पुत्रदा एकादशी : संतान-सुख और धर्मबुद्धि का पावन व्रत

संवाद 24 आचार्य मधुसूदन अग्निहोत्री। सनातन वैदिक परंपरा में एकादशी व्रत को समस्त व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। इन्हीं में से पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को “पुत्रदा एकादशी” कहा गया है, जो संतान-सुख, वंश-परंपरा और पितृ-ऋण से मुक्ति का प्रतीक मानी जाती है।

???? पुत्रदा एकादशी : 30 दिसंबर, मंगलवार
⏳ पारण : अगले दिन सूर्योदय के पश्चात

शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु का पूजन, व्रत और जागरण विशेष फलदायी होता है।

????️ पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा
महाभारत काल में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर जिज्ञासा प्रकट की हे मधुसूदन! कृपा कर पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का माहात्म्य बताइए।
इस एकादशी का नाम क्या है, इसका विधान क्या है और इसका फल क्या है?

अर्जुन की जिज्ञासा पर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे अर्जुन! पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी पुत्रदा कहलाती है। इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान श्रीहरि का पूजन करने से संतान-सुख, धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती है।”

कथा
प्राचीन काल में भद्रावती नामक नगरी में राजा सुकेतुमान राज्य करता था। राजा धर्मपरायण, दानी और यज्ञशील था, किंतु वह संतानहीन था। पुत्र न होने के कारण वह न केवल सांसारिक दुःख में था, बल्कि उसे यह भी चिंता सताती थी कि उसके बाद पितरों का तर्पण कौन करेगा।राजा अनेक उपायों के बाद भी संतान प्राप्त न होने से अत्यंत व्यथित रहने लगा।एक दिन दुःखी मन से वह वन की ओर निकल पड़ा।वन में विचरण करते हुए उसने देखा कि प्रत्येक प्राणी अपने परिवार सहित सुखपूर्वक जीवन जी रहा है। यह दृश्य उसके दुःख को और बढ़ा गया। वन में एक पवित्र सरोवर के तट पर राजा की भेंट तपस्वी ऋषियों से हुई।

ऋषियों ने राजा की व्यथा जानकर कहा हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। यदि तुम विधिपूर्वक इस व्रत का पालन करोगे, तो भगवान श्रीहरि की कृपा से अवश्य पुत्र-प्राप्ति होगी। राजा ने श्रद्धा सहित पुत्रदा एकादशी का व्रत किया, रात्रि जागरण किया और द्वादशी को विधिपूर्वक पारण किया। भगवान विष्णु की कृपा से कुछ समय बाद रानी ने गर्भ धारण किया और एक तेजस्वी, धर्मनिष्ठ पुत्र का जन्म हुआ। वह पुत्र आगे चलकर प्रजापालक, वीर और यशस्वी राजा बना।

कथा का संदेश
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा हे पाण्डुनंदन! जो व्यक्ति श्रद्धा और विधि से पुत्रदा एकादशी का व्रत करता है, उसे केवल पुत्र ही नहीं, बल्कि सुपुत्र, धर्म, यश और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।”

कथा-सार
पुत्र का होना ही नहीं, सुपुत्र का होना जीवन की सच्ची सिद्धि है।
सुपुत्र वही होता है जो धर्म, संस्कार और कर्तव्य को समझे।
सनातन धर्म में पुत्रदा एकादशी को इसलिए विशेष महत्व दिया गया है, क्योंकि यह व्रत केवल संतान-सुख नहीं, बल्कि वंश की मर्यादा और संस्कारों की रक्षा का माध्यम है।

आज के समय में यह व्रत हमें याद दिलाता है कि संतान ईश्वर की देन है, और संस्कार मानव का दायित्व।

Samvad 24 Office
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