भारत के भविष्य का ब्लूप्रिंट तैयार: सूरत में शिक्षा सुधारों पर देशभर के शिक्षाविदो ने एक मंच से दिया संदेश, विकास का आधार केवल अर्थव्यवस्था नहीं, मूल्यनिष्ठ शिक्षा होगी

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संवाद 24 डेस्क। सूरत के वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय परिसर में 26 दिसंबर 2025 से तीन दिवसीय राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यशाला का आगाज हुआ। यह आयोजन शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की पहल पर सरदार वल्लभभाई राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (SVNIT) और विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में सम्पन्न हो रहा है। कार्यशाला का मुख्य विषय “विकसित भारत में शिक्षा का योगदान” निर्धारित किया गया है, जिसके अंतर्गत भारत में शिक्षा संरचना, नीति, गुणवत्ता और भावी सुधारों पर गहन विचार-विमर्श जारी है। देशभर से आए शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और संस्थागत प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को राष्ट्रीय महत्व की दिशा में विशेष रूप से प्रतिष्ठित बना दिया है।

उद्घाटन सत्र में सवानी समूह के अध्यक्ष वल्लभभाई सवानी मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए। अपने संबोधन में उन्होंने इस विचार को रेखांकित किया कि भारत के विकसित होने की यात्रा केवल औद्योगिक प्रगति या आर्थिक पैरामीटरों से नहीं मापी जा सकती। उनके अनुसार एक सशक्त, मूल्यनिष्ठ और चरित्रवान शिक्षा व्यवस्था ही वह आधारशिला है, जो राष्ट्र के भविष्य को दिशा देती है। उन्होंने कहा कि शिक्षा को केवल रोजगारपरक नहीं, बल्कि राष्ट्रहितकारी और नैतिक अधिष्ठानयुक्त होना चाहिए। कार्यक्रम में सारस्वत अतिथि के रूप में SVNIT सूरत के निदेशक प्रो. अनुपम शुक्ला और वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. किशोर चावड़ा उपस्थित रहे। दोनों शिक्षाविदों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, उच्च शिक्षा में संभावित परिवर्तनों तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में भारतीय शिक्षा व्यवस्था की भूमिका पर अपने विचार साझा किए।

न्यास की पृष्ठभूमि और उद्देश्य: जमीनी स्तर पर शिक्षा सुधार की राह
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयोजक ए. विनोद ने कार्यशाला में न्यास की गतिविधियों और इसके गठन की भावनात्मक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह संगठन शिक्षा बचाओ आंदोलन से जन्म लेकर आज एक राष्ट्रीय शिक्षा सुधार मंच के रूप में स्थापित हुआ है। न्यास का लक्ष्य भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों, राष्ट्रभक्ति और आधुनिक अकादमिक संरचनाओं का समन्वय कर भारतीय शिक्षा मॉडल को विकसित करना है।

विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण, चरित्र विकास और राष्ट्रभावना सुदृढ़ीकरण को केंद्र में रखते हुए न्यास द्वारा संचालित गतिविधियाँ देश के अनेक प्रांतों में निरंतर गति पकड़ रही हैं। विनोद ने साफ शब्दों में कहा कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि जीवन निर्माण होना चाहिए।

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान अधिनियम: नीतिगत दिशा में महत्वपूर्ण कदम
भारतीय विश्वविद्यालय संघ की महासचिव प्रो. पंकज मित्तल ने कार्यशाला में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान अधिनियम’ के महत्व की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस अधिनियम के अंतर्गत कुछ प्रमुख परिषदों –
विकसित भारत अधिनियम परिषद
विकसित भारत शिक्षा गुणवत्ता परिषद
विकसित भारत शिक्षा मानक परिषद
की स्थापना का प्रस्ताव है। ये निकाय शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर गुणवत्ता मानकों का निर्धारण, निरीक्षण और सुधारात्मक सुझावों को लागू करने हेतु कार्य करेंगे। प्रो. मित्तल ने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे अधिनियम का अध्ययन कर सुझाव भेजें ताकि नीति निर्माण में जनभागीदारी आधारित विशेषज्ञता शामिल हो सके।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और न्यास की कार्ययोजना
कार्यशाला के दूसरे सत्र में देशभर से आए प्रतिनिधियों द्वारा संगठनात्मक और कार्यक्रमगत गतिविधियों की प्रस्तुतियाँ दी गईं। इस सत्र के मुख्य वक्ता न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी रहे। उन्होंने बताया कि न्यास सैकड़ों शिक्षण संस्थानों के सहयोग से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के क्रियान्वयन की दिशा में सक्रिय है।

