कानपुर में आवारा कुत्तों की दहशत: हर दिन बढ़ता खतरा, सवालों के घेरे में नगर निगम की व्यवस्था

संवाद 24 संवाददाता। शहर में आवारा कुत्तों का आतंक अब एक गंभीर जन-सुरक्षा संकट बन चुका है। हालात ऐसे हैं कि रोजाना करीब 90 से 100 लोग कुत्तों के हमले का शिकार हो रहे हैं। गली-मोहल्लों से लेकर मुख्य सड़कों तक, लोग दहशत के साए में जीने को मजबूर हैं। बीते वर्ष पालतू कुत्ते के हमले में एक महिला की मौत ने इस समस्या की भयावहता को और उजागर कर दिया था।

नगर निगम के आंकड़ों के मुताबिक शहर में करीब सवा लाख आवारा कुत्ते हैं। सुबह-शाम टहलना, बच्चों का स्कूल जाना और बुजुर्गों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है। कई इलाकों में लोग लाठी और डंडे लेकर चलने को मजबूर हैं, फिर भी हमलों से राहत नहीं मिल पा रही।

हर्जाने की तैयारी, सरकार पर बढ़ेगा आर्थिक बोझ
कुत्तों के काटने की घटनाओं को लेकर अब हर्जाना तय करने की तैयारी भी चल रही है। यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो सरकार को रोजाना लाखों रुपये का मुआवजा देना पड़ सकता है। यह न सिर्फ प्रशासनिक विफलता को उजागर करेगा, बल्कि सरकारी खजाने पर भी भारी बोझ डालेगा।

नगर निगम की कार्रवाई पर सवाल
नगर निगम का दावा है कि आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए बंध्याकरण अभियान चलाया जा रहा है। किशनपुर जाजमऊ और फूलबाग में बने एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) सेंटरों में प्रतिदिन करीब 80 कुत्तों का बंध्याकरण किया जा रहा है। अब तक लगभग 36 हजार कुत्तों की नसबंदी हो चुकी है और शेल्टर होम की व्यवस्था भी की गई है।

लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। दर्शनपुरवा, रामबाग, गांधीनगर, निराला नगर, रावतपुर, विकासनगर, विनायकपुर, श्याम नगर, पी रोड, नेहरू नगर, रामकृष्ण नगर जैसे इलाकों में कुत्तों का झुंड खुलेआम घूम रहा है। यहां आए दिन हमले हो रहे हैं, जिससे लोग घरों में कैद होकर रह गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश और असमंजस
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार नगर निगम जहां से कुत्तों को पकड़ता है, बंध्याकरण के बाद उन्हें उसी स्थान पर छोड़ना होता है। हालांकि 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि अस्पतालों, स्कूलों, कोचिंग संस्थानों, मंडियों, रेलवे स्टेशनों और बस डिपो जैसे संवेदनशील स्थानों से कुत्तों को हटाया जाए।
इस दोहरे आदेश के बीच नगर निगम असमंजस की स्थिति में नजर आ रहा है। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. आरके निरंजन का कहना है कि मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और अंतिम फैसला आने के बाद ही आगे की कार्रवाई स्पष्ट हो सकेगी।

समाधान की दरकार
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बंध्याकरण से समस्या का तात्कालिक समाधान संभव नहीं है। इसके लिए कचरा प्रबंधन, खुले में मांस-अवशेषों पर रोक, शेल्टर होम की क्षमता बढ़ाने और संवेदनशील क्षेत्रों को ‘डॉग-फ्री जोन’ घोषित करने जैसे ठोस कदम जरूरी हैं।

कुल मिलाकर, कानपुर में आवारा कुत्तों की समस्या अब सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं रही, बल्कि आमजन की जान से जुड़ा सवाल बन चुकी है। जब तक ठोस और प्रभावी नीति लागू नहीं होती, तब तक शहरवासियों को इस दहशत के साथ ही जीना पड़ेगा।

Pavan Singh
Pavan Singh

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