आगरा कॉलेज में दाखिले पर विवाद: आवाज उठाने पर रद्द हुआ प्रवेश
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संवाद 24 संवाददाता। आगरा कॉलेज की लॉ फैकल्टी में दलित छात्र के प्रवेश को लेकर उठे विवाद ने शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता और छात्र अधिकारों पर नई बहस छेड़ दी है। कटऑफ सूची में नाम होने के बावजूद दाखिला न मिलने और इसके विरोध पर दोनों भाइयों के प्रवेश रद्द किए जाने के आरोपों से मामला गंभीर होता दिख रहा है। छात्र पक्ष इसे भेदभाव और मनमानी करार दे रहा है, जबकि कॉलेज प्रशासन अनुशासनहीनता को इसकी वजह बता रहा है।
सिकंदरा निवासी सचिन के अनुसार, एलएलबी प्रथम वर्ष की पहली काउंसलिंग 13 नवंबर को हुई थी। एससी वर्ग का कटऑफ 142.78 था, जिसे पार कर लेने पर उसे प्रवेश मिल गया। वहीं उसके भाई जतिन की मेरिट भी कटऑफ से अधिक थी और उसका नाम पहली मेरिट सूची में शामिल था, लेकिन ईमेल सूचना समय पर न मिलने के कारण वह उसी दिन प्रवेश नहीं ले सका। छात्र का आरोप है कि जब उन्होंने अपनी बात रखी तो कॉलेज में गहमा-गहमी हो गई और इसे अनुशासनहीनता करार देकर पहले जतिन और फिर सचिन का भी दाखिला रद्द कर दिया गया।
छात्र का कहना है कि द्वितीय काउंसलिंग में मेरिट दिखाने और ईमेल मिलने के बावजूद प्रवेश से मना कर दिया गया। आरोप है कि इस दौरान दस्तावेज तक फेंक दिए गए। 2 दिसंबर को मां के साथ कॉलेज पहुंचने पर भी उनकी बात नहीं सुनी गई और अनुशासनहीनता तथा अभद्रता का हवाला देकर मामले को खत्म कर दिया गया। इसी दौरान एक शिक्षिका का मोबाइल फोन चोरी होने की घटना को लेकर भी एफआईआर की धमकी दी गई, जिसे छात्र पक्ष साजिश का हिस्सा बता रहा है। छात्रों का कहना है कि यदि सीसीटीवी फुटेज मौजूद है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
वहीं कॉलेज प्रशासन ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। प्राचार्य सीके गौतम के अनुसार, पहली काउंसलिंग के दिन ही दोनों छात्रों ने शिक्षकों के साथ अभद्रता की थी। टेबल पर हाथ मारकर हंगामा किया गया, जिससे दो से तीन घंटे तक काउंसलिंग प्रक्रिया बाधित रही। परीक्षा समिति ने इस अनुशासनहीनता को गंभीर मानते हुए दोनों छात्रों को प्रवेश न देने का निर्णय लिया।
प्राचार्य का कहना है कि छात्रों से प्रार्थना पत्र देकर गलती स्वीकार करने को कहा गया था, लेकिन वे धमकी भरे रवैये के साथ तत्काल प्रवेश की मांग पर अड़ गए। मां के साथ आकर माफी मांगने का दावा भी तथ्यहीन बताया गया है। प्रशासन का दावा है कि पूरे घटनाक्रम की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग देखी गई और उसी के आधार पर फैसला लिया गया।
इस पूरे प्रकरण में अब सवाल यह है कि क्या प्रवेश प्रक्रिया में संवाद की कमी ने विवाद को बढ़ाया, या फिर सचमुच अनुशासनहीनता इतनी गंभीर थी कि भविष्य दांव पर लगाना जरूरी हो गया। दोनों पक्षों के दावों के बीच निष्पक्ष जांच और तथ्यात्मक स्पष्टता ही इस विवाद का स्थायी समाधान निकाल सकती है।






