सद्भाव संवाद में संस्कृति, तकनीक और बच्चों के भविष्य पर चर्चा, संस्कृति से जुड़ाव ही सुरक्षा कवच
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संवाद 24 रांची। भारतीय समाज के ताने-बाने को सुदृढ़ करने और समकालीन चुनौतियों का समाधान खोजने के उद्देश्य से, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह माननीय दत्तात्रेय होसबाले जी ने रांची में आयोजित ‘सामाजिक सद्भाव बैठक’ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी संदेश दिया है। उनका स्पष्ट मानना है कि “धर्मजागरण सरकार का नहीं, बल्कि समाज का कार्य है।”
करीब 600 से अधिक विभिन्न समुदायों, जातियों और संगठनों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में यह बैठक केवल एक चर्चा मात्र नहीं, बल्कि 21वीं सदी के भारत के लिए एक सामाजिक घोषणापत्र बनकर उभरी है। स्वामी विवेकानंद की जयंती (युवा दिवस) के अवसर पर दिया गया यह उद्बोधन झारखंड सहित पूरे देश की सामाजिक परिस्थितियों के लिए एक संजीवनी के समान है।
धर्मांतरण और ‘3-D’ चुनौती
सरकार्यवाह जी ने झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों की तुलना करते हुए एक गंभीर सच्चाई को रेखांकित किया। उन्होंने धर्मांतरण की समस्या को केवल धार्मिक चश्मे से नहीं, बल्कि सामाजिक और सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखने पर बल दिया।
‘3-D’ समस्या का उल्लेख:
उन्होंने वर्तमान समय में जनजातीय क्षेत्रों के लिए तीन सबसे बड़े खतरे बताए:
धर्मांतरण (Conversion): सुनियोजित तरीके से चर्च और बाहरी शक्तियों द्वारा किया जा रहा सांस्कृतिक हमला।
डी.जे. संस्कृति (DJ Culture): जिसने पारंपरिक लोक संगीत और शांति को शोर में बदल दिया है, जो युवाओं की मानसिकता को प्रभावित कर रहा है।
दारू (Alcoholism): नशाखोरी जो परिवारों को आर्थिक और नैतिक रूप से खोखला कर रही है।
समाधान की राह:
होसबाले जी ने स्पष्ट किया कि गरीबी, अशिक्षा और अंधविश्वास ही धर्मांतरण के द्वार खोलते हैं। उन्होंने ‘घर-वापसी’ को एक सामाजिक उत्तरदायित्व बताते हुए कहा कि जब समाज छुआछूत और जातिगत भेदभाव को त्यागेगा, तभी हिंदू समाज की आंतरिक शक्ति बढ़ेगी।
सामाजिक समरसता: जातिवाद का उन्मूलन और लैंगिक समानता
संघ का जोर हमेशा से ‘जाति-विहीन’ व्यवहार पर रहा है। होसबाले जी ने तार्किक रूप से कहा कि जन्म पर किसी का नियंत्रण नहीं है, अतः किसी को नीचा या ऊँचा समझना अवैज्ञानिक और अधार्मिक है। उन्होंने पुरुष-महिला समानता को आज की अनिवार्य आवश्यकता बताया। उनका तर्क है कि यदि दोनों क्षेत्रों में कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं, तो भेदभाव का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। उन्होंने समाज को जंजीर के उदाहरण से समझाया “प्रत्येक कड़ी (जाति/वर्ग) स्वयं में मजबूत हो और दूसरी कड़ी से जुड़ी रहे।”
डिजिटल युग में संस्कारों का ‘सुरक्षा कवच’
आज के दौर में सोशल मीडिया एक अनिवार्य बुराई बनता जा रहा है। सरकार्यवाह जी ने इसके समाधान के लिए ‘संवाद’ और ‘संस्कृति’ का सूत्र दिया।
नकारात्मक कंटेंट से बचाव: बच्चों को केवल तकनीक देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें यह सिखाना होगा कि क्या नहीं देखना है।
मंदिरों का महत्व: उन्होंने बच्चों को मंदिर ले जाने के पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण बताया अहंकार की मुक्ति। मंदिर जाना केवल पूजा नहीं, बल्कि अनुशासन और शांति प्राप्त करने का माध्यम है।
