनों ने समय–समय पर अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक स्थिरता के लिए संघर्ष किया है, इसलिए इन दोनों देशों में स्वाभाविक सहभागिता की संभावनाएँ मौजूद हैं।
यह यात्रा क्यों महत्वपूर्ण?
अंततः हम कह सकते हैं कि यह दौरा केवल एक स्थान दर्शन का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं का महत्व अंतरराष्ट्रीय संदर्भों में भी समझा जा रहा है। इसे निम्न बिंदुओं में समझा जा सकता है:
???? सांस्कृतिक कूटनीति का नया आयाम
???? भारत–इज़राइल संबंधों में संवेदनात्मक गहराई
???? संगठन की पद्धति में वैश्विक रुचि का बढ़ना
???? राष्ट्र–निर्माण की वैचारिक नींव का प्रत्यक्ष अवलोकन
यह यात्रा उन अंतरराष्ट्रीय संपर्कों में से है जो देशों के बीच नीति स्तर पर नहीं, समाज स्तर पर पुल का निर्माण करती हैं।






