हम सरकार नहीं चलाते, समाज गढ़ते हैं, मोहन भागवत के वक्तव्यों में छिपा RSS का 100 वर्षों का विज़न
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संवाद 24 डेस्क। संघ यात्रा के 100 वर्ष : नए क्षितिज, मुंबई के वर्ली स्थित सभागार में आयोजित इस दो दिवसीय कार्यक्रम ने देश के सामाजिक-राजनीतिक समाधानों पर बहस तेज़ कर दी है, जिसमें संस्कृति, राजनीति, धर्म-सामाजिक पहचान और राष्ट्रवाद शामिल हैं।
कार्यक्रम के दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने देश, समाज और विश्व से जुड़े विविध विषयों पर जो विचार रखे, वे केवल एक संगठन की दृष्टि नहीं बल्कि आने वाले भारत की दिशा को रेखांकित करने वाले विचार के रूप में सामने आए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 2047 में देश विभाजन का डर पालने की बजाय, अखंड भारत के उदय की कल्पना और संकल्प करना चाहिए।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि जो कार्य 500 वर्षों में सुल्तानों और बादशाहों से नहीं हो सका, जो 200 वर्षों में अंग्रेज़ भी नहीं कर सके, वह स्वतंत्र भारत में संभव नहीं है। भारत आज 1947 वाला भारत नहीं रहा। देश ने सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय चेतना के स्तर पर लंबी यात्रा तय की है। इसलिए जो लोग भारत को तोड़ने के दुस्वप्न देख रहे हैं, उनके मंसूबे कभी सफल नहीं होंगे। भारत जुड़ेगा और यह केवल कल्पना नहीं, बल्कि सुनिश्चित भविष्य है, ऐसा विश्वास उन्होंने व्यक्त किया।
यह आयोजन न केवल संगठन के ऐतिहासिक यात्रा का प्रतीक रहा, बल्कि आरएसएस के सरसंघचालक के विचारों को जनता के सामने लाने का प्लेटफ़ॉर्म भी बना, जहाँ विचारधारा, संस्कृति और राष्ट्रवाद के मुद्दे खुले रूप से रखे गए।
इस कार्यक्रम की एक विशेषता यह रही कि इसे केवल भाषण तक सीमित न रखकर, प्रश्नोत्तर संवाद का स्वरूप दिया गया। देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए 900 से अधिक प्रतिष्ठित मान्यवरों ने राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विषयों पर प्रश्न पूछे। कुल 143 प्रश्नों को 14 श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया, जिनमें संघ नीति, हिन्दुत्व, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, संस्कृति, कला, खेल, भाषा, पर्यावरण और जीवनशैली जैसे विषय शामिल थे। यह संवाद केवल प्रश्नों के उत्तर देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज के मन में उठने वाली शंकाओं और जिज्ञासाओं को स्पष्ट दिशा देने का प्रयास भी बना।
पारंपरिक रूप से बॉलीवुड और राजनैतिक-सामाजिक संगठनों के संबद्धता की चर्चा भारत में पुरानी है, लेकिन शताब्दी वर्ष के इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में फिल्मी सितारों की भागीदारी ने बहस को नई दिशा दी है। इस दो-दिवसीय समारोह के कई प्रमुख बॉलीवुड हस्तियाँ भी उपस्थित रहीं, जिनमें सलमान खान, हेमा मालिनी, सुभाष घई, प्रसून जोशी, पूनम ढिल्लों, मोहित सूरी रनबीर कपूर, विक्की कौशल, अक्षय कुमार, करण जौहर, शिल्पा शेट्टी, अनन्या पांडे, रवीना टंडन जैसे नाम प्रमुख हैं।

कुछ विश्लेषक इस कार्यक्रम में बॉलीवुड हस्तियों की उपस्थिति को “सामाजिक स्वीकार्यता का संकेत” मानते हैं, यह कहना कि एक बड़े सामाजिक संगठन के कार्यक्रम में प्रसिद्ध कलाकार उपस्थित हों, समाज की धारणा और संगठन की लोक-स्वीकृति के लिए संकेतक हो सकता है।
बांग्लादेश में हिन्दू समाज पर हो रहे अत्याचारों के संदर्भ में सरसंघचालक ने गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने वहां रहने वाले लगभग सवा करोड़ हिन्दुओं से संगठित होने का आह्वान किया। उनका कहना था कि यदि समाज संगठित होता है, तो अत्याचार अपने आप रुकने लगते हैं। संगठन ही वह शक्ति है जो भय को आत्मविश्वास में बदल देती है। उन्होंने यह संकेत भी दिया कि किसी भी समाज की सुरक्षा केवल बाहरी हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि आंतरिक एकता और आत्मबल से सुनिश्चित होती है। यह दृष्टिकोण संघ की उस मूल विचारधारा को दर्शाता है, जिसमें समाज को स्वयं अपने संरक्षण के लिए सक्षम बनाने पर जोर दिया जाता है।
