एकादशी व्रत में क्या करें, क्या न करें : शास्त्रीय निर्देश
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संवाद 24 आचार्य मधुसूदन अग्निहोत्री। सनातन परंपरा में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। विशेष रूप से पौष मास की कृष्ण पक्ष की सफला एकादशी भगवान श्रीहरि विष्णु को शीघ्र प्रसन्न करने वाली बताई गई है। पुराणों में इस व्रत की विधि, आहार–विहार तथा आचरण संबंधी नियम स्पष्ट रूप से वर्णित हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण (ब्रह्म खंड 27.29–34) के अनुसार एकादशी को शिम्बी (सेम) का सेवन संतान के लिए अशुभ बताया गया है।
एकादशी व्रत में करणीय कर्म
- एकादशी के दिन लकड़ी का दातुन या टूथपेस्ट प्रयोग न करें।
नींबू, जामुन या आम के स्वयं गिरे हुए पत्ते चबाकर कंठ शुद्ध करें। वृक्ष से पत्ता तोड़ना वर्जित है। - प्रातः स्नान के पश्चात श्रीमद्भगवद्गीता पाठ एवं विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
शास्त्रों में कहा गया है कि नियमित विष्णु सहस्रनाम पाठ से गृहस्थ जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। - एकादशी को द्वादशाक्षर मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” अथवा अपने गुरुमंत्र का जप करना विशेष फलदायी है।
- यथा संभव मौन धारण करें और दुराचारी, पाखंडी अथवा नकारात्मक प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों से संवाद से बचें।
- एकादशी के दिन चावल का सेवन पूर्णतः वर्जित है, न स्वयं खाएं और न किसी को खिलाएं।
- फलाहार, दूध, जल अथवा ताजे फल का रस ग्रहण करना शास्त्रसम्मत है।
एकादशी व्रत में निषिद्ध वस्तुएँ
- दशमी, एकादशी और द्वादशी इन तीन दिनों में कांसे के पात्र, मांस, प्याज, लहसुन, मसूर, उड़द, चना, कोदो, शाक, शहद, तेल तथा अत्यधिक जलपान का त्याग करें।
- फलाहारी व्यक्ति भी गोभी, गाजर, शलजम, पालक, कुलफा जैसे शाकों का सेवन न करें।
- आम, अंगूर, केला, बादाम, पिस्ता आदि को “अमृत फल” माना गया है।
- जुआ, अधिक निद्रा, पान, परनिंदा, चुगली, चोरी, हिंसा, मैथुन, क्रोध, असत्य और कपट से पूर्णतः दूर रहें।
- भूलवश यदि किसी निंदक से संवाद हो जाए तो सूर्य दर्शन, धूप-दीप से श्रीहरि पूजन कर क्षमा याचना करें।
- एकादशी के दिन घर में झाड़ू न लगाएं, जिससे सूक्ष्म जीवों की हिंसा न हो।
- इस दिन बाल या नाखून नहीं कटवाने चाहिए।
- यथाशक्ति अन्नदान करें, किंतु स्वयं किसी का दिया हुआ अन्न ग्रहण न करें।
रात्रि जागरण का विशेष महत्व
- एकादशी की रात्रि में भगवान श्रीविष्णु के समक्ष रात्रि 1 बजे तक जागरण करना श्रेष्ठ माना गया है।
- जागरण के समय श्रीहरि के समीप दीप प्रज्वलन करने वाले का पुण्य सौ कल्पों तक अक्षय रहता है—ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।
इन शास्त्रीय विधियों से किया गया सफला एकादशी व्रत मनुष्य को पापक्षय, गृहशांति, पुण्यवृद्धि और अंततः मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है।






