बालगृह में किशोरी का आत्महत्या का प्रयास: मानसिक स्वास्थ्य और संरक्षण की जरूरत पर सवाल
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संवाद 24 संवाददाता। नवाबगंज थाना क्षेत्र के सूर्य विहार में स्थित राजकीय बालगृह बालिका (यूनिट-2) में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। छह महीने पहले कन्नौज जनपद से आई 16 वर्षीय किशोरी ने जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या करने का प्रयास किया। हालत बिगड़ने पर उसे तुरंत महिला सुरक्षा कर्मी दीपमाला के साथ एलएलआर अस्पताल के बाल रोग विभाग में भर्ती कराया गया, जहां वह बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. यशवंत राव की निगरानी में इमरजेंसी वार्ड में उपचाराधीन है।
यह घटना न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि सरकारी बाल संरक्षण गृहों में रहने वाली किशोरियों की मानसिक स्थिति और देखभाल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। राजकीय बालगृह बालिका ऐसे संस्थान हैं जहां अदालत के आदेश पर या संरक्षण की आवश्यकता वाली बालिकाओं को रखा जाता है। अक्सर ये किशोरियां पारिवारिक कलह, शोषण या अन्य सामाजिक समस्याओं का शिकार होकर यहां पहुंचती हैं। कन्नौज से आई यह किशोरी भी शायद ऐसी ही परिस्थितियों से गुजर रही थी, जिसके कारण वह यहां भेजी गई। लेकिन छह महीने बाद आत्महत्या का प्रयास यह संकेत देता है कि संस्थान में उनकी मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल पर्याप्त नहीं हो रही।
भारत में बाल संरक्षण गृहों में रहने वाले बच्चों और किशोरों में अवसाद, चिंता और आत्मघाती प्रवृत्ति के मामले बढ़ते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन संस्थानों में काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता और परिवार से नियमित संपर्क की कमी प्रमुख कारण हैं। कानपुर के इस बालगृह में पहले भी किशोरियों के भागने या अन्य समस्याओं की खबरें आती रही हैं, जो व्यवस्था की कमियों को उजागर करती हैं।
यह घटना प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक चेतावनी है। बालगृहों में न केवल भौतिक सुविधाएं, बल्कि भावनात्मक समर्थन भी जरूरी है। किशोरी की जान बच गई है, लेकिन उसकी मानसिक पीड़ा को समझने और दूर करने की जरूरत है। सरकार को ऐसे संस्थानों में मनोचिकित्सकों की नियुक्ति, नियमित काउंसलिंग सेशन और परिवार पुनर्मिलन कार्यक्रमों को मजबूत करना चाहिए। साथ ही, समाज को भी इन अनाथ या संरक्षण में रहने वाली बालिकाओं के प्रति संवेदनशील होना होगा।