संघ में नेतृत्व और जाति के प्रश्न पर सरसंघचालक ने स्पष्ट किया कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं, बल्कि हिन्दू संघ का सरसंघचालक होता है। उन्होंने कहा कि संघ का नेतृत्व किसी जाति विशेष से बंधा नहीं है। भविष्य में अनुसूचित जाति या जनजाति से आने वाले कार्यकर्ता भी सरसंघचालक बन सकते हैं। यह वक्तव्य संघ की उस विचारधारा को रेखांकित करता है जिसमें व्यक्ति की जाति नहीं, बल्कि उसका चरित्र, समर्पण और राष्ट्र के प्रति निष्ठा महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह सामाजिक समरसता की अवधारणा को भी मजबूती देता है।
सरसंघचालक ने बताया कि संघ के कार्यकर्ताओं की औसत आयु 28 वर्ष है और इसे 25 वर्ष से नीचे लाने का प्रयास चल रहा है। उन्होंने युवाओं को प्रयोग की स्वतंत्रता देने, उनकी भाषा में संवाद करने और त्रुटि होने पर उनके साथ खड़े रहने पर जोर दिया। उनका कहना था कि भारतीय दर्शन अंतरात्मा तक प्रभाव डालता है, जबकि पाश्चात्य प्रभाव अक्सर बाहरी स्तर तक सीमित रहता है। यदि वर्तमान पीढ़ी युवाओं की जिज्ञासा को समझे, तो समन्वय से एक सशक्त भारत का निर्माण संभव है।

कार्यक्रम में सरसंघचालक के प्रमुख संदेश एवं उसकी व्याख्या
इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता, RSS के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कार्यक्रम के दौरान कई विचार व्यक्त किए, जिनका सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में बड़ा प्रभाव पड़ेगा –
“हम सरकार को रिमोट-कंट्रोल नहीं करते”
उनका बयान: “हम पीछे बैठकर सरकार नहीं चलाते। सरकार उन लोगों द्वारा चलाई जाती है जो सरकार में हैं।”
वक्तव्य का आशय – मोहन भागवत जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी भी सरकार को “रिमोट कंट्रोल” से नहीं चलाता। उन्होंने दो टूक कहा कि जो लोग सरकार में हैं, वही शासन चलाते हैं और संघ का कार्यक्षेत्र सामाजिक संगठन का है, न कि सत्ता संचालन का।
व्याख्या – यह वक्तव्य उस लंबे समय से चल रहे आरोप का सीधा उत्तर है, जिसमें कहा जाता रहा है कि RSS केंद्र सरकार या किसी विशेष राजनीतिक दल के निर्णयों को पर्दे के पीछे से नियंत्रित करता है। भागवत का यह कथन संघ की संवैधानिक सीमाओं और वैचारिक भूमिका को रेखांकित करता है। उनके अनुसार, RSS का कार्य व्यक्ति निर्माण, सामाजिक समरसता और राष्ट्र-चेतना का विकास है, न कि प्रशासनिक निर्णय लेना। यह बयान संघ को एक वैचारिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में स्थापित करने का प्रयास भी माना जा सकता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर अपनी भूमिका को सीमित और स्पष्ट बताता है।
“हिंदू कोई संप्रदाय नहीं, जीवन-पद्धति है”
वक्तव्य का आशय – मोहन भागवत जी ने कहा कि “हिंदू” कोई संकीर्ण धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि एक जीवन-पद्धति (Way of Life) है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू होना किसी पूजा-पद्धति से अधिक, सहअस्तित्व, स्वीकार्यता और विविधता के सम्मान की भावना से जुड़ा है।
व्याख्या – इस कथन के माध्यम से भागवत जी हिंदू पहचान को समावेशी और व्यापक सांस्कृतिक अवधारणा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनका तर्क यह है कि भारत की सभ्यता मूलतः ऐसी रही है जहाँ विभिन्न मत, पंथ और विचार साथ-साथ पनपे हैं। हालाँकि, आलोचकों का मानना है कि हिंदू को “सांस्कृतिक पहचान” के रूप में प्रस्तुत करना व्यवहार में कई बार धार्मिक बहुसंख्यकवाद की आशंका भी पैदा करता है। बावजूद इसके, भागवत का यह वक्तव्य संघ की उस आधिकारिक लाइन को दोहराता है, जिसमें हिंदुत्व को एकीकृत सांस्कृतिक सूत्र के रूप में देखा जाता है।
