अरावली की गोद में खोई विरासत: फतेहपुर सीकरी की प्राचीन धरोहरें और खनन की त्रासदी
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संवाद 24 संवाददाता। अरावली पर्वत श्रृंखला, भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक, न केवल पर्यावरण की रक्षा करने वाली हरित दीवार है, बल्कि हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक और पुरातात्विक धरोहरों का खजाना भी है। लेकिन लालच की खदानों ने इस धरोहर को बुरी तरह क्षति पहुंचाई है। फतेहपुर सीकरी के आसपास के क्षेत्र में यह त्रासदी सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जहां प्रागैतिहासिक रॉक पेंटिंग्स और सिकरवार राजपूतों का प्राचीन किला लगभग नष्ट हो चुका है।
फतेहपुर सीकरी, मुगल सम्राट अकबर की राजधानी और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, अरावली की पहाड़ियों पर बसा है। लेकिन इसके आसपास के गांवों – रसूलपुर, पतसाल, चार हिस्सा, मंडी गुड़, मदनपुर और जाजौली – में स्थित प्रागैतिहासिक गुफाएं और रॉक पेंटिंग्स अवैध खनन की भेंट चढ़ गईं। ये पेंटिंग्स मेसोलिथिक काल (पाषाण युग) की हैं, जिनमें मनुष्य, पशु, शिकार के दृश्य और ज्यामितीय आकृतियां उकेरी गई हैं। कभी इनकी संख्या दर्जनों थी, लेकिन खनन के ब्लास्टिंग और पत्थर कटाई से अधिकांश नष्ट हो गईं। पुरातत्वविदों के अनुसार, इनमें से कई 6,000 वर्ष से भी पुरानी थीं। आज बची हुई कुछ पेंटिंग्स भी खतरे में हैं, क्योंकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षण के प्रस्ताव पर अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
इतना ही नहीं, मुगल काल से पहले इस क्षेत्र पर सिकरवार राजपूतों का शासन था। उन्होंने यहां एक मजबूत किला बनाया था, जो अरावली की चोटी पर स्थित था। लेकिन खनन की वजह से यह किला पूरी तरह ध्वस्त हो गया। आज केवल इसका एक दरवाजा पहाड़ पर लटका हुआ बचा है – एक अकेला साक्षी, जो बीते गौरव की याद दिलाता है। खनन ने न केवल किले को मिटाया, बल्कि फतेहपुर सीकरी के स्मारकों को भी नुकसान पहुंचाया। दीवारों में दरारें आ गईं, हकीम हाउस जैसी इमारतें गिर गईं, और सुरक्षा दीवारों से सटकर खनन होने से कंपन से संरचनाएं कमजोर हो गईं।
यह सब तब हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिए थे। आगरा के किसान महेंद्र सिंह की याचिका पर 18 दिसंबर 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने फतेहपुर सीकरी के 10 किलोमीटर दायरे में खनन पर पूर्ण रोक लगा दी थी। लेकिन आदेश के बावजूद अवैध खनन जारी रहा। हाल के वर्षों में अरावली की परिभाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले (नवंबर 2025) ने नए खनन पट्टों पर रोक लगाई है, और पर्यावरण मंत्रालय ने भी कदम उठाने का दावा किया है। फिर भी, बीते नुकसान को वापस नहीं लाया जा सकता।
ये तस्वीरें अरावली की पहाड़ियों में बची-खुची रॉक पेंटिंग्स और खनन से हुए नुकसान की गवाही देती हैं। एक ओर जहां प्राचीन कला मनुष्य की शुरुआती सभ्यता की कहानी कहती है, वहीं खनन के गड्ढे विकास के नाम पर विनाश की याद दिलाते हैं।
अरावली न केवल थार मरुस्थल को रोकने वाली दीवार है, बल्कि जल संरक्षण और जैव विविधता का आधार भी। फतेहपुर सीकरी क्षेत्र में हुई यह क्षति एक चेतावनी है कि अगर हमने अब भी नहीं संभला, तो हमारी आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि कभी यहां प्राचीन किले और गुफा चित्र थे। समय आ गया है कि सख्त कानून लागू हों, अवैध खनन पर अंकुश लगे, और बची हुई धरोहरों को तुरंत संरक्षित किया जाए। अन्यथा, अरावली की गोद में दबी ये विरासतें हमेशा के लिए खो जाएंगी।






