कानपुर: राष्ट्रीय सुरक्षा के रडार पर 16 बस्तियां; 1000 संदिग्ध घुसपैठियों की पहचान से हड़कंप
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संवाद 24 संजीव सोमवंशी। उत्तर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी कानपुर अब आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से एक संवेदनशील केंद्र बन गया है। हाल ही में हुए एक व्यापक सर्वेक्षण और खुफिया जांच में शहर की 16 बस्तियों में 1000 से अधिक ऐसे संदिग्ध लोगों की पहचान की गई है, जिनके तार बांग्लादेश और म्यांमार से जुड़े होने की आशंका है। ये संदिग्ध पश्चिम बंगाल और झारखंड के पते वाले दस्तावेजों के आधार पर यहां रह रहे हैं। प्रशासन ने अब ‘डिटेंशन सेंटर’ बनाने की तैयारी शुरू कर दी है।
खतरे की घंटी और प्रशासन की नींद
कानपुर, जो अपनी मिलों, चमड़ा उद्योग और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है, आज एक गंभीर सुरक्षा चुनौती का सामना कर रहा है। शहर की घनी आबादी और मिश्रित संस्कृति की आड़ में अवैध अप्रवासियों ने अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दी हैं। खुफिया एजेंसियों और पुलिस विभाग द्वारा चलाए गए एक विशेष अभियान ने चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं। शहर की 16 विशिष्ट बस्तियों में एक हजार से अधिक ऐसे लोग रह रहे हैं जो संदिग्ध हैं।
यह मामला केवल अवैध निवास का नहीं है, बल्कि यह ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ (National Security) से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा है। इन लोगों के पास से जो दस्तावेज मिले हैं, वे स्थानीय नहीं हैं, बल्कि झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम जैसे सीमावर्ती राज्यों के हैं। यह इस बात का संकेत है कि घुसपैठ का यह नेटवर्क कितना गहरा और व्यवस्थित है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त निर्देशों के बाद, अब प्रशासन ने कमर कस ली है और एक निर्णायक कार्रवाई की रूपरेखा तैयार की जा रही है।
जांच का दायरा: 16 बस्तियां और ‘झारखंड-बंगाल कनेक्शन‘
इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक पहलू ‘दस्तावेजों का खेल’ है। जांच के दौरान पुलिस और खुफिया विभाग (LIU) ने पाया कि इन संदिग्धों ने भारतीय नागरिकता सिद्ध करने के लिए जो आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र दिखाए हैं, वे कानपुर के नहीं हैं।
दस्तावेजों की पहेली:
- अधिकांश संदिग्धों के पास पश्चिम बंगाल और झारखंड के पते वाले पहचान पत्र मिले हैं।
- कुछ मामलों में असम के दस्तावेजों का भी पता चला है।
- हैरानी की बात यह है कि ये लोग वर्षों से कानपुर में रह रहे हैं, लेकिन इनके दस्तावेज दूसरे राज्यों के हैं।
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि घुसपैठिए अक्सर सीमावर्ती राज्यों (जैसे बंगाल और असम) में दलालों के माध्यम से फर्जी दस्तावेज बनवाते हैं और फिर रोजगार की तलाश या पहचान छिपाने के लिए उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के भीतरी शहरों (Hinterland) में बस जाते हैं। कानपुर, एक बड़ा औद्योगिक शहर होने के नाते, उन्हें छिपने और आजीविका कमाने का एक आसान मौका देता है।
सत्यापन की चुनौती:
प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन दस्तावेजों की सत्यता की जांच करना है। कानपुर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने संबंधित राज्यों (बंगाल और झारखंड) के जिलाधिकारियों (DMs) को पत्र भेजकर इन दस्तावेजों का सत्यापन (Verification) करने का अनुरोध किया है।
