रामलला प्रतिष्ठा की वर्षगांठ पर चम्पतराय का भावपूर्ण संबोधन, क्यों कहा ‘यह सिर्फ मंदिर नहीं, राष्ट्र का सम्मान है’?
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संवाद 24 अयोध्या। अयोध्या में द्वितीय प्रतिष्ठा द्वादशी समारोह का वातावरण श्रद्धा, महत्व और गौरव से भरा रहा। जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चम्पतराय जी ने कार्यक्रम में मंदिर, प्रतिष्ठा, इतिहास, वास्तु और संघर्ष यात्रा पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह मंदिर सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हिंदुत्व, भारतीय अस्मिता और राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक है।
तिथि का महत्व और प्रतिष्ठा की स्मृति
चम्पतराय ने बताया कि अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार भले यह वर्ष 2025 का अंतिम दिन है, लेकिन भारतीय पंचांग में यह पौष शुक्ल द्वादशी है। ठीक इसी तिथि को दो वर्ष पहले श्री रामलला विग्रह की प्रतिष्ठा की गई थी। इसलिए यह दिन केवल तिथि नहीं, बल्कि इतिहास, संघर्ष और विजय का स्मृति-चिह्न है।
पांच दिवसीय आयोजन और पूजन परंपरा
इस वर्ष समारोह पाँच दिनों तक चला। उडुपी कृष्ण मठ के जगद्गुरु माध्वाचार्य जी ने निरंतर पूजन किया। अयोध्या के जगद्गुरु रामदिनेशाचार्य जी ने कथा द्वारा राम गुणगान किया। अन्य सांस्कृतिक और वैदिक कार्यक्रमों ने वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया।
ध्वजारोहण और विशिष्ट उपस्थिति
25 नवंबर को मंदिर के मुख्य शिखर पर ध्वजा स्थापित हुई। द्वादशी के अवसर पर राजनाथ सिंह, सीएम योगी आदित्यनाथ तथा अयोध्या के 25-30 संतों की उपस्थिति में ध्वजारोहण संपन्न हुआ। आगे छः मंदिरों पर समयानुसार चरणबद्ध ध्वजारोहण होगा।
500 वर्षों का संघर्ष और 40 वर्षों की न्यायिक यात्रा
चम्पतराय जी ने स्पष्ट कहा कि यह विजय अचानक नहीं मिली। हिंदू समाज और संतों ने 500 वर्षों तक संघर्ष किया। आजादी के बाद यह संघर्ष कानूनी और संवैधानिक मार्ग पर आया। लगभग 40 वर्षों की न्यायिक प्रक्रिया के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भूमि भगवान को समर्पित करने का निर्णय दिया। इसी निर्णय से 70 एकड़ भूमि आज जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र को प्राप्त हुई।
1000 वर्ष खड़े रहने वाले मंदिर की संरचना
मंदिर की परिकल्पना थी कम से कम 1000 वर्ष टिकने वाला निर्माण। इसीलिए भवन में लोहे का प्रयोग न्यूनतम रखा गया। भारतीय शिल्पकला और प्राचीन जोड़ तकनीक अपनाई गई। जल निकासी, ताप प्रबंधन और सुरक्षा ढांचा वैज्ञानिक आधार पर निर्मित है। यह मंदिर वास्तु परंपरा + इंजीनियरिंग का अद्भुत संगम है।
सूर्य तिलक: जहाँ आस्था और विज्ञान मिलते हैं
चम्पतराय ने बताया कि जन्मकुंडली, दिशा, संरचना और खगोलीय गणना के अनुसार मंदिर बनाया गया है। रामनवमी के दिन दोपहर 12 बजे सूर्य की किरणें रामलला के ललाट पर तिलक करेंगी। इस योजना को इसरो ने तकनीकी रूप से स्वीकार किया। प्रति वर्ष लगभग 4 मिनट सूर्य का प्रकाश गर्भगृह में प्रवेश करेगा, यह एक अद्वितीय घटना होगी।
800 मीटर परकोटा और भीड़ नियंत्रण व्यवस्था
मंदिर परिसर में 800 मीटर लंबा आयताकार परकोटा है। यह दक्षिण भारतीय परंपरा के आधार पर निर्मित है। 14 फीट चौड़ाई वाला यह मार्ग भीड़ नियंत्रण में बड़ी भूमिका निभाएगा। पंचायतन पूजा व्यवस्था के अनुसार पांच देवताओं की सामूहिक उपासना होगी।
संपूर्ण भारत की संस्कृति, एक ही परिसर में
रामायण परंपरा का पूरा सांस्कृतिक भारत यहाँ दिखाई देता है –
लक्ष्मण: शेषावतार
विश्वामित्र, वशिष्ठ, अगस्त्य: मार्गदर्शक
वाल्मीकि: प्रथम कवि और इतिहास-संचायक
निषादराज और शबरी: प्रेम, भक्ति और जनसमर्थन
अहिल्या, जटायु, गिलहरी: समर्पण और बलिदान
तुलसीदास: अवधी में रामायण का पुनर्जागरण
यह परिसर जीवित सांस्कृतिक विश्वकोश जैसा है।
त्रि-आयामी म्यूरल और दृश्यात्मक कथा
दीवारों पर 3D म्यूरल लगाए गए हैं। इनमें जन्म से राज्याभिषेक तक रामायण का संपूर्ण जीवन चित्रित है। पहली बार आने वाला भी प्रतीकों, पात्रों और प्रसंगों को समझ सके इसी उद्देश्य से यह कला विकसित की गई है।
श्रृद्धालु, सुरक्षा और तीर्थ व्यवस्था
22 जनवरी 2024 के बाद प्रतिदिन 80,000 से 1,00,000 दर्शनार्थी आते हैं। कुंभ काल में 4 लाख प्रतिदिन का औसत रिकॉर्ड है। यात्रियों की सुविधा, पर्यावरण, जल प्रबंधन और सुरक्षा पर विस्तृत कार्य हुआ है।
अंततः हम कह सकते हैं कि अयोध्या का यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि इतिहास, विज्ञान, संघर्ष, परंपरा, समर्पण और राष्ट्र सम्मान का जीवंत स्मारक है। यह मंदिर खड़ा हुआ इतिहास है, जो आने वाली पीढ़ियों को स्मरण कराएगा कि “धर्म केवल पूजा नहीं, यह आत्मसम्मान भी है।”






