दिल्ली में प्रदूषण पर प्रदर्शन या नक्सली एजेंडा? हिडमा के समर्थन ने उठाए गंभीर सवाल

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संवाद 24 नई दिल्ली। रविवार शाम राजधानी दिल्ली में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने प्रदूषण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर चल रही बहस को पूरी तरह दूसरी दिशा में मोड़ दिया। प्रदूषण नियंत्रण और साफ हवा की मांग के नाम पर हुआ यह प्रदर्शन अचानक तब विवादों में घिर गया जब भीड़ में शामिल कुछ तत्वों ने न केवल पुलिसकर्मियों पर हमला किया, बल्कि कुख्यात माओवादी कमांडर माडवी हिडमा के समर्थन में खुलेआम नारे भी लगाए। इस घटना ने न केवल इस प्रदर्शन की मंशा पर गहरे सवाल खड़े किए, बल्कि दिल्ली की कानून-व्यवस्था और देश की आंतरिक सुरक्षा पर भी चिंताएं बढ़ा दीं।

दिल्ली की हवा रविवार को एयर क्वालिटी इंडेक्स 391 दर्ज किए जाने के बाद ‘बेहद खराब’ श्रेणी में पहुंच गई थी। ऐसे समय में शहर को संतुलित, रचनात्मक और शांतिपूर्ण प्रयासों की आवश्यकता थी। लेकिन इंडिया गेट क्षेत्र में जो कुछ हुआ, उससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रदर्शन का एजेंडा केवल प्रदूषण जैसा जन-सरोकार मुद्दा नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक व्यवस्थित वैचारिक छाया छुपी हुई थी।

इंडिया गेट पर प्रदर्शन: SC के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी
इंडिया गेट देश की राजधानी का सबसे प्रतिष्ठित और संवेदनशील क्षेत्र है। सुरक्षा, यातायात और सार्वजनिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने काफी समय पहले से किसी भी प्रकार के प्रदर्शन, धरना या विरोध के लिए जन्तर-मंतर को अधिकृत स्थल घोषित कर रखा है। इसके बावजूद भीड़ ने अपने प्रदर्शन के लिए इंडिया गेट के पास स्थित सी-हेग्जागन क्षेत्र को चुना।

पुलिस के अनुसार प्रदर्शनकारियों को बार-बार समझाया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रदर्शन जंतर-मंतर पर करना चाहिए, लेकिन भीड़ में शामिल कुछ समूहों ने ये निर्देश मानने से साफ इनकार कर दिया। इसके विपरीत, उन्होंने ट्रैफिक रोकने की कोशिश की, जिससे न केवल आम नागरिक, बल्कि आपातकालीन सेवाओं तक का मार्ग अवरुद्ध हो गया। यह वही क्षेत्र है जहाँ देश-विदेश के हजारों लोग हर दिन आते-जाते हैं। ऐसे में अचानक सड़क जाम होने से कई घंटे तक अफरा-तफरी जैसी स्थिति पैदा हो गई।

एम्बुलेंस और मेडिकल स्टाफ जाम में फंसे, फिर भी प्रदर्शनकारियों का अड़ियल रवैया
गवाहों के अनुसार ट्रैफिक जाम के बीच एक एम्बुलेंस और मेडिकल स्टाफ की गाड़ियाँ भी बुरी तरह फंस गई थीं। आम तौर पर जब किसी प्रदर्शन के दौरान ऐसी स्थिति बनती है, तो भीड़ रास्ता देने के लिए बाध्य हो जाती है। लेकिन यहाँ बिल्कुल उल्टा हुआ—प्रदर्शनकारियों ने न कोई संवेदनशीलता दिखाई, न ही एम्बुलेंस को निकलने दिया। इससे साफ हुआ कि प्रदर्शनकारियों का उद्देश्य किसी सामाजिक समस्या को उजागर करना नहीं, बल्कि किसी भी स्थिति में टकराव पैदा करना था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने ट्रैफिक हटाने का प्रयास किया, और यही वह क्षण था जब माहौल हिंसक रूप से बिगड़ गया।

पुलिस पर मिर्ची स्प्रे से हमला, कई कर्मी घायल
पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने अचानक पुलिसकर्मियों पर मिर्ची स्प्रे (Pepper Spray) कर दिया। यह हमला बेहद अप्रत्याशित था और सुरक्षा बलों को इस तरह की हरकत की उम्मीद नहीं थी। मिर्ची स्प्रे से तीन से चार पुलिसकर्मियों की आंखें और चेहरा बुरी तरह जल गया, जिससे वे कुछ समय के लिए दृष्टि तक खो बैठे।

घायल पुलिसकर्मियों को तुरंत राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों के अनुसार उनकी आंखों में गंभीर जलन थी और कुछ को बर्निंग ट्रीटमेंट भी देना पड़ा। एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में पुलिस पर मिर्ची स्प्रे जैसा हमला सवाल खड़े करता है कि क्या यह साधारण प्रदर्शन था या कुछ लोगों ने पहले से ही हिंसक योजना बनाई थी?

