मुमताज के पहले उर्स में एक लाख का दान, सोने की जाली से सजी थी कब्र; ताजमहल से जुड़ी 394 साल पुरानी अनकही दास्तान
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संवाद 24 संवाददाता। दुनिया में प्रेम की सबसे भव्य निशानी माने जाने वाले ताजमहल से जुड़ी एक ऐसी ऐतिहासिक परंपरा है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। ताजमहल केवल एक मकबरा नहीं, बल्कि मुगल काल की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत दस्तावेज भी है। इसकी नींव के साथ ही शुरू हुई उर्स की परंपरा आज करीब 394 साल पुरानी हो चुकी है।
आगरा स्थित ताजमहल में शहंशाह शाहजहां का उर्स हर वर्ष 15 से 17 जनवरी तक मनाया जाता है। इन तीन दिनों में ताजमहल में सैलानियों को निशुल्क प्रवेश दिया जाता है और आमजन को तहखाने में स्थित शाहजहां और मुमताज महल की असली कब्रों के दर्शन का अवसर मिलता है। लेकिन इस परंपरा की शुरुआत शाहजहां से नहीं, बल्कि उनकी प्रिय बेगम मुमताज महल से हुई थी।
22 जून 1632: मुमताज का पहला उर्स
प्रसिद्ध आस्ट्रियाई इतिहासकार एबा कोच ने अपनी पुस्तक ‘द कंप्लीट ताजमहल एंड द रिवरफ्रंट गार्डन्स ऑफ आगरा’ में ईरानी इतिहासकार जलालुद्दीन के हवाले से मुमताज के पहले उर्स का विस्तृत वर्णन किया है। मुमताज महल का निधन 17 जून 1631 को बुरहानपुर में हुआ था। जनवरी 1632 में उनका पार्थिव शरीर बुरहानपुर से आगरा लाया गया।
इसके बाद 22 जून 1632 को ताजमहल के फोरकोर्ट में मुमताज का पहला उर्स मनाया गया। इस मौके पर शहंशाह शाहजहां, मुमताज के पिता आसफ खां, ईरानी राजदूत मुहम्मद अली बेग सहित देशभर से आए अमीर, मनसबदार और दरबारी सफेद वस्त्रों में शामिल हुए। सभी लोग अपने-अपने रैंक के अनुसार बैठे।
एक लाख रुपये का दान, सालाना उर्स की परंपरा
उर्स के दौरान शाहजहां ने कुरान की आयतें पढ़ीं और मुमताज महल के लिए फातिहा की। इसके बाद बादशाह ने गरीबों में 50 हजार रुपये दान किए, जबकि शाही परिवार की महिलाओं ने भी 50 हजार रुपये गरीबों को बांटे। इस तरह पहले उर्स में कुल एक लाख रुपये दान दिए गए—जो उस दौर में एक असाधारण राशि थी। इसी अवसर पर यह तय किया गया कि हर वर्ष मुमताज के उर्स पर गरीबों को एक लाख रुपये दिए जाएंगे।
सोने की जाली से सजी थी मुमताज की कब्र
एबा कोच की पुस्तक के अनुसार, 26 मई 1633 को मुमताज के दूसरे उर्स तक मकबरे का निचला तल बनकर तैयार हो चुका था। शाम के समय शाहजहां, जहांआरा बेगम और शाही परिवार के सदस्य आगरा किले से नाव द्वारा यमुना किनारे पहुंचे और अस्थायी सीढ़ियों से ऊपर जाकर फातिहा पढ़ी।
इस दौरान शाही सुनारों के अधीक्षक बिबादल खान ने करीब छह लाख रुपये की लागत से सोने की जाली बनवाई थी, जिसे मुमताज की कब्र के चारों ओर लगाया गया। इस जाली पर फूलों की बारीक नक्काशी की गई थी और इसे सोने के गोले व दीपकों से सजाया गया था। वर्ष 1643 में इस सोने की जाली को हटाकर वर्तमान संगमरमर की जाली स्थापित की गई।
कालीन, सफेद तंबू और हजार मेहमान
दूसरे उर्स के समय यमुना किनारे मकबरे पर दफन के बाद सफेद संगमरमर का चबूतरा बन चुका था। फर्श को कीमती कालीनों से ढका गया था और सफेद रंग के विशाल तंबू लगाए गए थे। उस उर्स में करीब एक हजार लोग शामिल हुए थे। यूरोपीय यात्री पीटर मुंडी ने 1633 में अपने यात्रा विवरण में लिखा है कि कब्र के चारों ओर पहले से ही सोने की रेलिंग मौजूद थी।
14 साल चले मुमताज के उर्स, फिर इतिहास में खामोशी
इतिहास के अनुसार, मुमताज महल के उर्स लगातार 14 वर्षों तक मनाए गए। हालांकि वर्ष 1658 में शाहजहां के कैद होने के बाद इन उर्सों का कोई विस्तृत ब्योरा नहीं मिलता। बाद में शाहजहां की मृत्यु वर्ष 1666 में हुई, जिसके बाद उनका उर्स शुरू किया गया—जो आज भी ताजमहल में परंपरागत रूप से मनाया जाता है।
ताजमहल की ये ऐतिहासिक परंपराएं बताती हैं कि यह स्मारक केवल प्रेम की निशानी नहीं, बल्कि मुगल काल की आस्था, दानशीलता और शाही वैभव की भी अद्भुत मिसाल है।






