अब देश के लिए लड़ूंगा” मगरमच्छ से पिता की जान बचाने वाले अजयराज की वीरता को मिला राष्ट्रीय सम्मान
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संवाद 24 संवाददाता। कभी-कभी असाधारण साहस उम्र नहीं देखता। आगरा जिले के बाह तहसील के झरनापुरा गांव के नन्हे बालक अजयराज ने यह साबित कर दिया कि जब हौसला बुलंद हो, तो भय भी हार मान लेता है। महज कुछ ही पलों में दिखाई गई उसकी त्वरित बुद्धि और अदम्य साहस ने न सिर्फ उसके पिता की जान बचाई, बल्कि पूरे देश के लिए उसे प्रेरणा का प्रतीक बना दिया।
25 जुलाई का दिन अजयराज और उसके परिवार के लिए कभी न भूलने वाला बन गया। चंबल नदी किनारे बकरियों को पानी पिलाते समय उसके पिता वीरभान सिंह पर मगरमच्छ ने हमला कर दिया। मगरमच्छ ने पिता के पैर को जबड़े में जकड़ लिया और नदी में खींचने लगा। पिता की चीख सुनते ही अजयराज ने एक पल भी नहीं गंवाया। हाथ में डंडा लिया और सीधे नदी में कूद पड़ा।
अजयराज ने मगरमच्छ के सिर पर लगातार 10–15 वार किए। जब मगरमच्छ नहीं माना तो उसकी आंखों पर वार किया। आखिरकार मगरमच्छ ने शिकार छोड़ दिया और नदी में भाग गया। अजयराज ने पिता को सहारा दिया, नदी से बाहर निकाला और परिजनों के साथ अस्पताल पहुंचाया। उसकी बहादुरी ने मौत के मुंह से पिता को वापस खींच लिया।
इस अद्भुत साहस के लिए अजयराज को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के हाथों पुरस्कार लेने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं अजयराज से बातचीत की। जब उसने पूरी घटना सुनाई तो प्रधानमंत्री ने उसकी पीठ थपथपाकर शाबासी दी और कहा— “खूब पढ़ो”। अजयराज ने भी सादगी से कहा— “अब फौजी बनकर देश के लिए लड़ूंगा।”
प्रधानमंत्री से बातचीत के दौरान अजयराज ने अपने गांव के लिए सडकी मांग भी रखी। यह दिखाता है कि इतनी छोटी उम्र में भी वह सिर्फ अपने बारे में नहीं, बल्कि पूरे गांव के भविष्य के बारे में सोचता है। प्रधानमंत्री ने उसे चॉकलेट और बिस्कुट भी खिलाए, जिससे उसका आत्मविश्वास और बढ़ गया।
घर लौटने पर भावनाओं का दृश्य और भी मार्मिक था। अजयराज ने अपना मेडल अपनी दादी रतन देवी को पहनाया और उनके पैर छुए। दादी की आंखों में गर्व के आंसू छलक पड़े। पांच साल पहले अजयराज की मां अनीता का निधन हो गया था। तब से दादी ही उसका सहारा हैं। अजयराज तीन भाई-बहनों में मझला है—बड़ी बहन काजल और छोटा भाई कुशाल।
अजयराज की कहानी सिर्फ साहस की नहीं, बल्कि संस्कार, संवेदना और संकल्प की भी कहानी है। वह बताता है कि सच्ची वीरता उम्र नहीं, बल्कि सोच और हिम्मत से पैदा होती है। आज अजयराज देश के करोड़ों बच्चों के लिए एक उदाहरण है—कि संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर इरादा मजबूत हो तो हर चुनौती को हराया जा सकता है।






