कानपुर नगर निगम में नियमों की अनदेखी: बिना ई-टेंडर 30 लाख के काम, अब भुगतान के लिए जोड़-तोड़
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संवाद 24 संवाददाता। कानपुर नगर निगम में एक बार फिर सरकारी प्रक्रियाओं को दरकिनार करने का मामला सामने आया है। पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लागू की गई ई-टेंडर व्यवस्था को नजरअंदाज करते हुए जोन-पांच में लगभग 30 लाख रुपये से अधिक के विकास कार्य बिना किसी ई-टेंडर प्रक्रिया के ही करा दिए गए। अब जब भुगतान का समय आया, तो नियमों को बाद में पूरा करने के लिए टेंडर प्रक्रिया कराने की तैयारी की जा रही है, जो पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
नियम पहले, काम बाद में…यहां उलटा चला खेल
सरकारी व्यवस्था के तहत किसी भी विकास कार्य के लिए पहले ई-टेंडर, फिर वर्क ऑर्डर और उसके बाद निर्माण कार्य होना चाहिए। इसका उद्देश्य यह होता है कि काम प्रतिस्पर्धी दरों पर, तय मानकों और गुणवत्ता के साथ हो। लेकिन जोन-पांच में इस पूरी प्रक्रिया को उलट दिया गया। सचान चौराहा नहर से दबौली वेस्ट तक छठ पूजा स्थलों से जुड़े कई कार्य बिना टेंडर के ही पूरे करा दिए गए।
गुणवत्ता पर भी उठे सवाल
नियमों की अनदेखी का असर काम की गुणवत्ता में भी साफ नजर आ रहा है। गोपालनगर और सीटीआई नहर घाट पर लगाए गए पत्थर जगह-जगह से उखड़ने लगे हैं। कई घाटों पर लगाई गई स्टील रेलिंग इतनी कमजोर है कि हल्का सा दबाव पड़ते ही हिलने लगती है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि घटिया सामग्री का इस्तेमाल कर जल्दबाजी में काम निपटाया गया, ताकि भुगतान का रास्ता साफ किया जा सके।
रिश्तेदारों को काम देने के आरोप
इस पूरे प्रकरण में पक्षपात के आरोप भी लगे हैं। चर्चा है कि कई काम जनप्रतिनिधियों के रिश्तेदारों और करीबी लोगों को सौंपे गए। अगर इन आरोपों की जांच होती है, तो मामला केवल प्रक्रियागत लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हितों के टकराव और भ्रष्टाचार की आशंका भी गहराएगी।
सिल्ट ने बढ़ाई घाटों की परेशानी
स्थिति तब और बिगड़ गई जब सिंचाई विभाग द्वारा नहर की सफाई से निकली सिल्ट को नगर निगम ने उन्हीं घाटों पर डंप कर दिया, जिन्हें हाल ही में बनाया गया था। इससे घाटों की हालत खराब हो गई और रास्तों पर सिल्ट जमा होने से यातायात भी प्रभावित हो रहा है। यह लापरवाही विकास कार्यों की योजना और समन्वय की कमी को उजागर करती है।
‘आपात स्थिति’ का तर्क
जोन-पांच के अधिशासी अभियंता कमलेश पटेल का कहना है कि छठ पूजा के दौरान आपात स्थिति थी, इसलिए जल्दबाजी में काम कराए गए। भुगतान की प्रक्रिया के लिए अब री-टेंडरिंग कराई जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आपात स्थिति के नाम पर नियमों को पूरी तरह दरकिनार करना उचित है, और क्या बाद में टेंडर कराकर पहले से हुए कार्यों को वैध ठहराया जा सकता है?
खर्च का ब्योरा
विभिन्न वार्डों में कराए गए कार्यों पर लाखों रुपये खर्च किए गए—
वार्ड 34: रतनलालनगर में गुरुद्वारा के पास घाट निर्माण – 9.93 लाख
वार्ड 55: झांसी लाइन के पास घाट निर्माण व रंगाई-पुताई – 9.10 लाख
वार्ड 45: गुलाब गार्डेन में घाट मरम्मत व रंगाई-पुताई – 9.86 लाख
वार्ड 07: सीटीआई पूजा स्थल, गोपालनगर – 1.91 लाख
वार्ड 72: पाल ढाबा के पास घाट निर्माण – 9.82 लाख
बड़ा सवाल
यह मामला सिर्फ 30 लाख रुपये के खर्च का नहीं, बल्कि शासन की मंशा, नियमों की विश्वसनीयता और नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठते सवालों का है। अगर काम पहले और टेंडर बाद में कराए जाएंगे, तो ई-टेंडर व्यवस्था का औचित्य ही खत्म हो जाएगा। अब देखना होगा कि शासन और नगर निगम प्रशासन इस पूरे प्रकरण में क्या ठोस कदम उठाते हैं, या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।