- यदि संबंधित राज्यों से सत्यापन रिपोर्ट सकारात्मक नहीं आती है, या दस्तावेजों का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता है, तो यह माना जाएगा कि दस्तावेज फर्जी हैं।
- अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि पत्राचार से जवाब मिलने में देरी होती है, तो कानपुर से विशेष जांच टीमें उन राज्यों में भेजकर भौतिक सत्यापन करेंगी।
- मुख्यमंत्री का कड़ा रुख और डिटेंशन सेंटर की योजना
इस कार्रवाई में तेजी आने का मुख्य कारण प्रदेश सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति है। हाल ही में दिल्ली में हुए बम धमाकों और देश के विभिन्न हिस्सों में सुरक्षा इनपुट मिलने के बाद, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घुसपैठियों के खिलाफ अभियान को तेज करने का निर्देश दिया है।
अस्थायी डिटेंशन सेंटर (Detention Centers):
मुख्यमंत्री ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि अवैध घुसपैठियों को रखने के लिए हर जिले में ‘अस्थायी डिटेंशन सेंटर’ स्थापित किए जाएं।
- उद्देश्य: जब तक संदिग्धों की नागरिकता की पूरी जांच नहीं हो जाती या उन्हें उनके देश (बांग्लादेश/म्यांमार) वापस भेजने (Deportation) की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, उन्हें आम आबादी से अलग इन सेंटरों में रखा जाएगा।
- निगरानी: इन केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी होगी ताकि संदिग्ध भाग न सकें। कानपुर प्रशासन ने इस आदेश के बाद अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। जिन 1000 संदिग्धों को चिह्नित किया गया है, उनके दस्तावेजों के खारिज होते ही उन्हें डिटेंशन सेंटर भेजने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
केस स्टडी 1: बड़ा चौराहा और रोहिंग्या नेटवर्क का खुलासा
घुसपैठ की यह समस्या केवल कागजी नहीं है, बल्कि इसके जीते-जागते सबूत भी मिले हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मई 2024 में सामने आया था।
घटनाक्रम:
20 मई की रात को कानपुर के व्यस्ततम इलाके ‘बड़ा चौराहा’ पर पुलिस ने एक ऑटो चालक को रोका। सामान्य पूछताछ में उसने अपनी पहचान भारतीय बताई, लेकिन गहन जांच में उसकी असली पहचान सामने आ गई।
- नाम: मोहम्मद साहिल।
- मूल निवास: म्यांमार (बर्मा) के साइडुय मंगडो शहर का कयंम डेंग सिद्दर फरा गांव।
- स्थिति: वह एक रोहिंग्या था।
हैरान करने वाले तथ्य:
पुलिस की पूछताछ में पता चला कि साहिल वर्ष 2017 से अपने परिवार के साथ शुक्लागंज के शक्तिनगर इलाके में रह रहा था। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उसके पास भारतीय दस्तावेज भी थे। - जांच में खुलासा हुआ कि एक पूर्व सभासद ने गलत तरीके से और नियमों को ताक पर रखकर उसके और उसके परिवार के दस्तावेज बनवाए थे।
- यह घटना यह दर्शाती है कि कैसे स्थानीय स्तर पर कुछ लोग चंद रुपयों या वोट बैंक के लालच में राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ करते हैं। कोतवाली पुलिस ने साहिल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। उसकी निशानदेही पर शुक्लागंज पुलिस ने बाद में उसके परिवार के अन्य सदस्यों को भी गिरफ्तार किया। साहिल अभी भी जेल में है और उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही चल रही है। यह गिरफ्तारी इस बात का प्रमाण है कि खुफिया तंत्र अब कितना सक्रिय हो चुका है।
- केस स्टडी 2: पुलिस लाइन और ‘अवैध कब्जे’ बनाम ‘घुसपैठ‘
जांच अभियान के दौरान प्रशासन को सतर्कता के साथ-साथ विवेक का भी इस्तेमाल करना पड़ रहा है, ताकि निर्दोष लोग परेशान न हों। इसका एक उदाहरण पुलिस लाइन के पास बनी बस्ती में देखने को मिला।
क्या था मामला?
