न सत्ता की चाह, न विरोध की राजनीति, संघ को लेकर सरसंघचालक ने तोड़ीं कई भ्रांतियां
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संवाद 24 संवाददाता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित व्याख्यानमाला और संवाद कार्यक्रम केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विमर्श का एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुआ। ‘संघ यात्रा के 100 वर्ष : नए क्षितिज’ शीर्षक से आयोजित संवाद में सरसंघचालक ने समाज, संगठन और राष्ट्र के अंतर्संबंधों पर अपने विचार रखे। उनका स्पष्ट संदेश था, देश में स्थायी और सकारात्मक परिवर्तन तभी संभव है, जब समाज संगठित, गुणवान और जागरूक बने।
मुंबई के वर्ली स्थित सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आई 900 से अधिक प्रतिष्ठित हस्तियों ने सहभागिता की। उद्योग, शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति, कला, चिकित्सा, विधि, मीडिया और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों की उपस्थिति ने इस आयोजन को व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया।

समाजरूप संगठन की अवधारणा
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन की शुरुआत में ही यह स्पष्ट किया कि स्वयं को किसी राजनीतिक दल, शक्ति केंद्र या सत्ता संरचना के रूप में नहीं देखता। संघ का लक्ष्य ‘समाजरूप संगठन’ खड़ा करना है, ऐसा समाज जो स्वयं संगठित हो, जागरूक हो और अपने दायित्वों को समझता हो।
उन्होंने कहा कि नेता, नारा, नीति, पार्टी, सरकार, विचार या दर्शन, ये सभी समाज के लिए सहायक साधन हैं, लेकिन इनका वास्तविक स्वामी समाज स्वयं है। यदि समाज जागरूक नहीं होगा, तो किसी भी व्यवस्था से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सकते। इसीलिए संघ का मूल प्रयास समाज को उसके कर्तव्यबोध और सामूहिक चेतना से जोड़ना है।
संघ को बाहरी रूप से नहीं, अनुभव से समझने की आवश्यकता
अपने वक्तव्य में डॉ. भागवत ने संघ को लेकर प्रचलित भ्रांतियों पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा
- संघ के स्वयंसेवक संचलन करते हैं, लेकिन संघ कोई पैरामिलिट्री संगठन नहीं है।
- स्वयंसेवक लाठी-काठी चलाते हैं, पर संघ अखिल भारतीय अखाड़ा नहीं है।
- संघ में घोष, व्यक्तिगत गीत और सामूहिक गीत होते हैं, पर वह कोई संगीत विद्यालय नहीं है।
- स्वयंसेवक राजनीति में सक्रिय हो सकते हैं, लेकिन संघ स्वयं कोई राजनीतिक दल नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल बाहरी गतिविधियों के आधार पर संघ का मूल्यांकन करना सही नहीं है। यदि संघ को समझना है, तो उसकी शाखा, कार्यकर्ता, उनके परिवार, कार्यक्रम, वर्ग और शिविर इन सभी का प्रत्यक्ष और सूक्ष्म अवलोकन आवश्यक है। संघ की वास्तविक पहचान उसके दैनिक जीवन और सामाजिक व्यवहार में दिखाई देती है।
संघ का कार्य: बिना विरोध, बिना प्रतिस्पर्धा
सरसंघचालक ने दो टूक शब्दों में कहा कि संघ न तो किसी के विरोध में चलता है और न ही किसी से प्रतिस्पर्धा करता है। संघ का कार्य देश के लिए है, किसी प्रतिक्रिया या विरोध की भावना से प्रेरित नहीं। संघ सत्ता या प्रसिद्धि की आकांक्षा नहीं रखता; उसका कार्य निरंतर, शांत और समाज केंद्रित है। उनके अनुसार, संघ की कार्यपद्धति का मूल आधार यह विश्वास है कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन संघर्ष या टकराव से नहीं, बल्कि सहयोग, समरसता और सेवा से आता है।
संघ स्थापना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
संघ स्थापना के संदर्भ में डॉ. भागवत ने संघ संस्थापक के चिंतन को विस्तार से सामने रखा। उन्होंने बताया कि डॉ. हेडगेवार ने स्वतंत्रता आंदोलन की सभी धाराओं का अनुभव किया था। इतिहास के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि भारत ने कई बार पराक्रम से स्वतंत्रता तो प्राप्त की, लेकिन वह स्थायी नहीं रह सकी।
इस प्रश्न ने उन्हें गहराई से सोचने पर विवश किया, क्या केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही पर्याप्त है? या समाज में कोई ऐसी कमी है, जिसके कारण स्वतंत्रता टिक नहीं पाती? डॉ. हेडगेवार ने निष्कर्ष निकाला कि समाज की एकता, अनुशासन और गुणों के अभाव में स्वतंत्रता कमजोर हो जाती है।
उन्होंने देखा कि स्वार्थ बढ़ रहा है, सामाजिक अनुशासन कम हो रहा है और इसके परिणामस्वरूप दरिद्रता, अज्ञान और विघटन उत्पन्न हो रहा है। इसी चिंतन के आधार पर, अनेक प्रयोगों के पश्चात 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई—जिसका उद्देश्य समाज को गुणवान, संगठित, अनुशासित और आत्मनिर्भर बनाना था।
धर्म, पंथ और भारत का सनातन स्वभाव
