अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस पर जेल भेजे गए 162 नाबालिग, पुलिस की लापरवाही से बना दिया गया अपराधी
Share your love

संवाद 24 संवाददाता। आगरा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर सामने आई यह हकीकत न सिर्फ चिंताजनक है, बल्कि कानून व्यवस्था और पुलिस कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। आरोपियों की उम्र की जांच किए बिना नाबालिगों को जेल भेज देना, सीधे तौर पर मानवाधिकारों और किशोर न्याय अधिनियम का उल्लंघन है। सूचना के अधिकार (RTI) से मिले आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2015 से 2023 के बीच पुलिस की लापरवाही के कारण 162 किशोरों को जेल में रखा गया, जिन्हें बाद में कोर्ट के आदेश पर किशोर संप्रेक्षण गृह भेजना पड़ा।
मानवाधिकार कार्यकर्ता नरेश पारस द्वारा जिला जेल से मांगी गई जानकारी में खुलासा हुआ कि इन मामलों में पुलिस ने गिरफ्तारी के समय यह सुनिश्चित ही नहीं किया कि आरोपी बालिग है या नाबालिग। नतीजा यह हुआ कि कानून की सुरक्षा के हकदार किशोर, लंबे समय तक जेल में रहकर मानसिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित होते रहे। जब परिजनों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और जांच कराई गई, तब कहीं जाकर सच्चाई सामने आई। यदि पुलिस प्रारंभिक स्तर पर ही उम्र की जांच करती, तो इन किशोरों को अपराधियों की तरह जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता।
यह मामला केवल नाबालिगों को जेल भेजने तक सीमित नहीं है। अवैध हिरासत, एफआईआर न दर्ज करना, मामूली शक में लोगों को उठा लेना और कई दिनों तक थाने में बैठाए रखना—ये सभी शिकायतें मानवाधिकार आयोग तक लगातार पहुंच रही हैं। नरेश पारस का कहना है कि थानों में मानवाधिकार आयोग के निर्देशों से जुड़े सूचना बोर्ड तक सही ढंग से नहीं लगाए जाते। कहीं वे हटाकर कोनों में टांग दिए गए हैं, तो कहीं कबाड़ बन चुके हैं।
युवा अधिवक्ता संघ के मंडल अध्यक्ष नितिन वर्मा के अनुसार, राज्य मानवाधिकार आयोग में पूर्णकालिक अध्यक्ष न होने के कारण सैकड़ों शिकायतें लंबित पड़ी हैं। वर्तमान में उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग में 556 से अधिक मामले निस्तारण की प्रतीक्षा में हैं। इनमें सबसे ज्यादा शिकायतें पुलिस से पीड़ित आम लोगों की हैं। जब प्रशासनिक स्तर पर कहीं सुनवाई नहीं होती, तब पीड़ित मजबूर होकर मानवाधिकार आयोग की शरण लेता है।
पुलिस लाइन में गठित मानवाधिकार सेल में भी हालात इसी समस्या की ओर इशारा करते हैं। वर्ष 2025 में ही यहां 500 से अधिक शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें अधिकांश पुलिस की कार्यशैली से जुड़ी हैं। यह दर्शाता है कि सुधार की बजाय लापरवाही का सिलसिला लगातार जारी है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। कानून साफ कहता है कि गिरफ्तारी, हिरासत, चिकित्सीय परीक्षण, सूचना देने और बल प्रयोग जैसे मामलों में सख्त नियमों का पालन अनिवार्य है। नाबालिगों के मामले में तो कानून और भी संवेदनशील है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट नजर आती है।
मानवाधिकार दिवस पर यह सवाल सबसे अहम है—क्या कानून सिर्फ किताबों तक सीमित रह गया है? किशोर उम्र में जेल भेजकर किसी को अपराधी बना देना उसकी पूरी जिंदगी पर दाग लगा देता है। ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करना, दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करना और पुलिस को संवेदनशील बनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि समय की अनिवार्य मांग है। तभी मानवाधिकार दिवस की सार्थकता सिद्ध हो पाएगी।






