मंदिर, परंपरा और महाभियोग: क्या DMK हिंदू विश्वास को राजनीति की बलि चढ़ा रही है?
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संवाद 24, विशेष रिपोर्ट।
तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम जलाने के अदालती आदेश ने तमिलनाडु की राजनीति में ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है, जो अब सीधे न्यायपालिका से टकराता दिख रहा है। मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की पहल ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या यह संवैधानिक प्रक्रिया है या अदालत पर दबाव बनाने की सोची-समझी रणनीति?
फैसले से नाराज़गी या डर की राजनीति?
जस्टिस स्वामीनाथन ने 1 दिसंबर को तिरुप्परनकुंद्रम मंदिर से जुड़ी परंपरा के अनुसार दीप जलाने की अनुमति दी थी। प्रशासन द्वारा आदेश की अनदेखी के बाद 4 दिसंबर को अदालत ने सख्त रुख अपनाया। इसके तुरंत बाद महाभियोग की चर्चा शुरू हो गई।
पूर्व न्यायाधीशों के एक बड़े समूह ने इसे न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला बताया है। 56 से अधिक सेवानिवृत्त जजों का कहना है कि किसी फैसले से असहमति का जवाब महाभियोग नहीं हो सकता।
विवाद की जड़ क्या है?
मदुरै से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी हिंदुओं के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यहां भगवान मुरुगन के छह प्रमुख निवासों में से एक मंदिर स्थित है। सदियों से कार्तिगई दीपम के अवसर पर मंदिर से जुड़े दीपस्तंभ पर दीप जलाने की परंपरा रही है।
विवाद पहाड़ी के ऊपरी हिस्से में मौजूद सिकंदर वधुशाह की दरगाह को लेकर है, जिसे 17वीं शताब्दी का बताया जाता है। हाल के वर्षों में कुछ संगठनों द्वारा पहाड़ी का नाम बदलने और गतिविधियों पर रोक की मांग के बाद तनाव बढ़ा, जिसका असर सीधे धार्मिक परंपराओं पर पड़ा।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
तनाव के नाम पर प्रशासन ने धार्मिक आयोजनों को सीमित कर दिया। मंदिर से जुड़े लोगों का आरोप है कि सामान्य पूजा को छोड़कर बाकी परंपराओं को जानबूझकर रोका गया, जिससे अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अदालत के आदेश के बावजूद जब दीप नहीं जल पाया, तो मामला अवमानना तक पहुंच गया।
महाभियोग: संवैधानिक हथियार या राजनीतिक औज़ार?
संविधान महाभियोग का प्रावधान न्यायाधीशों के गंभीर कदाचार के लिए देता है, न कि असहज फैसलों के बदले के रूप में। कानूनी जानकारों का कहना है कि सरकार या विपक्ष के पास उच्च पीठ या सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प खुला था, लेकिन उसे छोड़कर सीधे महाभियोग की राह चुनना संदिग्ध इरादों की ओर इशारा करता है।
सियासत बनाम आस्था
आलोचकों का आरोप है कि यह पूरा विवाद केवल एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैचारिक राजनीति काम कर रही है। भगवान मुरुगन तमिल समाज, खासकर पिछड़े वर्गों में गहरी आस्था का केंद्र हैं। ऐसे में परंपराओं पर रोक और अदालत के आदेश के बाद जज को निशाना बनाना, आने वाले समय में सामाजिक और राजनीतिक टकराव को और तेज कर सकता है।
लोकतंत्र के लिए चेतावनी
अगर न्यायाधीशों को फैसलों के कारण महाभियोग की धमकी मिलने लगे, तो न्यायपालिका कैसे स्वतंत्र रह पाएगी? यह सवाल केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। विपक्षी दलों का इस मुद्दे पर एकजुट होना भी राजनीतिक संदेश देता है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए घातक साबित हो सकते हैं।
संवाद 24 का सवाल:
क्या यह महाभियोग वास्तव में संविधान की रक्षा के लिए है, या फिर अदालत को “सीमा में रहने” का संदेश देने की कोशिश? फैसला आने वाले दिनों में केवल इस केस का नहीं, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का भी होगा।






