एकादशी पर चावल का त्याग क्यों?
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संवाद 24 आचार्य मधुसूदन अग्निहोत्री। सनातन धर्म में एकादशी व्रत को ‘व्रतों का राजा’ कहा गया है। भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित इस दिन मन, कर्म और वचन की शुद्धि पर विशेष बल दिया जाता है। लेकिन एक प्रश्न अक्सर पाठकों के मन में उठता है “एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित क्यों है?” संवाद 24 की इस विशेष रिपोर्ट में हम महर्षि मेधा की पौराणिक कथा और चंद्रमा के वैज्ञानिक प्रभाव के माध्यम से इस रहस्य को उजागर कर रहे हैं।
महर्षि मेधा का बलिदान: जब देह बनी ‘जीव’ का आधार
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार माता शक्ति के प्रचंड क्रोध से स्वयं की रक्षा करने के लिए महान तपस्वी महर्षि मेधा ने अपने योग बल से शरीर का त्याग कर दिया। उनकी ‘मेधा’ (बुद्धि और प्राण शक्ति) पृथ्वी में समा गई। कालांतर में, उसी स्थान से जौ और चावल उत्पन्न हुए।
शास्त्रों के अनुसार, जिस दिन महर्षि की देह भूमि में समाई थी, वह एकादशी तिथि थी। चूंकि ये अनाज महर्षि के शरीर के अंश से जन्मे हैं, इसलिए इन्हें ‘जीव’ माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल ग्रहण करना महर्षि मेधा के मांस और रक्त के सेवन के समान पापकारी माना जाता है।
वैज्ञानिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण: चंद्रमा, जल और मन का संबंध। केवल धार्मिक ही नहीं, एकादशी पर चावल न खाने के पीछे गहरा वैज्ञानिक और ज्योतिषीय तर्क भी है:
- जल तत्व और चंद्रमा: चावल में जल की मात्रा सर्वाधिक होती है। ज्योतिष शास्त्र में जल का स्वामी चंद्रमा है, जो सीधे हमारे ‘मन’ को प्रभावित करता है।
- मन की चंचलता: एकादशी के दिन चंद्रमा की स्थिति ऐसी होती है कि वह शरीर के जल तत्वों को अधिक आकर्षित करता है। यदि हम चावल खाते हैं, तो शरीर में जल बढ़ता है, जिससे मन विचलित और चंचल हो जाता है। साधना और व्रत के लिए एकाग्रता आवश्यक है, जिसे चावल का सेवन बाधित कर सकता है।
- स्वास्थ्य लाभ: आयुर्वेद के अनुसार चावल एक ‘तामसिक’ और भारी भोजन है जो आलस्य पैदा करता है。 एकादशी पर पाचन तंत्र को विश्राम देना और विषैले तत्वों (Detoxification) को बाहर निकालना मुख्य उद्देश्य होता है।
आध्यात्मिक चेतावनी और समाधान
शास्त्रों में यहाँ तक कहा गया है कि एकादशी को चावल खाने वाला प्राणी अगले जन्म में रेंगने वाले जीव (सरीसृप) की योनि में जन्म पाता है। हालांकि, द्वादशी के दिन पुनः चावल ग्रहण करने से इस दोष से मुक्ति का मार्ग भी बताया गया है
विशेष तथ्य: आज भी यह देखा जाता है कि जौ और चावल को अंकुरित होने के लिए मिट्टी की अनिवार्य आवश्यकता नहीं होती; केवल जल के छींटे मात्र से ये जीवंत हो उठते हैं। इनकी इसी ‘जीव’ रूपी प्रकृति के कारण एकादशी पर इन्हें ग्रहण करने से परहेज की सलाह दी जाती है।
अध्यात्म बोध – एकादशी का व्रत केवल भूखा रहने का नाम नहीं, बल्कि इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने का अनुशासन है। चावल का त्याग हमें यह सिखाता है कि कैसे छोटे-छोटे संयम हमारे मन को स्थिर कर हमें ईश्वर के सानिध्य में ले जाते हैं।
नोट: यह लेख पद्म पुराण, विष्णु पुराण और भविष्य पुराण के संदर्भों पर आधारित है







