भावनाओं से ऊपर बौद्धिकता संघ के लिए समय की पुकार, आगरा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ब्रज प्रांत कार्यालय माधव भवन का लोकार्पण
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संवाद 24 संवाददाता। केवल एक आयोजन-भाषण नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक-वैचारिक परिस्थितियों पर गहन चिंतन का आह्वान है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संघ पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठने वाले प्रश्नों का उत्तर भावनात्मक उत्तेजना से नहीं, बल्कि ठोस बौद्धिकता और अध्ययनशीलता से दिया जाना चाहिए। यह संदेश आज के विमर्श-प्रधान समाज में विशेष महत्व रखता है।
वर्तमान समय में विचारधाराओं की टकराहट केवल सड़कों या सभाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल मंचों, शैक्षणिक परिसरों और वैश्विक मंचों तक फैल चुकी है। ऐसे में केवल आक्रोश या भावनात्मक प्रतिक्रिया न तो समाज को दिशा दे सकती है और न ही सत्य को प्रभावी ढंग से स्थापित कर सकती है। शंकराचार्य का यह कथन कि “ज्ञानवान कार्यकर्ता ही करारा उत्तर दे सकते हैं” संघ के कार्यकर्ताओं के लिए आत्ममंथन का विषय है—क्या हम अध्ययन, तर्क और ऐतिहासिक तथ्यों के साथ अपने विचार रख पा रहे हैं?
माधव भवन को “हवा खाने का केंद्र” न बनाकर “बौद्धिक साधना का केंद्र” बनाने का आग्रह इस बात की ओर संकेत करता है कि संस्थाएं केवल ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि विचारों से सशक्त होती हैं। यहां शोध, दस्तावेजीकरण और विमर्श की जो कल्पना की गई है, वह समाज के सामने इतिहास, संस्कृति और बलिदान की प्रमाणिक प्रस्तुति का माध्यम बन सकती है। संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल का यह कहना कि युग के अनुरूप आगे बढ़ना आवश्यक है, इसी सोच का विस्तार है—संख्या के साथ गुणवत्ता और प्रमाणिकता का संतुलन।
आगरा और उसके आसपास का क्षेत्र केवल ताजमहल तक सीमित नहीं है। शिवाजी महाराज का साहस, गोकुलाजाट का बलिदान, राणा सांगा का संघर्ष और ब्रजभूमि की भक्ति परंपरा—ये सब उस इतिहास के अध्याय हैं जिन्हें व्यवस्थित शोध और प्रस्तुति की आवश्यकता है। यदि स्मारक, संग्रहालय और शोध केंद्र बनते हैं, तो वे न केवल पर्यटन को विविधता देंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम भी करेंगे।
अंततः, शंकराचार्य का आह्वान संघ तक सीमित नहीं है। यह पूरे समाज के लिए संदेश है कि वैचारिक चुनौतियों का सामना करने के लिए अध्ययन, संवाद और तर्क की संस्कृति को मजबूत करना होगा। भावनाएं प्रेरणा दे सकती हैं, पर दिशा बौद्धिकता ही देती है। यदि संस्थाएं और समाज इस संतुलन को साध लें, तो प्रश्नचिह्न अपने आप उत्तरों में बदलने लगेंगे।






