18 साल की लंबी इंतज़ार के बाद मिली इंसाफ की जंग: 15 साल की किशोरी की ज़िंदगी बर्बाद करने वालों को सज़ा
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संवाद 24 संवाददाता। 2007 का वो काला दिन, जब एक मासूम 15 साल की लड़की की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई। एक साधारण बहाने से शुरू हुई साजिश ने उसे अपहरण, बार-बार दुष्कर्म और फिर मानव तस्करी के गर्त में धकेल दिया। लगभग दो दशकों बाद, जनवरी 2026 में विशेष न्यायाधीश (एसटी-एसटी एक्ट) शिव कुमार की अदालत ने इस जघन्य अपराध के पांच आरोपियों को दोषी करार दिया। तीन दरिंदों को उम्रकैद, एक को 7 साल और एक महिला को 1 साल की सजा सुनाई गई।
अपराध की शुरुआत: एक बहाना और धोखा
1 अप्रैल 2007 की सुबह, उत्तर प्रदेश के मलपुरा थाना क्षेत्र के गढ़ी हरलाल गांव में रहने वाली 15 साल की किशोरी अपने घर पर थी। तभी प्रीतम नाम का व्यक्ति उसके घर आया और आलू खोदने के बहाने उसे खेत की ओर ले गया। लेकिन वहां पहुंचते ही सच्चाई सामने आई। प्रीतम ने उसे ट्यूबवेल के कमरे में ले जाकर बंद कर दिया। वहां उसका चाचा हाकिम पहले से मौजूद था।
दोनों ने दरवाजा बंद किया, सिर पर तमंचा रखकर धमकाया। किशोरी की चीखें दब गईं। शाम तक उसे ट्रक में बैठाकर इटावा ले जाया गया। वहां द्रोपदी नाम की महिला और बाबू मिले। द्रोपदी ने उसे अपने घर में रखा। अगले 10 दिनों तक प्रीतम, हाकिम, बाबू और अन्य लोगों ने उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया।
फिर साजिश का अगला पड़ाव – उसे सिसिया के नगला ले जाकर 50 हजार रुपये में विजयपाल को बेच दिया गया। विजयपाल ने भी उसे 20-25 दिनों तक अपने कब्जे में रखकर यौन शोषण किया।
पीड़िता ने अपने बयान में साफ कहा कि वो डर के मारे चुप रही। उसे लगातार जान से मारने की धमकी दी जाती थी।
पुलिस की कार्रवाई और लंबी कानूनी लड़ाई
1 जून 2007 को किशोरी के पिता ने तहरीर दी। 2 जून को पुलिस ने प्रीतम, हाकिम, विजयपाल, बाबू और द्रोपदी को गिरफ्तार कर किशोरी को बरामद किया। 4 जून को आईपीसी की धारा 376 (दुष्कर्म) के साथ एससी-एसटी एक्ट की धाराएं बढ़ाई गईं। 23 जुलाई को आरोप-पत्र दाखिल हुआ।
लेकिन इंसाफ को आने में 18 साल लग गए। इस दौरान पीड़िता ने कई बार अदालत में अपनी आपबीती सुनाई। गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य सबूतों के आधार पर अदालत ने पांचों को दोषी माना।
सजा का ब्यौरा
प्रीतम (गढ़ी हरलाल) — उम्रकैद + 80 हजार रुपये जुर्माना
हाकिम (गढ़ी हरलाल) — उम्रकैद + 80 हजार रुपये जुर्माना
विजयपाल (सिसिया, इटावा) — उम्रकैद + 40 हजार रुपये जुर्माना
बाबू (विजय नगर, इटावा) — 7 साल कारावास + 41 हजार रुपये जुर्माना
द्रोपदी (विजय नगर, इटावा) — 1 साल कारावास + जुर्माना
यह सजा सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि एक मासूम की चीखों का जवाब है। तीन मुख्य दरिंदों को उम्रकैद सुनाकर अदालत ने साफ संदेश दिया कि ऐसी क्रूरता को समाज कभी माफ नहीं करेगा।
एक सवाल जो बाकी है
18 साल बाद इंसाफ मिला, लेकिन उस किशोरी की ज़िंदगी? वो सालों की त्रासदी, सामाजिक कलंक, परिवार की पीड़ा और सपनों का टूटना – ये सब कैसे वापस लौटेगा? यह केस सिर्फ सजा का नहीं, बल्कि देर से मिले इंसाफ और व्यवस्था की सुस्ती का भी दर्दनाक उदाहरण है।
फिर भी, आज यह फैसला उन हजारों मासूमों के लिए उम्मीद की किरण है, जिनकी आवाज दबा दी जाती है। उम्मीद है कि ऐसे मामलों में जांच और सुनवाई और तेज होगी, ताकि इंसाफ को इतना लंबा इंतजार न करना पड़े।
न्याय में देरी न्याय का हनन है, लेकिन न्याय हुआ तो उम्मीद बाकी रहती है।