परिवार की भूमिका: संस्कारों का दायित्व सरकारों का नहीं, परिवारों का है। बच्चों को बुजुर्गों का सम्मान करना सिखाना प्राथमिक शिक्षा होनी चाहिए।
राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ: राजनीति से ऊपर का विषय
झारखंड के संदर्भ में बांग्लादेशी घुसपैठ एक जलता हुआ मुद्दा है। होसबाले जी ने इस पर दो-टूक बात की:
राजनीतिक लाभ: उन्होंने स्वीकार किया कि घुसपैठ का उपयोग लंबे समय से वोट बैंक की राजनीति के लिए किया गया।
आंतरिक सहयोग: उन्होंने एक कड़वी सच्चाई रखी कि कई बार हमारे अपने लोग ही थोड़े लाभ के लिए घुसपैठियों को शरण देते हैं। सीमा पर फेंसिंग के साथ-साथ ‘सामाजिक फेंसिंग’ (जागरूकता) की भी जरूरत है।
संवैधानिक विसंगति: धारा 342 पर चर्चा
संत-महात्माओं के साथ बैठक में धारा 342 का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, यदि कोई जनजातीय व्यक्ति धर्मांतरित होकर ईसाई या मुस्लिम बन जाता है, तब भी उसे जनजातीय आरक्षण और सुविधाएं मिलती रहती हैं। संतों का मानना है कि यही धर्मांतरण का सबसे बड़ा ‘इंसेंटिव’ (प्रलोभन) है। यदि धर्मांतरण के बाद जनजातीय स्टेटस समाप्त करने का प्रावधान हो, तो इस समस्या पर लगाम लगाई जा सकती है।
आर्थिक आत्मनिर्भरता और पारसी समुदाय का उदाहरण
सरकार्यवाह जी ने भारतीय युवाओं को ‘याचक’ (मांगने वाला) बनने के बजाय ‘दाता’ (देने वाला) बनने की प्रेरणा दी।
आरक्षण बनाम पुरुषार्थ: उन्होंने पारसी समुदाय का उदाहरण दिया, जिन्होंने बिना किसी आरक्षण की मांग के केवल अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर देश के विकास में शीर्ष स्थान हासिल किया।
अंतिम व्यक्ति तक लाभ: उन्होंने समाज के सक्षम वर्गों से आह्वान किया कि वे सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति (Antyodaya) तक पहुँचाने में सेतु का कार्य करें।
सेवा और करुणा: दिव्यांग बच्चों का गोद लेना
मानवता के प्रति संघ की दृष्टि को स्पष्ट करते हुए उन्होंने आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों से अपील की कि वे दिव्यांग बच्चों को गोद लें या उनकी सहायता करें। यह केवल दान नहीं, बल्कि सामाजिक ऋण चुकाने का एक माध्यम है।
‘Think Little Less, Act Little More’
स्वामी विवेकानंद के सूत्र को दोहराते हुए दत्तात्रेय होसबाले जी ने समाज को केवल सोचने के बजाय ‘करने’ की ओर प्रेरित किया। रांची की यह बैठक इस बात का प्रमाण है कि हिंदू समाज अब अपनी कमियों को स्वीकार करने और उन्हें सुधारने के लिए तैयार है।
संवाद 24 की दृष्टि में प्रमुख निष्कर्ष:
- धर्मरक्षा के लिए समाज का जागरूक होना अनिवार्य है।
- जातिवाद के जहर का इलाज आपसी प्रेम और सहभागिता है।
- तकनीक का मुकाबला केवल प्राचीन संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों से ही किया जा सकता है।
- देश की आंतरिक सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन के लिए घुसपैठ और धर्मांतरण पर सामूहिक प्रहार आवश्यक है।
यह लेख ‘संवाद 24’ के पाठकों के लिए एक आह्वान है कि वे समाज की इस जंजीर की एक मजबूत कड़ी बनें। जैसा कि सरकार्यवाह जी ने कहा “हम सभी हिंदू हैं, यह भाव ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।” क्या आप अपने क्षेत्र में सामाजिक समरसता के लिए किसी विशेष प्रयास का हिस्सा हैं? हमें कमेंट में बताएं और इस विचार को साझा करें।






