“देश क्या है?” के बोध से राष्ट्रनिर्माण तक: राजकोट में युवाओं के साथ सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का प्रेरक संवाद
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संवाद 24 राजकोट। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक ने आज गुजरात के स्थित सेवा भारती भवन में सौराष्ट्र–कच्छ अंचल की युवा प्रतिभाओं के साथ एक विचारोत्तेजक संवाद किया। यह कार्यक्रम केवल औपचारिक व्याख्यान नहीं, बल्कि राष्ट्र, समाज और युवाशक्ति की भूमिका पर गहन मंथन का मंच बना। सरसंघचालक जी ने युवाओं से सीधे संवाद करते हुए देशबोध, सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक दायित्व और संघ के कार्यदर्शन को सरल, स्पष्ट और तर्कपूर्ण ढंग से सामने रखा।
युवाओं से संवाद: राष्ट्रबोध की स्पष्टता क्यों आवश्यक
अपने संबोधन की शुरुआत में डॉ. भागवत ने कहा कि जब युवा जीवन के विभिन्न क्षेत्रों—शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, उद्योग, प्रशासन, संस्कृति या सेवा—में देश के लिए कार्य करते हैं, तब उनके मन में यह स्पष्ट होना चाहिए कि “देश क्या है?” इतिहास के अनुभवों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि अतीत में इसी स्पष्ट विचार के अभाव या उसके धुंधला पड़ने से देश गुलामी का शिकार हुआ। उनका कहना था कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं का नाम नहीं, बल्कि चेतना, भावना और साझा सांस्कृतिक स्मृति का जीवंत स्वरूप है।
भारत माता: भूमि नहीं, चैतन्य भावना
सरसंघचालक ने भारत को “चैतन्यमय” बताते हुए कहा कि हम इसे भारत माता कहते हैं, क्योंकि यह केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है। इसकी आत्मा, संस्कृति और भावनात्मक एकता इसे जीवंत बनाती है। इसी कारण भारत का विभाजन भावना के स्तर पर संभव नहीं है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे राष्ट्र को केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि जीवित सांस्कृतिक इकाई के रूप में समझें और उसी दृष्टि से अपने जीवन के निर्णय करें।
संघ स्थापना की पृष्ठभूमि और डॉ. हेडगेवार का मंथन
संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा संघ स्थापना से पूर्व किए गए गहन मंथन का उल्लेख करते हुए सरसंघचालक ने संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि संघ की स्थापना किसी तात्कालिक राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि समाज की दीर्घकालिक आवश्यकता को ध्यान में रखकर हुई। उद्देश्य था—संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करना, उसमें आत्मविश्वास जगाना और उसे राष्ट्रनिर्माण की दिशा में सक्रिय करना।
‘हिन्दू’ एक स्वभाव है
डॉ. भागवत ने अपने संबोधन में “हिन्दू” शब्द के अर्थ और भाव पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा, “जैसे ब्रिटेन में ब्रिटिश और अमेरिका में अमेरिकन रहते हैं, वैसे ही हिन्दुस्तान में रहने वाले हिन्दू हैं।” उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और हिन्दुस्तान अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं। भारत एक स्वभाव है और हिन्दू भी एक स्वभाव है—मिल-जुलकर, साथ चलकर, विविधता में एकता बनाए रखने का स्वभाव। यही समन्वय और सामूहिकता हिन्दू जीवनदृष्टि की पहचान है।
वसुधैव कुटुंबकम की भावना
सरसंघचालक ने कहा कि भारतीय समाज की मूल भावना “वसुधैव कुटुंबकम” रही है, संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानने की भावना। उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातन, भारतीय, इंडिक, आर्य और हिन्दू ये सभी नाम एक ही सांस्कृतिक प्रवाह के परिचायक हैं। हालांकि ‘हिन्दू’ शब्द सरल है और जनसामान्य में आसानी से समझ में आता है, इसलिए व्यवहार में इसका प्रयोग अधिक प्रचलित है।
आत्म-विस्मृति के षड्यंत्र और समाज की जिम्मेदारी