अपने विचारों में डॉ. भागवत ने ‘धर्म’ की अवधारणा को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि ‘धर्म निरपेक्षता’ शब्द की व्याख्या अक्सर भ्रमित करती है। उनके अनुसार, ‘पंथ निरपेक्षता’ अधिक उपयुक्त शब्द है। उन्होंने समझाया कि धर्म किसी पूजा पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मनुष्य का स्वभाव और कर्तव्य है, जैसे बहना पानी का धर्म है और जलना आग का। धर्म वही है, जो इहलोक और परलोक दोनों में कल्याण करता है, जो सभी को उन्नत करता है और अस्तित्व की एकता का संदेश देता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत का स्वभाव सनातन है। भारत को ‘महाशक्ति’ नहीं, बल्कि ‘विश्वगुरु’ बनना है। महाशक्ति बल से वर्चस्व स्थापित करती है, जबकि विश्वगुरु ज्ञान, मूल्य और समरसता के माध्यम से विश्व को जोड़ता है।
दूसरा सत्र: समाज सशक्तिकरण और सहभागिता
दूसरे सत्र में सरसंघचालक ने समाज की संगठित शक्ति को राष्ट्र की शक्ति का आधार बताया। उन्होंने कहा कि संघ समाज को सशक्त करने के ध्येय से आगे बढ़ रहा है और इसमें समाज के प्रत्येक व्यक्ति की सहभागिता आवश्यक है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का कार्य केवल दैनिक शाखा में शारीरिक व्यायाम तक सीमित नहीं है। अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार देशहित के कार्यों में निस्वार्थ भाव से सहभागिता करना भी संघ का ही कार्य है। संघ यह मानता है कि जो भी व्यक्ति समाज हित में प्रामाणिक रूप से कार्य करता है, वह संघ कार्य में सहभागी है। उन्होंने कहा “If you have a theme, we have a team, if you have a team, we have a theme.” यह वाक्य संघ की आज की संगठनात्मक स्थिति और लचीलेपन को दर्शाता है।
स्वदेशी और स्वबोध का विचार
स्वदेशी के संदर्भ में डॉ. भागवत ने व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कई विदेशी वस्तुएं ऐसी हैं, जिनके बिना हमारा दैनिक जीवन चल सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि उसकी खरीदारी से देश का रोजगार कैसे बढ़ेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय व्यवहार आवश्यक है, लेकिन वह किसी दबाव में नहीं, बल्कि देश के वातावरण और हितों के अनुरूप होना चाहिए। स्वदेशी का अर्थ केवल वस्तुओं का चयन नहीं, बल्कि स्वबोध, अपने अस्तित्व, संस्कृति और जिम्मेदारियों की समझ भी है।
पंच परिवर्तन का संकल्प
सरसंघचालक ने अपने उद्बोधन में ‘पंच परिवर्तन’ के संकल्प को विस्तार से रखा। ये पाँच बिंदु हैं
- सामाजिक समरसता
- पर्यावरण संरक्षण
- कुटुंब प्रबोधन
- स्वबोध
- संविधान आधारित नागरिक कर्तव्यों का पालन
उन्होंने कहा कि इन पाँचों बिंदुओं को केवल भाषण तक सीमित न रखकर, दैनिक जीवन के व्यवहार में उतारना होगा। स्वयंसेवकों से अपेक्षा है कि वे पहल करें, ताकि यह परिवर्तन धीरे-धीरे पूरे समाज में प्रसारित हो सके।
समाज के लिए आदर्श उदाहरणों का निर्माण
संघ का कार्य केवल संगठन विस्तार नहीं, बल्कि समाज में आदर्श उदाहरणों का निर्माण है। गांव-गांव और बस्तियों में ऐसे चरित्रवान, निस्वार्थ और ईमानदार व्यक्तियों का निर्माण, जो सभी के सुख-दुःख में सहभागी हों, संघ के कार्य का मूल उद्देश्य है। जब ऐसे उदाहरण देशव्यापी बनते हैं, तभी समाज में स्थायी प्रेरणा का संचार होता है।
सज्जन शक्ति से मित्रता: संघ का मूल भाव
डॉ. भागवत ने कहा कि संघ का आधार समाज का प्रेम और सज्जनों की भावना है। संघ ने विरोध देखा है और आज भी विरोध का सामना करता है, लेकिन कभी कटुता का भाव नहीं रखा। सज्जनों से मित्रता और सज्जन शक्ति का जागरण संघ कार्य का मूलभूत भाव रहा है। समय और परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन संघ ने अपनी दिशा नहीं बदली। अपने ध्येय की ओर निरंतर अग्रसर रहना ही संघ की पहचान है।
सेवाकार्य और शताब्दी वर्ष की दिशा
आज देशभर में समाज के सहयोग से संघ के स्वयंसेवक 1 लाख 30 हजार से अधिक सेवाकार्य संचालित कर रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, स्वावलंबन, पर्यावरण और सामाजिक समरसता जैसे क्षेत्रों में यह कार्य समाज के व्यापक सहयोग से आगे बढ़ रहा है। शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संघ इन कार्यों को और अधिक व्यापक तथा प्रभावी बनाने के लिए प्रयत्नशील है, ताकि समाज की संगठित शक्ति राष्ट्र निर्माण में और अधिक सक्रिय भूमिका निभा सके।
संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित यह व्याख्यानमाला केवल अतीत की यात्रा का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा का स्पष्ट संकेत है। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का संदेश साफ है, देश का भविष्य किसी एक संस्था, सरकार या विचारधारा पर नहीं, बल्कि संगठित, गुणवान और जागरूक समाज पर निर्भर करता है। जब समाज अपने कर्तव्य को समझेगा, सज्जन शक्ति सक्रिय होगी और पंच परिवर्तन का संकल्प व्यवहार में उतरेगा, तभी भारत न केवल सशक्त राष्ट्र बनेगा, बल्कि विश्व को जोड़ने वाला ‘विश्वगुरु’ भी सिद्ध होगा।






