इंटरनेट मीडिया पर लगाम लगाने की तैयारी: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अब ‘स्वतंत्र रेगुलेटर’ की जरूरत, दिव्यांगों का मजाक उड़ाना पड़ेगा भारी
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नई दिल्ली | संवाद 24 न्यूज़
सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर परोसी जा रही आपत्तिजनक और अश्लील सामग्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को स्पष्ट कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट को नियंत्रित (Control) करने के लिए एक ‘तटस्थ, स्वतंत्र और स्वायत्त नियामक’ (Independent Regulator) का होना बेहद जरूरी है।
क्या है पूरा मामला? सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी ‘क्योर स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। मामला मशहूर स्टैंड-अप कॉमेडियन और ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ के होस्ट समय रैना और अन्य सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स (विपुल गोयल, बलराज, आदि) द्वारा दिव्यांगों का मजाक उड़ाने से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा कि दिव्यांगों के प्रति असंवेदनशीलता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
SC/ST एक्ट जैसा सख्त कानून बने सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा कि दिव्यांगों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने वालों पर SC/ST एक्ट की तर्ज पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हो सकती? कोर्ट ने कहा कि जैसे जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल अपराध है, वैसे ही किसी की शारीरिक अक्षमता या बीमारी का मजाक उड़ाना भी दंडनीय अपराध होना चाहिए।
इन्फ्लुएंसर्स को मिला ‘सामाजिक दंड’ कोर्ट ने कॉमेडियन समय रैना और अन्य को फटकार लगाते हुए भविष्य में सावधान रहने की चेतावनी दी है। कोर्ट ने इसे ‘सामाजिक दंड’ का हिस्सा बताते हुए निर्देश दिया कि वे हर दो महीने में दिव्यांगों की मदद के लिए शो आयोजित करें और फंड जुटाएं। फाउंडेशन ने रैना द्वारा 2.5 लाख रुपये देने की पेशकश को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि यह उनकी गरिमा का सवाल है, पैसे का नहीं।






