अर्जुन के प्रश्न से निकली मोक्ष की राह, षट्तिला एकादशी का माहात्म्य
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संवाद 24 आचार्य मधुसूदन अग्निहोत्री। सनातन धर्म में एकादशी व्रत को पाप-नाश, आत्मशुद्धि और मोक्षप्राप्ति का श्रेष्ठ साधन माना गया है। विशेष रूप से माघ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली षट्तिला एकादशी दान, तप, संयम और करुणा का अद्भुत संगम है। यह एकादशी केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि तिल के माध्यम से किए गए छह प्रकार के धार्मिक कर्मों (स्नान, उबटन, तर्पण, हवन, भोजन और दान) के कारण इसे षट्तिला कहा गया है।
इस व्रत का माहात्म्य स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन और नारद मुनि को सुनाया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि केवल उपवास नहीं, दान के बिना धर्म अधूरा है। आइए, शास्त्रसम्मत षट्तिला एकादशी की पावन कथा का पाठ करें –
षट्तिला एकादशी व्रत कथा
भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से एकादशियों का माहात्म्य सुनकर
श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम करते हुए अर्जुन ने कहा, हे केशव! आपके श्रीमुख से एकादशियों की कथाएँ सुनकर मुझे अपार आनंद की प्राप्ति हुई है। हे मधुसूदन! कृपाकर अन्य एकादशियों का माहात्म्य भी कहिए। भगवान श्रीकृष्ण बोले, हे अर्जुन! अब मैं माघ मास के कृष्ण पक्ष की षट्तिला एकादशी का माहात्म्य सुनाता हूँ।
दालभ्य और पुलस्त्य ऋषि संवाद
एक समय दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा हे महामुने! मनुष्य क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और अज्ञानवश ब्रह्महत्या जैसे महापाप कर बैठता है। ऐसे पापों से मुक्ति का उपाय क्या है, जिससे नरक की यातना से बचा जा सके?
पुलस्त्य ऋषि बोले हे मुनिवर! तुमने अत्यंत गूढ़ प्रश्न किया है। माघ मास में मनुष्य को इंद्रियों पर संयम रखते हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार का त्याग करना चाहिए। उन्होंने बताया कि पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास और तिल से उपले बनाकर 108 आहुतियों का हवन करना चाहिए। मूल नक्षत्र युक्त एकादशी पर श्रीहरि का पूजन, कीर्तन और उपवास करना चाहिए। रात्रि जागरण और अगले दिन विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। खिचड़ी का भोग लगाकर तिल, पात्र, वस्त्र और घड़े का दान करना चाहिए। उन्होंने कहा मनुष्य जितने तिलों का दान करता है,उतने ही सहस्र वर्ष वह स्वर्ग में वास करता है।
षट्तिला का शास्त्रीय अर्थ
षट्तिला एकादशी में तिल का प्रयोग छः रूपों में किया जाता है—
- तिल स्नान
- तिल का उबटन
- तिलोदक (तिल मिश्रित जल)
- तिल से हवन
- तिल का भोजन
- तिल का दान
इन्हीं छह कारणों से यह एकादशी षट्तिला कहलाती है।
नारद मुनि और भगवान विष्णु संवाद
नारद मुनि ने भगवान श्रीहरि से पूछा हे प्रभु! षट्तिला एकादशी का पुण्य और उसकी कथा क्या है? भगवान विष्णु बोले एक समय मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी जो निरंतर व्रत-उपवास करती थी, परंतु उसने कभी अन्नदान नहीं किया।भगवान ने भिक्षा मांगने पर उसे केवल मिट्टी का पिंड दिया।स्वर्ग में उसे घर तो मिला,परंतु वह धन-धान्य से रिक्त था।
कारण पूछने पर भगवान ने कहा तुमने व्रत किए,परंतु दान नहीं किया। देव-स्त्रियों से षट्तिला एकादशी का माहात्म्य जानकर उस ब्राह्मणी ने विधिपूर्वक व्रत किया और उसके घर में संपूर्ण ऐश्वर्य की प्राप्ति हुई।
कथा-सार (निष्कर्ष)
केवल उपवास से धर्म पूर्ण नहीं होता दान, विशेषकर अन्न और तिल का दान, अनिवार्य है। षट्तिला एकादशी पापों का नाश करती है।निरोगता और समृद्धि देती है।जन्म-जन्मांतर के कष्टों से मुक्ति दिलाती है दान के बिना धर्म निष्फल है यही षट्तिला एकादशी का शाश्वत संदेश है।







