कबाड़ न बन जाएं अरबों के हथियार! रक्षा सौदों में देरी पर संसद की दोटूक – ‘डेडलाइन बदलो या भविष्य हार जाओ

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संवाद 24 नई दिल्ली। भारत की रक्षा तैयारियों और सैन्य आधुनिकीकरण को लेकर संसद की स्थायी समिति ने एक बेहद महत्वपूर्ण और तीखी रिपोर्ट पेश की है। समिति ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि रक्षा उपकरणों की खरीद और उनकी आपूर्ति के लिए सख्त समयसीमा (Deadlines) निर्धारित नहीं की गई, तो अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद सेना के हाथ में जो तकनीक आएगी, वह युद्ध के मैदान में ‘कबाड़’ साबित हो सकती है। तेजी से बदलते वैश्विक हालातों और तकनीकी क्रांतियों के बीच, रक्षा सौदों में होने वाली कछुआ चाल अब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम बनती जा रही है।

​पुरानी तकनीक: सेना के लिए बड़ा खतरा
संसदीय समिति ने बुधवार को संसद में अपनी रिपोर्ट रखते हुए इस बात पर गहरी चिंता जताई कि रक्षा अधिग्रहण की प्रक्रिया में होने वाली अत्यधिक देरी के कारण उपकरण अपनी प्रासंगिकता खो देते हैं। आज के दौर में युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। जिस समय किसी फाइटर जेट या मिसाइल प्रणाली का सौदा होता है, वह उस समय की ‘अत्याधुनिक’ तकनीक होती है। लेकिन अगर उसकी डिलीवरी में 10 से 15 साल लग जाते हैं, तो तब तक दुश्मन देश उससे कहीं आगे निकल चुके होते हैं। समिति का मानना है कि खरीद प्रक्रिया में देरी न केवल बजट का नुकसान है, बल्कि यह हमारे सैनिकों के जीवन को भी खतरे में डालती है क्योंकि उन्हें पुराने हथियारों के साथ आधुनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

​बजट और युद्ध प्रतिरोधक क्षमता
वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों, विशेषकर पड़ोस में बढ़ती अस्थिरता और सीमाओं पर जारी तनाव को देखते हुए, समिति ने रक्षा बजट में और अधिक वृद्धि की जोरदार सिफारिश की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को एक ‘विश्वसनीय युद्ध प्रतिरोधक क्षमता’ (Credible Deterrence) बनाए रखने की आवश्यकता है। इसका अर्थ है कि हमारी सैन्य शक्ति इतनी प्रभावी होनी चाहिए कि दुश्मन हमला करने की हिम्मत न जुटा सके। इसके लिए अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म, अगली पीढ़ी के हथियार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस प्रणालियों की खरीद अनिवार्य है।

​HAL के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी
देश की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने समिति को अपने वर्तमान ऑर्डर्स का ब्यौरा दिया है। HAL के पास इस समय सशस्त्र बलों के लिए 34 ध्रुव हेलीकॉप्टर, 180 एलसीए तेजस मार्क-1ए लड़ाकू विमान और 156 प्रचंड लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर की आपूर्ति का विशाल जिम्मा है। हालांकि, HAL ने बताया कि उसके पास पांच एलसीए मार्क-1ए विमान तैयार हैं, लेकिन चुनौती इन ऑर्डर्स को तय समय के भीतर सेना को सौंपने की है। स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देना गर्व की बात है, लेकिन इसकी गति अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होनी चाहिए।

​छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की दौड़
भारतीय वायु सेना की भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करते हुए रिपोर्ट में एक बड़ा खुलासा किया गया है। रक्षा मंत्रालय ने समिति को सूचित किया है कि भारतीय वायु सेना अब छठी पीढ़ी (6th Generation) के लड़ाकू विमानों के विकास के लिए वैश्विक कंसोर्टियम का हिस्सा बनने पर विचार कर रही है। दुनिया में इस समय दो प्रमुख समूह इस तकनीक पर काम कर रहे हैं—एक जिसमें ब्रिटेन, इटली और जापान शामिल हैं, और दूसरा जिसमें फ्रांस और जर्मनी मिलकर काम कर रहे हैं। ​वायु सेना का लक्ष्य है कि वह इन कंसोर्टियम के साथ मिलकर काम करे ताकि भारत तकनीकी रूप से पीछे न रह जाए। छठी पीढ़ी के विमानों में ऐसी क्षमताएं होंगी जो आज की कल्पना से परे हैं, जैसे कि बिना पायलट के उड़ने की क्षमता, लेजर हथियार और दुश्मन के रडार को पूरी तरह चकमा देने वाली अदृश्यता (Stealth)।

​समय ही सबसे बड़ा हथियार है
संसदीय समिति की यह रिपोर्ट सरकार और रक्षा प्रतिष्ठानों के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। आधुनिक युद्ध केवल शौर्य से नहीं, बल्कि श्रेष्ठ तकनीक और समयबद्ध रणनीतियों से जीते जाते हैं। यदि हम खरीद प्रक्रियाओं की फाइलों को दफ्तरों में दबाए रखेंगे, तो हम अपनी सेना को उस मजबूती के साथ खड़ा नहीं कर पाएंगे जिसकी आज जरूरत है। समिति का यह सुझाव कि ‘समयसीमा अनिवार्य हो’, रक्षा सुधारों की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। अब देखना यह है कि रक्षा मंत्रालय इन सिफारिशों को कितनी गंभीरता से लागू करता है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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