अधिकारियों को सूचना मिली थी कि पुलिस लाइन की दीवार से सटी एक बस्ती में पिछले 40 वर्षों से रह रहे लगभग 20 परिवार रोहिंग्या हो सकते हैं। यह सूचना अत्यंत संवेदनशील थी क्योंकि पुलिस लाइन शहर की सुरक्षा का केंद्र है।
जांच का परिणाम: - प्रशासन ने तुरंत इन 20 परिवारों की गहन जांच (Screening) कराई।
- दस्तावेजों के सत्यापन और बैकग्राउंड चेक के बाद यह पुष्टि हुई कि ये लोग रोहिंग्या या विदेशी घुसपैठिए नहीं हैं।
नया मोड़:
भले ही वे विदेशी घुसपैठिए नहीं निकले, लेकिन जांच में यह स्पष्ट हो गया कि वे वहां अवैध रूप से रह रहे थे। उन्होंने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण (Encroachment) किया हुआ था। - चूंकि वे विदेशी नागरिक नहीं थे, इसलिए उन्हें डिटेंशन सेंटर नहीं भेजा जा सकता था।
- लेकिन, सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे को देखते हुए, प्रशासन ने नगर निगम को पत्र लिखा है। अब नगर निगम इन अवैध निर्माणों को हटाने की कार्यवाही करेगा।
यह मामला यह स्पष्ट करता है कि प्रशासन ‘विदेशी घुसपैठ’ और ‘स्थानीय अतिक्रमण’ के बीच स्पष्ट अंतर रखकर कार्यवाही कर रहा है।
आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती: एक विश्लेषण
कानपुर में 1000 से अधिक संदिग्धों का मिलना केवल एक स्थानीय समाचार नहीं है, यह भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
- जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Change):
बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों के एक स्थान पर बसने से स्थानीय जनसांख्यिकी में बदलाव आता है। इससे सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ता है और कई बार स्थानीय संसाधनों पर दबाव को लेकर संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है। - स्लीपर सेल्स का खतरा:
सुरक्षा एजेंसियों को हमेशा यह आशंका रहती है कि भीड़-भाड़ वाली बस्तियों में छिपे अवैध प्रवासी राष्ट्रविरोधी तत्वों या आतंकी संगठनों के लिए ‘स्लीपर सेल’ का काम कर सकते हैं। दिल्ली बम धमाके के बाद यह आशंका और भी प्रबल हो गई है। - पहचान का संकट:
संदिग्धों की शकल-सूरत, भाषा और रहन-सहन भारतीय नागरिकों (विशेषकर बंगाल और असम के लोगों) से काफी मिलता-जुलता है। इसी समानता का फायदा उठाकर वे भीड़ में घुल-मिल जाते हैं। जांच अधिकारियों के लिए असली और नकली में फर्क करना भूसे में सुई खोजने जैसा होता है।
आगे की राह: सत्यापन और कार्यवाही
आने वाले दिनों में कानपुर में यह अभियान और भी तेज होने वाला है। प्रशासन की कार्ययोजना निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित है: - अंतरराज्यीय समन्वय: पश्चिम बंगाल और झारखंड की सरकारों के साथ समन्वय स्थापित कर दस्तावेजों की सत्यता जांची जाएगी। जिन लोगों के दस्तावेज फर्जी पाए जाएंगे, उन्हें तत्काल प्रभाव से हिरासत में लिया जाएगा।
- स्थानीय मददगारों पर नकेल: साहिल (रोहिंग्या) के मामले में जैसे पूर्व सभासद की भूमिका सामने आई थी, वैसे ही अन्य मामलों में भी उन दलालों और स्थानीय लोगों की पहचान की जाएगी जो चंद पैसों के लिए फर्जी दस्तावेज बनवाते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ देशद्रोह या धोखाधड़ी की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज हो सकता है।
- जन-जागरूकता: पुलिस अब मकान मालिकों से भी अपील कर रही है कि वे किसी भी किरायेदार को रखने से पहले उसका पुलिस सत्यापन (Police Verification) अवश्य कराएं।
- तकनीक का सहारा: संदिग्धों के बायोमेट्रिक्स का मिलान राष्ट्रीय डेटाबेस से करने की भी योजना है ताकि यह पता चल सके कि क्या वे पहले किसी और राज्य में अपराध में लिप्त रहे हैं।
कानपुर की 16 बस्तियों में 1000 संदिग्ध घुसपैठियों की पहचान एक बड़ी प्रशासनिक सफलता है, लेकिन यह एक लंबी लड़ाई की शुरुआत भी है। यह अभियान न केवल अवैध प्रवास को रोकने के लिए है, बल्कि शहर और देश की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए भी है।
जहां एक ओर सरकार का रुख स्पष्ट है कि किसी भी विदेशी नागरिक को अवैध रूप से भारत में रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी, वहीं दूसरी ओर प्रशासन यह सुनिश्चित करने में भी लगा है कि जांच पारदर्शी हो और किसी वैध भारतीय नागरिक को परेशानी न हो। पुलिस लाइन वाला प्रकरण प्रशासन की इसी निष्पक्षता का सबूत है।
आने वाले हफ्तों में, जब बंगाल और झारखंड से सत्यापन रिपोर्टें आएंगी, तब स्थिति और स्पष्ट होगी। तब तक, कानपुर की खुफिया एजेंसियां और पुलिस हाई अलर्ट पर हैं, और शहर में सुरक्षा का एक अभूतपूर्व पहरा बैठा दिया गया है। यह ‘क्लीन-अप’ अभियान उत्तर प्रदेश में आंतरिक सुरक्षा के एक नए अध्याय की तरह देखा जा रहा है।