हिडमा के समर्थन में नारे: प्रदर्शन की असल मंशा उजागर
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे चौंकाने वाली कड़ी वह वीडियो है जो सोशल मीडिया पर सामने आया। इस वीडियो में कुछ लोग हाथों में माडवी हिडमा की तस्वीर वाले पोस्टर लेकर नारे लगाते दिखे। वीडियो में मौजूद नारे साफ संकेत देते हैं कि प्रदर्शन की दिशा पर्यावरण मुद्दे से हटकर नक्सली विचारधारा के प्रचार की ओर मुड़ गई थी।

यहाँ यह समझना बेहद ज़रूरी है कि माडवी हिडमा कौन था?
वह दंडकारण्य क्षेत्र में सक्रिय नक्सली संगठन का सबसे खतरनाक कमांडर था। सुरक्षा एजेंसियों की सूची में वह शीर्ष वांछित माओवादियों में शामिल था। भारत सरकार ने उसके सिर पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया था। वह कई बड़े हमलों, नरसंहारों और पुलिस पर घात लगाकर किए गए हमलों का मुख्य योजनाकार था। हिडमा ने कई निर्दोष ग्रामीणों की हत्या और कई CRPF तथा राज्य पुलिस कर्मियों पर हमले किए। ऐसे खूंखार आतंकी के समर्थन में नारे लगाए जाना यह दर्शाता है कि प्रदर्शन का उद्देश्य प्रदूषण नहीं, बल्कि नक्सली तत्वों के वैचारिक एजेंडे को शहरी समाज में फैलाना था।

पुलिस की जांच: “पोस्टर आए कहाँ से?”
पुलिस प्रशासन अब इस पर गंभीर जांच कर रहा है कि:
हिडमा के पोस्टर किसने छपवाए?
क्या यह पोस्टर प्रदर्शन से पहले योजनाबद्ध तरीके से बाँटे गए थे?
क्या किसी संगठित नेटवर्क ने इस प्रोटेस्ट को हाईजैक किया?
प्रदर्शन में शामिल लोगों के बीच नक्सली समर्थक गुट सक्रिय थे या नहीं? पुलिस सूत्रों के अनुसार इस तरह के पोस्टर सामान्य लोगों द्वारा अचानक बनाकर लाना संभव नहीं लगता। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि इसके पीछे कोई सोची-समझी रणनीति हो सकती है।

पर्यावरण मुद्दे की आड़ में नक्सली विचारधारा फैलाने की प्रवृत्ति
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति बढ़ी है कि कुछ समूह सामाजिक मुद्दों विशेषतः पर्यावरण, मानवाधिकार और लोकतंत्र की आड़ लेकर शहरी क्षेत्रों में नक्सल समर्थक विचारधाराएँ फैलाने की कोशिश करते हैं। इन्हें अक्सर ‘अर्बन नक्सल’ की श्रेणी में रखा जाता है।
इनका तरीका सीधा होता है:

  1. किसी लोकप्रिय और जन-सरोकार वाले मुद्दे को आधार बनाओ
    आम जनता को जोड़ो
  2. नारे और पोस्टर के जरिए अपनी वैचारिक बात धीरे-धीरे सामने लाओ
  3. पुलिस और प्रशासन से टकराव की स्थितियाँ पैदा करो
  4. खुद को पीड़ित दिखाकर सोशल मीडिया पर प्रचार करो
    इंडिया गेट की घटना में यही पैटर्न साफ देखा गया।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ: “यह प्रदूषण का नहीं, एजेंडा राजनीति का मामला है”
घटना के बाद राजनीतिक गलियारे भी प्रतिक्रियाओं से गूंज उठे। कई नेताओं ने कहा कि प्रदूषण दिल्ली में वर्षों पुरानी समस्या है, लेकिन अचानक एक समूह का सड़क जाम करना, फिर पुलिस पर हमला और अंत में हिडमा के समर्थन में नारेबाजी यह साबित करता है कि यह प्रदर्शन साफ हवा की मांग नहीं था, बल्कि वामपंथी नक्सल एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश थी। कई राजनेताओं ने इस घटना को “कानून-व्यवस्था को खुली चुनौती” बताया और ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की।

दिल्ली को जिम्मेदारी की जरूरत, अराजकता की नहीं
दिल्ली की हवा लगातार बिगड़ रही है। 391 का AQI कोई हल्की समस्या नहीं है। यह वह स्तर है जहाँ, बच्चे, बुजुर्ग और अस्थमा मरीज, हृदय रोगी, गर्भवती महिलाएँ सभी के लिए हवा बेहद नुकसानदायक हो जाती है। ऐसे समय में समाज को एकजुट होकर प्रदूषण कम करने के उपायों पर विचार करना चाहिए। लेकिन जब कुछ लोग इस संवेदनशील स्थिति का उपयोग अपने राजनीतिक या वैचारिक उद्देश्य पूरे करने में लगाएँ, तो इससे शहर और देश दोनों को नुकसान पहुँचता है।

आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी
इंडिया गेट का रविवार का यह घटनाक्रम हमें कई संदेश देता है:
प्रदर्शन की आड़ में नक्सली विचारधारा को बढ़ावा देने की कोशिश जारी है। कानून-व्यवस्था को चुनौती देकर पुलिस पर हमला करना किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। माडवी हिडमा जैसे खूंखार आतंकी के समर्थन में नारे लगाना राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर मुद्दा है।

अर्बन नक्सल नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है।
जब राजधानी में इस तरह खुलेआम किसी खूनी माओवादी का समर्थन दिखे, तो यह केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि लोकतंत्र और आंतरिक सुरक्षा दोनों के लिए एक खतरनाक संकेत है। प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाना केवल जनता के भरोसे के साथ खिलवाड़ है। देश की सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे तत्वों पर अब पहले से कहीं अधिक कड़ी निगरानी रखनी होगी।

Samvad 24 Office
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