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि पिछले वर्ष आरंभ किया गया अभियान “एक राष्ट्र, एक नाम: भारत” सफलता के करीब है और लगभग 10 लाख हस्ताक्षर एकत्रित किए जा चुके हैं। इसके साथ ही श्रीनगर में आयोजित विशेष शैक्षिक कार्यक्रम को संगठन की उल्लेखनीय उपलब्धि माना गया, जहाँ स्थानीय विद्यालयों एवं संस्थानों के साथ व्यापक सहभागिता दर्ज की गई।

मूल्यपरक शिक्षा: विकसित भारत का आधार
वल्लभभाई सवानी के अनुसार, विकसित भारत का सपना तभी साकार हो सकेगा जब तकनीकी और औद्योगिक विकास के साथ-साथ शिक्षा के सांस्कृतिक व नैतिक पहलुओं को भी उतनी ही प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने कहा कि प्रगति का आधार केवल GDP वृद्धि या रोजगार वृद्धि तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज के नैतिक उत्थान और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों में सृजनशीलता, सेवा-भाव, सत्यनिष्ठा, और देशहित की चेतना जागृत करने पर बल दिया।

शैक्षिक प्रयोग और नवाचार: तीसरे सत्र की मुख्य झलक
तृतीय सत्र में देशभर से आए शिक्षण संस्थानों ने अपने-अपने परिसर में किए जा रहे शैक्षिक नवाचार, कौशल आधारित परियोजनाएँ, और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़े प्रयोगों का प्रस्तुतीकरण किया। इनमें सांस्कृतिक बौद्धिकता आधारित शिक्षण मॉडल, कौशल विकास एवं उद्यमिता कार्यक्रम, भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित पाठ्य सामग्री निर्माण, और विद्यालय स्तरीय नेतृत्व विकास योजनाएँ शामिल रहीं।

न्यास के प्रतिमान केंद्रों ने ऐसे मॉडलों को प्रस्तुत किया जिन्हें विभिन्न राज्यों में सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है और जिन्हें आगे अन्य संस्थानों तक विस्तार देने की तैयारी जारी है। कई प्रांतों के प्रतिनिधियों ने इन मॉडलों को अपनी राज्य इकाइयों में लागू करने की इच्छा भी व्यक्त की।

राष्ट्रीय सहभागिता: संख्या से अधिक एक सामूहिक संकल्प
इस कार्यशाला में 600 से अधिक शिक्षाविद, शोधकर्ता, शिक्षण संस्थानों के प्रमुख, और युवा शोधार्थी उपस्थित रहे। यद्यपि यह संख्या आयोजन की व्यापकता को दर्शाती है, किंतु लक्ष्य मात्र संख्या नहीं, साझा संकल्प की मजबूती है। आयोजन समिति ने आवास, परिवहन, पंजीयन, भोजन और संवाद सत्रों के संचालन में सुव्यवस्थित प्रबंधन सुनिश्चित किया, जिसके लिए प्रतिभागियों ने आभार व्यक्त किया।

विकसित भारत के लिए शिक्षा मॉडल: अपेक्षाएँ और भविष्य की दिशा
कार्यशाला के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि 21वीं सदी का भारत केवल ज्ञान उपभोक्ता नहीं, बल्कि ज्ञान उत्पादक और ज्ञान निर्यातक देश बनने की ओर अग्रसर है। इसके लिए शिक्षा संस्थानों को वैज्ञानिक उन्नति, शोध संवर्धन, नवाचार, कौशल विकास और सांस्कृतिक आधार पर खड़े भारतीय मॉडल को समानांतर रूप से आगे बढ़ाना होगा।

शिक्षाविदों ने इस बात पर सहमति जताई कि भारतीय शिक्षा प्रणाली को वैश्विक मानकों पर प्रतिस्पर्धी बनाते हुए भी उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जोड़ा जाना आवश्यक है। यह कार्यशाला उसी दिशा में एक संगठित प्रयास के रूप में सामने आई है।

समापन टिप्पणी: शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का संकल्प
सूरत में प्रारंभ हुई यह कार्यशाला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि शिक्षा आधारित राष्ट्र निर्माण यात्रा का चरण प्रतीत होती है। चर्चाएँ, सुझाव, अनुभव और प्रस्ताव आने वाले समय में नीतिगत परिवर्तनों और जमीनी सुधारों का आधार बन सकते हैं। विकसित भारत की दिशा में यह पहल आने वाले शिक्षण वर्ष और दशकों में एक नई सोच, नई कार्यशैली और नई प्राथमिकताओं को जन्म दे सकती है।

Samvad 24 Office
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