“भारत में चार प्रकार के हिंदू हैं”
वक्तव्य का आशय – भागवत जी ने समाज को समझाने के लिए कहा कि भारत में चार प्रकार के हिंदू पाए जाते हैं – जो गर्व से स्वयं को हिंदू कहते हैं। जो हैं तो हिंदू, लेकिन इसे विशेष रूप से व्यक्त नहीं करते। जो हिंदू मूल्यों के अनुसार जीते हैं, पर स्वयं को उस नाम से नहीं जोड़ते और वे, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से लगभग कट चुके हैं।
व्याख्या – यह वर्गीकरण सामाजिक यथार्थ को समझाने का प्रयास है। संघ प्रमुख यह संकेत देते हैं कि भारतीय समाज की बड़ी संख्या संस्कृति से जुड़ी तो है, लेकिन पहचान के स्तर पर भ्रम या दूरी महसूस करती है। इस कथन का निहितार्थ यह है कि RSS स्वयं को किसी पर पहचान थोपने वाला नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति को पुनर्जीवित करने वाला संगठन मानता है। वहीं, आलोचक इसे सामाजिक वर्गीकरण का एक वैचारिक प्रयास भी मानते हैं, जो भविष्य में राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है।
“RSS समाज को संगठित और गुणवान बनाना चाहता है”
वक्तव्य का आशय – भागवत जी ने कहा कि संघ का मूल उद्देश्य सत्ता प्राप्ति नहीं, बल्कि ऐसा समाज खड़ा करना है जो संगठित, अनुशासित और नैतिक रूप से गुणवान हो। उनका मानना है कि जब समाज स्वयं सशक्त होगा, तब शासन और व्यवस्था स्वतः बेहतर होंगी।
व्याख्या – यह वक्तव्य RSS की उस मूल अवधारणा को सामने लाता है, जिसमें राज्य नहीं, समाज को परिवर्तन की इकाई माना गया है। संघ की सोच के अनुसार, यदि समाज चरित्रवान होगा तो राजनीति और शासन भी अपने-आप सुधरेंगे। यह विचारधारा पश्चिमी “स्टेट-सेंट्रिक” मॉडल से अलग है, जहाँ परिवर्तन का केंद्र सरकार मानी जाती है। भागवत का यह कथन संघ की दीर्घकालिक सामाजिक रणनीति को दर्शाता है, जिसमें सत्ता से अधिक संस्कार और चरित्र को महत्व दिया गया है।
“2047 को लेकर भय नहीं, संकल्प चाहिए”
वक्तव्य का आशय – मोहन भागवत जी ने कहा कि देश को 2047 यानी स्वतंत्रता के 100 वर्ष को लेकर डर या आशंका में नहीं जीना चाहिए, बल्कि एकजुट होकर अखंड, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का संकल्प लेना चाहिए।
व्याख्या – यह वक्तव्य भविष्य की ओर देखने का आह्वान है। भागवत जी के अनुसार, बार-बार देश के टूटने या बिखरने की आशंकाएँ पालने के बजाय समाज को आत्मविश्वास और सकारात्मक दृष्टि के साथ आगे बढ़ना चाहिए। यह कथन ‘अखंड भारत’ की अवधारणा को सीधे राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक एकता के रूप में प्रस्तुत करता है। संघ समर्थकों के अनुसार, यह विचार भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना की अखंडता पर केंद्रित है।
मोहन भागवत जी के वक्तव्य केवल तात्कालिक राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि वे RSS की दीर्घकालिक वैचारिक दिशा को स्पष्ट करते हैं। 2047 के भारत को लेकर उनका संदेश स्पष्ट है डर पालने से नहीं, संकल्प साधने से राष्ट्र आगे बढ़ता है। अखंड भारत का स्वप्न, संगठित समाज और संस्कारित नागरिक यही वह त्रिवेणी है, जिस पर भविष्य का भारत खड़ा होगा।
RSS की शताब्दी वर्ष का यह कार्यक्रम केवल एक संगठन का ऐतिहासिक आयोजन नहीं रहा बल्कि यह एक बड़े सामाजिक राजनीतिक विमर्श को जगाने वाला मंच बन गया है, जिसमें देश की पहचान, संस्कृति, राजनीति, धार्मिक बहुलता और भविष्य की दिशा पर गहरी बहस हो रही है। कार्यक्रम ने यह प्रश्न उठाया है कि राष्ट्रीय सेवा और राष्ट्रीय पहचान को कैसे संतुलित किया जा सकता है। आगे के वर्षों में यह विषय और अधिक सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनेगा, जिससे भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान, लोकतांत्रिक मूल्य और सामाजिक विविधता की नई समझ विकसित होगी।