अपने वक्तव्य में डॉ. भागवत ने वर्तमान समय में हिन्दू समाज को आत्म-विस्मृत करने के प्रयासों की ओर भी संकेत किया। उन्होंने कहा कि हिन्दू समाज आदिकाल से इस भूमि पर निवास करता आया है और देश को शक्तिशाली, सक्षम व विकसित बनाने की जिम्मेदारी पूरे समाज की है। समाज की जड़ों से काटने के प्रयास राष्ट्र को कमजोर करते हैं। ऐसे में आत्मबोध और सांस्कृतिक स्मृति का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
संघ का कार्य: एक दृष्टि, एक प्रक्रिया
सरसंघचालक ने संघ के कार्य को समझाते हुए कहा कि संघ शाखा के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण, श्रेष्ठ और निष्ठावान स्वयंसेवक तैयार करता है। ये स्वयंसेवक समर्पण भाव से समाज के विभिन्न क्षेत्रों—शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक संरक्षण—में सेवा कार्य करते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल शाखा में दिखने वाली गतिविधियों के आधार पर संघ के संपूर्ण कार्य का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
संघ को समझने के लिए संघ में आना होगा
डॉ. भागवत ने दो टूक शब्दों में कहा कि संघ को वास्तव में समझने के लिए संघ में आना होगा। बाहरी धारणाओं या अपूर्ण सूचनाओं के आधार पर संघ के कार्य का मूल्यांकन न्यायसंगत नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि देश का भाग्य बदलने के लिए पूरे समाज की सक्रियता आवश्यक है और समाज में आचरण का परिवर्तन भी उतना ही जरूरी है।
‘पंच परिवर्तन’: हर नागरिक के लिए योगदान का मार्ग
यह स्वीकार करते हुए कि हर व्यक्ति शाखा में नहीं आ सकता, सरसंघचालक ने संघ द्वारा प्रस्तुत ‘पंच परिवर्तन’ की अवधारणा को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि इन पांच क्षेत्रों में कोई भी नागरिक अपने सामर्थ्य के अनुसार छोटे-बड़े कार्य कर देशहित में योगदान दे सकता है। ये पांच परिवर्तन हैं—
सामाजिक समरसता: भेदभाव से ऊपर उठकर समानता और सौहार्द का व्यवहार।
कुटुंब प्रबोधन: परिवार को संस्कारों और संवाद का केंद्र बनाना।
पर्यावरण संरक्षण: पानी बचाना, प्लास्टिक हटाना और पेड़ लगाना।
स्व-बोध और स्वदेशी: अपनी पहचान का बोध और देशी उत्पादों का उपयोग।
नागरिक कर्तव्य: कानून, व्यवस्था और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदार आचरण।
युवाओं की जिज्ञासाएं और सार्थक संवाद
कार्यक्रम के अंत में युवाओं ने संघ, समाज और राष्ट्र से जुड़े अनेक प्रश्न पूछे। सरसंघचालक ने धैर्यपूर्वक और उदाहरणों के साथ सभी जिज्ञासाओं का समाधान किया। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने स्पष्ट कहा कि संघ को समझने के लिए विकिपीडिया या अप्रामाणिक स्रोतों पर निर्भर न रहें, बल्कि संघ-साहित्य पढ़ें। दूसरों के प्रोपेगेंडा के आधार पर संघ को समझा नहीं जा सकता।
निःस्वार्थ सेवा ही संघ कार्य
डॉ. भागवत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति उत्कृष्ट तरीके से, निःस्वार्थ बुद्धि और ईमानदारी से देशहित में कार्य करता है, तो संघ मानता है कि वह संघ का ही कार्य कर रहा है। संघ किसी व्यक्ति को लेबल में नहीं बांधता, बल्कि उसके कार्य और भाव को महत्व देता है।
मातृशक्ति जागरण का संकल्प
इस अवसर पर मातृशक्ति जागरण का संकल्प भी व्यक्त किया गया। सरसंघचालक ने कहा कि समाज के निर्माण और राष्ट्र की चेतना को जीवित रखने में मातृशक्ति की भूमिका केंद्रीय है। परिवार, समाज और राष्ट्र तीनों स्तरों पर नारी शक्ति का सशक्त होना आवश्यक है। कार्यक्रम में सौराष्ट्र प्रांत के संघचालक मुकेशभाई मलकाण सहित अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ता और समाज के प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।
युवाशक्ति और राष्ट्र का साझा भविष्य
राजकोट में हुआ यह संवाद स्पष्ट संदेश देता है कि राष्ट्रनिर्माण केवल नीतियों या संस्थाओं से नहीं, बल्कि जागरूक, संस्कारित और कर्तव्यनिष्ठ युवाओं से होता है। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का यह संबोधन युवाओं को आत्मबोध, सामाजिक दायित्व और राष्ट्रप्रेम के सूत्र में पिरोता हुआ दिखाई दिया। यह कार्यक्रम न केवल विचारों का आदान-प्रदान था, बल्कि भविष्य के भारत की दिशा तय करने वाला एक प्रेरक क्षण भी साबित हुआ।






