हिंदुत्व का अर्थ केवल धर्म नहीं, सभी के कल्याण की भावना है: मनोज भाई जी
Share your love

संवाद 24 संवाददाता। फर्रुखाबाद नगर की बलरामनगर बस्ती के हिंदू सम्मेलन का आयोजन भारतीय पाठशाला इंटर कॉलेज परिसर में भव्य रूप से संपन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर जनजागरण करना रहा। सम्मेलन में बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिकों, मातृशक्ति, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सहभागिता देखने को मिली।
कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता के चित्र पर पुष्पार्चन एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि VHP के केंद्रीय सह मंत्री मनोज भाई जी, मातृशक्ति के रूप में उपस्थित श्रीमती श्वेता दुबे, कार्यक्रम अध्यक्ष श्री हरिश्चंद्र वर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता अजीत कश्यप तथा धर्मगुरु आचार्य मदन मुरारी मिश्रा मंचासीन रहे।

अपने संबोधन में मुख्य अतिथि मनोज भाई जी ने कहा कि हिंदुत्व का मूल भाव सभी के कल्याण में निहित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदुत्व किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि वह जीवन पद्धति है जो मानवता को एक सूत्र में बांधती है। उन्होंने कहा, “हम सभी भारत माता की संतान हैं और हमारी पहचान हमारी साझा संस्कृति और परंपराओं से है।” इस कथन के माध्यम से उन्होंने समाज में व्याप्त विभाजनकारी प्रवृत्तियों के स्थान पर एकता और समरसता का संदेश दिया।
मनोज भाई जी ने अपने वक्तव्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की यात्रा का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि संघ की स्थापना समाज को संगठित करने, राष्ट्रभक्ति की भावना को प्रबल करने और चरित्र निर्माण के उद्देश्य से की गई थी। उन्होंने कहा कि संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार युग प्रवर्तक थे, जिन्होंने समाज को आत्मनिर्भर, अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ बनाने का सपना देखा। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने स्थापना काल में थे।
उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान समय में जब समाज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब संघ की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। सामाजिक समरसता, सेवा कार्य और सांस्कृतिक चेतना के माध्यम से संघ समाज को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाने का कार्य कर रहा है। उनके अनुसार, राष्ट्र निर्माण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से संभव है।
कार्यक्रम में मातृशक्ति के रूप में उपस्थित श्रीमती श्वेता दुबे ने पंच परिवर्तन विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पंच परिवर्तन केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहार में लाने योग्य सामाजिक संकल्प हैं। उन्होंने विशेष रूप से पर्यावरण संरक्षण पर बल देते हुए 3P मॉडल ‘पॉलीथिन हटाओ, पेड़ लगाओ, पानी बचाओ’ को जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया। उनका कहना था कि पर्यावरण संकट केवल सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
श्वेता दुबे ने कहा कि यदि प्रत्येक परिवार अपने स्तर पर पॉलीथिन का उपयोग कम करे, वर्ष में कम से कम एक पौधा लगाए और जल का विवेकपूर्ण उपयोग करे, तो समाज में बड़ा परिवर्तन संभव है। उन्होंने यह भी कहा कि मातृशक्ति की भूमिका इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि परिवार के संस्कारों का निर्माण महिलाओं के माध्यम से होता है।
कार्यक्रम में बलरामनगर बस्ती की बहनों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने विशेष आकर्षण उत्पन्न किया। गीत, नृत्य और लघु नाटिकाओं के माध्यम से सामाजिक संदेशों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। इन प्रस्तुतियों में देशभक्ति, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक एकता जैसे विषय प्रमुख रूप से उभरकर सामने आए। दर्शकों ने इन प्रस्तुतियों की मुक्त कंठ से सराहना की।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि समाज के प्रत्येक वर्ग की सक्रिय भागीदारी से ही राष्ट्र निर्माण संभव है। महिलाओं की सहभागिता ने यह सिद्ध किया कि वे केवल घरेलू दायित्वों तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की वाहक भी हैं। उनके आत्मविश्वासपूर्ण प्रदर्शन ने युवाओं और बच्चों को भी प्रेरित किया।
कार्यक्रम का सफल संचालन जिला पर्यावरण संयोजक पंकज वर्मा ने किया। उन्होंने मंच संचालन के दौरान वक्ताओं के विचारों को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करते हुए कार्यक्रम की गंभीरता और अनुशासन बनाए रखा। उनके संचालन ने कार्यक्रम को न केवल व्यवस्थित बनाया, बल्कि श्रोताओं को विषय से जोड़े रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सम्मेलन में विभाग पर्यावरण संयोजक सुधेश दुबे, जिला प्रचारक मानवेन्द्र, जिला शारीरिक प्रमुख रजत, आकाश, संदीप, ज्योतिप्रकाश, कृष्णा, अखिलेश, अरविंद दीक्षित, दिनेश मिश्रा सहित अनेक कार्यकर्ता एवं समाजसेवी उपस्थित रहे। इस अवसर पर वक्ताओं ने यह भी कहा कि हिंदू सम्मेलन जैसे आयोजन केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक चेतना के केंद्र होते हैं। इनके माध्यम से समाज को अपने मूल्यों की याद दिलाई जाती है और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का कार्य होता है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

कार्यक्रम के दौरान सामाजिक समरसता पर भी विशेष चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि समाज की प्रगति तभी संभव है जब सभी वर्ग एक-दूसरे के साथ सहयोग और सम्मान का व्यवहार करें। जाति, भाषा और क्षेत्रीय भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता देना समय की आवश्यकता है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित अतिथियों और आयोजकों ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। आयोजकों ने कहा कि ऐसे आयोजन समाज में संवाद और जागरूकता का माध्यम बनते हैं। उन्होंने भविष्य में भी इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करने की प्रतिबद्धता जताई। समापन सत्र में यह संदेश दिया गया कि संघ का शताब्दी वर्ष केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का समय है। यह अवसर समाज को यह सोचने का अवसर देता है कि वह आने वाले वर्षों में किस दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ में प्रत्येक नागरिक की आहुति आवश्यक है।
अंततः हम कह सकते हैं कि, बलरामनगर बस्ती में आयोजित हिंदू सम्मेलन सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और पर्यावरणीय जागरूकता का संगम बनकर उभरा। यह कार्यक्रम केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यवहारिक संदेशों के माध्यम से समाज को प्रेरित करने का प्रयास किया गया। आयोजन ने यह स्पष्ट किया कि जब समाज संगठित होकर सकारात्मक दिशा में कार्य करता है, तब परिवर्तन अवश्यंभावी होता है।






